Fri Sep 11, 2026 | 06:52 PM IST

Medically Reviewed by Dr Purendra Bhasin , Ophthalmologist

रंगों में फर्क समझना हो जाता है मुश्किल? डॉक्टर से जानें कलर ब्लाइंडनेस के 5 कारण

रंगों में फर्क करना कई लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है, जिसे कलर ब्लाइंडनेंस कहा जाता है। कलर ब्लाइंडनेस के कई कारण हो सकते हैं। इस लेख में डॉक्टर ने कारणों को विस्तार से समझाया है।

रंगों को पहचानना जीवन का हिस्सा है, क्योंकि जिंदगी के कई काम रंगों पर भी निर्भर होते हैं। इसमें ट्रैफिक सिग्नल में लाल-पीला-हरा पहचानने से लेकर कपड़ों का रंग चुनने तक लगातार आंखें रंगों को पहचानने की कोशिश करती है। अगर अचानकर लाल या हरे रंग में पहचान करने में दिक्कत हो, रंग पहले से फीके नजर आने लगे या एक आंख से रंग दूसरी आंख के मुकाबले अलग नजर आए, तो यह कलर ब्लाइंडनेस (Color Blindness) हो सकती है।

कलर ब्लाइंडनेस के कारणों को समझने के लिए हमने Dr. Purendra Bhasin, Opthamologist, Founder & Director, Ratan Jyoti Netralaya, Gwalior से बात की।

कलर ब्लाइंडनेस होने के 5 कारण

Dr. Purendra Bhasin ने कहा, “रंगों को पहचानने की क्षमता रेटिना में मौजूद कोन सेल्स की मदद से होती है। इन सेल्स या इससे जुड़े विजुअल सिस्टम में समस्या होने पर व्यक्ति को कुछ रंगों, उनके शेड्स या चमक में अंतर समझने में परेशानी हो सकती है। इसके कई कारण हो सकते हैं।”

1. जेनेटिक कारण

Mayo Clinic के मुताबिक, यह बीमारी आमतौर पर जेनेटिकल होती है। इसका मतलब है कि अगर परिवार में किसी को है, तो आने वाले बच्चे को होने का रिस्क बढ़ सकता है। जेनेटिक कारणों के चलते मरीज को कलर ब्लाइंडनेस की समस्या हल्की, मध्यम या गंभीर भी हो सकती है। अगर किसी को जेनेटिक समस्या है, तो यह बीमारी आमतौर पर दोनों आंखों को प्रभावित कर सकती है और इसकी गंभीरता जीवनभर बनी रह सकती है।

इस बारे में Dr. Purendra Bhasin ने बताया कि जेनेटिक कारणों से कलर ब्लाइंडनेस होने वाले मरीजों को लाल-हरे रंग की पहचान में दिक्कत ज्यादा हो सकती है। हालांकि, दुर्लभ मामलों में नीले और पीले रंग की पहचान भी प्रभावित हो सकती है और बहुत ही दुर्लभ कंडीशन में व्यक्ति को रंग लगभग बिल्कुल दिखाई नहीं देते।

National Eye Institute के अनुसार, यह समस्याओं महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में ज्यादा देखने को मिलती है। 12 में से एक पुरुष में किसी न किसी तरह की कलर विजन में कमी हो सकती है।

2. उम्र बढ़ना

Dr. Purendra Bhasin ने कहा, “कई बार लोगों को बचपन में रंगों की पहचान करने में दिक्कत नहीं होती, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ आंखों में बदलाव आने लगते हैं। इसमें खासतौर पर मोतियाबिंद के कारण रंगों को देखने का तरीके पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, ग्लूकोमा, उम्र से जुड़ी मैक्युलर डिजनरेशन (AMD), डायबिटीज से जुड़े आंखों के बदलाव और ऑप्टिक नर्व की कुछ समस्याएं भी रंगों की पहचान करने में दिक्कत कर सकती है।"

इसलिए अगर किसी व्यक्ति को पहले रंग पहचानने में दिक्क्त नहीं थी, लेकिन इसमें अचानक बदलाव आया है, तो इसके कारणों का पता लगाना जरूरी है।”

color blindness

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3. रेटिना डिटैचमेंट

National Eye Institute के अनुसार, जब रेटिना आंख के पिछले हिस्से में अपनी सामान्य स्थिति से अलग हट जाता है, तो आंखें रंगों के प्रति सेंसिटिव हो जाती है। इससे रंग पहचानने में दिक्कत हो सकती है। अगर किसी को रंगों की पहचान करने में दिक्कत हो, तो रेटिना डिटैचमेंट हो सकता है। इसलिए डॉक्टर से आंखों की चेकअप जरूर कराएं।

4. दवाओं का असर

Dr. Purendra Bhasin कहते हैं, “कुछ दवाएं भी रंग पहचानने की क्षमता में बदलाव से जुड़ी हो सकती हैं। इसलिए अगर किसी नई दवा को शुरू करने के बाद रंगों को देखने में बदलाव महसूस होती है, तो इसकी जानकारी डॉक्टर को जरूर देनी चाहिए। हालांकि, इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी दवा को अपने आप बंद नहीं करनी चाहिए। डॉक्टर यह तय करेंगे कि दवा बंद करनी चाहिए या नहीं।”

5. दिमाग और रेडिएशन थेरेपी

National Eye Institute के मुताबिक, रंगों को देखने के प्रोसेस में आंखें और दिमाग दोनों काम करते हैं। रेटिना से मिले वाले संकेत ऑप्टिक नर्व के जरिए दिमाग तक पहुंचते हैं, जहां उन्हें समझा जाता है। अगर रेटिना, ऑप्टिक नर्व या दिमाग के उन हिस्सों को प्रभावित करने वाली बीमारी या चोट से भी रंगों की पहचान बदल सकती है। जो मरीज रेडिएशन थेरेपी कराते हैं, उन्हें भी रंगों में फर्क करने में दिक्कत हो सकती है।

कलर ब्लाइंडनेस की पहचान कैसे की जाती है?

Dr. Purendra Bhasin ने बताया कि कलर विजन की जांच के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले टेस्ट में इशीहारा कलर टेस्ट (Ishihara Color Test) शामिल है। इसमें अलग-अलग रंगों के छोटे-छोटे डॉट्स से बने पैटर्न या नंबर दिखाए जाते हैं। जिन लोगों को कुछ रंगों में अंतर करने में परेशानी होती है, उन्हें इन पैटर्न को भी पहचानने में दिक्कत हो सकती है। अगर जरूरत होती है, तो मरीज के अन्य कलर विजन से जुड़े टेस्ट हो सकते हैं।

क्या कलर ब्लाइंडनेस का इलाज संभव है?

Dr. Purendra Bhasin कहते हैं, “अगर कलर ब्लाइंडनेस जन्मजात है, तो फिलहाल इसका कोई इलाज उपलब्ध नहीं है। हालांकि, कुछ खास तरह के गिलास या विजुअल ऐड के जरिए लोगों को रंगों के बीच का अंतर समझाया जा सकता है। यह कलर ब्लाइंडनेस का इलाज नहीं है, लेकिन रंगों के फर्क को बेहतर समझने में मदद कर सकते हैं। अगर किसी बीमारी या दवा के कारण रंग पहचानने में दिक्कत होती है, तो उस बीमारी का इलाज करके आंखों की समस्या में सुधार किया जा सकता है।”

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निष्कर्ष
Dr. Purendra Bhasin कहते हैं कि अगर बच्चे को रंग पहचानने में दिक्कत होती है, तो समय पर जांच कराने से समस्या को काफी हद तक मैनेज किया जा सकता है। वैसे तो हर व्यक्ति के रंग देखने का अनुभव थोड़ा अलग होता है, लेकिन अगर रंग की पहचान में अचानक से बदलाव आए, तो इसे सामान्य नहीं समझना चाहिए। इसलिए समय रहते डॉक्टर से जांच करानी चाहिए, ताकि कलर ब्लाइंडनेस को मैनेज किया जा सकता है।

All Image Credit: Magnific

FAQ

  • क्या किसी बीमारी या चोट के कारण अचानक भी कलर ब्लाइंडनेस हो सकती है?

    हां, इसे एक्वायर्ड कलर ब्लाइंडनेस (Acquired Color Blindness) कहते हैं। सिर या आंख में गंभीर चोट, मोतियाबिंद, डायबिटीज के कारण रेटिना डैमेज होने या ऑप्टिक नर्व की सूजन से उम्र के किसी भी पड़ाव पर यह समस्या पैदा हो सकती है।
  • क्या मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन का अत्यधिक इस्तेमाल कलर ब्लाइंडनेस की वजह बन सकता है?

    ज्यादा स्क्रीन टाइम से आंखों में ड्राईनेस, थकान या स्ट्रेन हो सकता है, लेकिन यह रेटिना की कोन सेल्स को इस हद तक नष्ट नहीं करता कि जन्मजात या स्थायी कलर ब्लाइंडनेस पैदा हो जाए।
  • टीबी की दवाइयों से रंगों की पहचान पर क्या असर पड़ता है?

    टीबी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा एथाम्बुटोल आंखों की ऑप्टिक नर्व में सूजन ला सकती है। इससे मरीज की रंग पहचानने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। दवा बंद करने या बदलने पर यह अक्सर ठीक हो जाती है।

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Aneesh Rawat

Aneesh Rawat

Chief Sub Editor

अनीश रावत को हेल्थ और लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 16+ साल का अनुभव है। फिलहाल जागरण न्यू मीडिया के Onlymyhealth में चीफ सब एडिटर हैं। महिला स्वास्थ्य, बच्चों की सेहत, कैंसर, मेडिटेशन और योग पर Research based, doctor verified और SEO फ्रेंडली लेख लिखने में विशेषज्ञ हैं। न्यूज 24, ऑल इंडिया रेडियो और ThinkRight मेडिटेशन ऐप जैसे भरोसेमंद platforms पर काम कर चुकी हैं। Editorial Policy: अनीश द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Aug 13, 2026 17:46 IST

    Modified By : Aneesh Rawat
  • Aug 13, 2026 17:46 IST

    Published By : Aneesh Rawat
    Reviewed By : Dr Purendra Bhasin

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