प्रेग्नेंसी में प्लेसेंटा का बहुत बड़ा योगदान होता है। यह वही अंग है, जो गर्भावस्था के दौरान गर्भाशय में पल रहे शिशु को सभी जरूरी पोषक तत्व पहुंचाता है, ताकि शिशु का सही तरह से विकास हो सके। ध्यान रखें कि प्लेसेंटा एक अस्थायी अंग है, जो कि भ्रूण को गर्भाशय की दीवार से जोड़ता है। शिशु के लिए इसे लाइफ लाइन कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा। शिशु इसी के जरिए सांस लेता है और टाॅक्सिक पदार्थों को बाहर निकालता है। यहां तक कि हार्मोन प्रोडक्शन को भी प्लेसेंटा मैनेज करता है। बहरहाल, क्या कभी आपने सोचा है कि शिशु के जन्म के बाद प्लेसेंटा का क्या होता है? क्या यह अंग जन्म के बाद भी महिला के लिए जरूरी माना जाता है? आइए, वृंदावन स्थित Mumma's Blessing IVF और Birthing Paradise की मेडिकल डायरेक्टर, गायनेकोलॉजिस्ट और IVF स्पेशलिस्ट डॉ. शोभा गुप्ता से जानते हैं इस बारे में जरूरी बातें।
डिलीवरी के दौरान
चूंकि, प्लेसेंटा गर्भ में पूरे नौ महीने तक शिशु से जुड़ा हुआ होता है, लेकिन डिलीवरी होने पर इसका काम पूरी तरह खत्म हो जाता है। इसलिए, प्रसव के तीसरे चरण यानी आखिरी चरण में प्लेसेंटा गर्भाशय की दीवार से अलग हो जाता है। जैसे ही महिला डिलीवरी के लिए आखिरी बार दबाव बनाती है, तो उसके साथ-साथ प्लेसेंटा भी योनि के रास्ते से होते हुए बाहर निकल जाता है। इसी तरह, सिजेरियन डिलीवरी के दौरान भी डाॅक्टर खुद अपने हाथों से प्लेसेंटा को पेट पर लगाए गए सर्जिकल चीरे के साथ गर्भाशय से अलग कर देते हैं। इसका मतलब यह है कि डिलीवरी होते ही प्लेसेंटा का काम पूरी तरह खत्म हो जाता है और उसे गर्भाशय से बाहर निकाल दिया जाता है।
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डिलीवरी के बाद
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डिलीवरी के बाद डाॅक्टर यह सुनिश्चित करते हैं कि प्लेसेंटा का छोटा सा टुकड़ा भी गर्भाशय से जुड़ा हुआ न रहे। दरअसल, किसी भी स्थिति में प्लेसेंटा का अंदर रह जाना सही नहीं होता है। अगर किसी वजह से प्लेसेंटा का छोटा सा भी अंग अंदर रह जाता है, तो इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है और महिला को हैवी ब्लीडिंग हो सकती है। यह स्थिति उनकी रिकवरी धीमी कर सकती है। यही कारण है कि डिलीवरी के बाद जब प्लेसेंटा को गर्भाशय से अलग कर दिया जाता है, तो इसके बाद महिलाओं को एक विशेष किस्म का इंजेक्शन लगाया जाता है, जिससे डिलीवरी के बाद होने वाली ब्लीडिंग में कमी आती है और महिला पूरी तरह सुरक्षित हो जाती हैं।
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डिलीवरी के बाद प्लेसेंटा न निकले तो क्या होता है?
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जैसा कि यह स्पष्ट है कि डिलीवरी के बाद प्लेसेंट का निकलना बहुत जरूरी होता है। डाॅ. शोभा गुप्ता बताती हैं कि डिलीवरी के 30 से 60 मिनट के अंदर ही प्लेसेंटा का निकाला जाना जरूरी होता है। अगर ऐसा न हो, तो महिला को कई गंभीर परेशानियां हो सकती हैं और यह जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है, जैसे-
हैवी ब्लीडिंगः अगर डिलीवरी के तुरंत बाद प्लेसेंटा को गर्भाशय से बाहर न निकाला जाए, तो इसकी वजह से हैवी ब्लीडिंग हो सकती है। इस स्थिति को पोस्टपार्टम हैमरेज कहा जाता है। दरअसल, जब प्लेसेंटा का छोटा सा टुकड़ा भी गर्भाशय में रह जाता है, तो इसकी वजह से गर्भाशय पूरी तरह सिकुड़ नहीं पाता है। ऐसे में प्रभावित हिस्से में रक्त वाहिकाएं खुली रह जाती हैं, जहां से भारी मात्रा में ब्लीडिंग होने लगती है।
इंफेक्शन का खतराः गर्भाशय में फंसा हुआ प्लेसेंटा का छोटा सा टुकड़ा भी अंदर बैक्टीरिया पनपने की वजह बन सकता है। ऐसे में गर्भाशय की परत में सूजन आ सकती है, जिससे पेट में तेज दर्द, बुखार और वजाइनल डिस्चार्ज हो सकता है, जो बदबूदार और सामान्य डिस्चार्ज से अलग नजर आ सकता है।
जानलेवा खतराः कई बार प्लेसेंटा किसी समस्या जैसे प्लेसेंटा एक्रेटा (गर्भावस्था से जुड़ी गंभीर समस्या जिसमें प्लेसेंटा बच्चेदानी की दीवार के साथ सामान्य से बहुत ज्यादा गहराई तक चिपक जाती है।) के कारण मजबूती से गर्भाशय से चिपका रहता है, जो कि डिलीवरी के बाद भी नहीं निकलता है। यह कंडीशन बिल्कुल सही नहीं है, क्योंकि ऐसी स्थिति में महिला को हैवी ब्लीडिंग हो सकती है और मां की जान बचाने के लिए ऑपरेशन करके बच्चेदानी निकालनी पड़ सकती है।
बच्चेदानी को नुकसानः ऐसा गंभीर मामलों में ही देखने को मिलता है, लेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर गर्भाशय में प्लेसेंटा बुरी तरह चिपक जाए और उसे निकालने के लिए डॉक्टर को हाथ का इस्तेमाल करना पड़े या सर्जरी करनी पड़े, तो गर्भाशय की दीवार पर घाव होने का जोखिम रहता है, जो कई बार बच्चेदानी को भी नष्ट कर सकता है।
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प्लेसेंटा बाहर न निकले तो डाॅक्टर क्या करते हैं?
डिलवरी के बाद प्लेसेंटा का बाहर निकलना महिला के स्वास्थ्य के लिए अति आवश्यक होता है। अगर डिलीवरी के 30 से 60 मिनट के अंदर प्लेसेंटा बाहर न निकले, तो डाॅक्टर द्वारा निम्न उपाय किए जाते हैं-
हाथ की मदद से प्लेसेंटा को बाहर निकालना
अगर प्लेसेंटा डिलीवरी प्रसव के आखिरी चरण में भी बाहर न निकले, तो डाॅक्टर्स बहुत सावधानी से हाथ के जरिए प्लेसेंटा को गर्भाशय की दीवार से अलग करके बाहर निकालते हैं। इसके लिए वे पूरी सावधानी बरतते हैं। आमतौर पर यह प्रक्रिया एनेस्थीसिया देकर की जाती है।
डी एंड सी की मदद से प्लेसेंटा को बाहर निकालना
अगर डिलीवरी के बाद बच्चेदानी के अंदर फसे हुए प्लेसेंटा के कुछ टुकड़े को निकालने के लिए डी एंड सी भी की जा सकती है। यह एक तरह की मेडिकल प्रक्रिया है, जिसमें खास टूल्स का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे गर्भाशय को अच्छी तरह साफ किया जाता है।
निष्कर्ष
प्रेग्नेंसी के दौरान प्लेसेंटा बहुत ही महत्वपूर्ण पार्ट होता है, वहीं डिलीवरी के बाद इसका बाहर निकलना भी जरूरी हो जाता है। अगर यह अंदर रह जाए, तो महिला के लिए कई तरह के जोखिम का कारण बन सकता है। ऐसा उनके साथ न हो, इसके लिए डाॅक्टर यह सुनिश्चित करते हैं कि डिलीवरी के बाद प्लेसेंटा भी बाहर निकल जाए। जरूरी हो, तो हाथ से इसे निकाला जाता है या सर्जिकल प्रक्रिया की मदद ली जाती है।
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FAQ
क्या डिलीवरी के बाद प्लेसेंटा के बाहर आने में दर्द होता है?
डिलीवरी के बाद प्लेसेंटा के बाहर आने में दर्द महसूस होता है। हालांकि, डिलीवरी की तुलना में यह दर्द बहुत कम होता है।डिलीवरी के बाद प्लेसेंटा का किया जाता है?
डिलीवरी के बाद जब प्लेसेंटा बाहर आ जाता है, तो विशेषज्ञ इसे सुरक्षित रूप से बायोमेडिकल कचरे के रूप में नष्ट कर दिया जाता है।
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Jul 10, 2026 10:15 IST
Modified By : Meera Tagore Jul 10, 2026 10:15 IST
Published By : Meera Tagore
Reviewed By : Dr Shobha Gupta