यूरिन रिपोर्ट आने के बाद लोगों को उसमे सिर्फ हाई, पॉजिटिव या कोई न कोई असामान्य रीडिंग लिखी होती है। आमतौर पर लोगों को यूरिन रिपोर्ट बिल्कुल समझ नहीं आती, क्योंकि अगर प्रोटीन के आगे पॉजिटिव लिखा होता है या RBC और WBC की कुछ अंक लिखे होते हैं, तो लोगों को अक्सर कन्फ्यूजन होती है कि क्या उन्हें डायबिटीज है या फिर यूटीआई है। लोगों की यूरिन रिपोर्ट अच्छे तरीके से समझ आ जाए, इसलिए हमने Dr. Vineet Malhotra, Senior Consultant in Urology & Andrology, VNA Hospital, Delhi से बात की। उन्होंने बताया कि यूरिन टेस्ट यानी पेशाब की जांच शरीर की सेहत के बारे में कई जरूरी संकेत देती है। इससे यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI), किडनी से जुड़ी समस्याओं और डायबिटीज जैसी बीमारियों को समझने में मदद मिल सकती है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यूरिन टेस्ट की रिपोर्ट के साथ-साथ मरीज के लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री पर भी ध्यान देना जरूरी है।
यूरिन रूटीन टेस्ट में क्या चेक होता है?
Dr. Vineet Malhotra कहते हैं, “यूरिन रूटीन और माइक्रोस्कोपिक टेस्ट में पेशाब का रंग, उसका गाढ़ापन, उसमें मौजूद केमिकल्स और टिश्यूज का चेकअप की जाती है। इसमें प्रोटीन, ग्लूकोज, RBC, WBC, pH और स्पेसिफिक ग्रेविटी जैसे पैरामीटर शामिल होते हैं। कुछ रिपोर्ट में कीटोन, बिलीरुबिन, बैक्टीरिया और क्रिस्टल की जानकारी भी दी जाती है।”
यूरिन रूटीन टेस्ट में लिखे नंबर्स का क्या मतलब होता है?
Dr. Vineet Malhotra ने कहा कि यूरिन रिपोर्ट में जो भी लिखा गया है, उसका मतलब समझना बहुत जरूरी है, ताकि रिपोर्ट पढ़ते समय समझ आ सके कि क्या समस्या है?
1. Urine pH
यह नंबर बताता है कि पेशाब कितना अम्लीय या क्षारीय है। आमतौर पर अगर pH करीब 4.5 से 8.0 के बीच होता है, तो सामान्य है। हालांकि, अलग-अलग लैब में यह सीमा थोड़ी बदल सकती है। अगर pH कम है, तो इसका मतलब है कि पेशाब ज्यादा अम्लीय है। वहीं, pH ज्यादा होने पर पेशाब ज्यादा क्षारीय होता है। डाइट, दवाएं और शरीर के मेटाबॉलिज्म से जुड़ी कुछ परेशानियां यूरिन के pH पर असर डाल सकती हैं।
- अगर pH ज्यादा आता है, तो UTI या इंफेक्शन की समस्या हो सकती है।
- अगर pH कम है, तो कीटोएसिडोसिस से जुड़ी डायबिटीज और दस्त होने की संभावना हो सकती है।
2. स्पेसिफिक ग्रेविटी (Specific Gravity)
यूरिन रिपोर्ट में स्पेसिफिक ग्रेविटी से पता चलता है कि पेशाब कितना गाढ़ा या पतला है। इसकी नॉर्मल रेंज 1.005 से 1.030 के बीच होती है।
- अगर स्पेसिफिक ग्रेविटी ज्यादा है, तो इसका मतलब है कि शरीर में पानी की कमी है और पेशाब ज्यादा गाढ़ा हो सकता है। पेशाब में ग्लूकोज रीडिंग बढ़ा सकता है।
- स्पेसिफिक ग्रेविटी कम आने का मतलब है कि ज्यादा पानी पीने से पेशाब पतला हो सकता है, लेकिन अगर यह रीडिंग लगातार कम आती है, तो कुछ मामलों में किडनी की पेशाब को गाढ़ा करने की क्षमता की जांच जरूरी हो सकती है।
3. यूरिन प्रोटीन (Urine Protein)
सामान्य यूरिन टेस्ट में प्रोटीन आमतौर पर नेगेटिव या बहुत कम मात्रा में होना चाहिए। अगर बार-बार जांच में प्रोटीन बढ़ा हुआ आता है, तो यह किडनी से जुड़ी किसी समस्या का संकेत हो सकता है। डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से होने वाली किडनी की समस्याओं में भी पेशाब में प्रोटीन बढ़ सकता है।
अगर कभी एक बार प्रोटीन पॉजिटिव आता है, तो इसका कारण बुखार, हार्ड एक्सरसाइज या डिहाइड्रेशन वजह हो सकती है, लेकिन अगर प्रोटीन लगातार पॉजिटिव आ रहा है, तो डॉक्टर यूरिन एल्ब्यूमिन-टू-क्रिएटिनिन रेशियो यानी UACR चेकअप की सलाह दे सकते हैं।
4. यूरिन ग्लूकोज (Urine Glucose)
आमतौर पर यूरिन टेस्ट में ग्लूकोज नेगेटिव होना चाहिए। अगर रिपोर्ट में ग्लूकोज पॉजिटिव आता है, तो इसकी एक वजह ब्लड शुगर का बढ़ना हो सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मरीज को डायबिटीज की समस्या है। ब्लड शुगर बढ़ने पर डॉक्टर ब्लड ग्लूकोज या HbA1c जैसे टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं।
5. यूरिन आरबीसी (Urine RBC)
RBC यानी रेड ब्लड सेल्स खून की लाल कोशिकाएं होती हैं। अगर यूरिन में RBC बढ़ी हुई आती है, तो इसका कारण UTI, किडनी स्टोन, सूजन या पेशाब की नली में समस्याएं हो सकती है। आमतौर पर इसकी नॉर्मल सीमा 0-2 या 0-3 RBC प्रति हाई-पावर फील्ड (HPF) तक हो सकती है। हालांकि, कई लैब में कुछ बदल भी सकता है। अगर पेशाब में खून दिखाई देता है, तो RBC ज्यादा आ सकते हैं। अगर बार-बार RBC बढ़ा हुआ दिखाई दे रहा है, तो डॉक्टर आगे कुछ और चेकअप की सलाह दे सकते हैं।
6. यूरिन डब्लूबीसी (Urine WBC)
WBC यानी व्हाइट ब्लड सेल्स शरीर को संक्रमण से बचाने में मदद करती हैं। कई लैब में यूरिन में 0-5 WBC प्रति हाई-पावर फील्ड (HPF) को सामान्य माना जाता है। अगर WBC बढ़ा हुआ दिखाई देता है, तो इसका मतलब है कि यूरिनरी ट्रैक्ट में इंफेक्शन या सूजन हो सकती है।
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7. ल्यूकोसाइट एस्टरेज और नाइट्राइट (Leukocyte Esterase and Nitrite)
अगर यूरिन टेस्ट में ल्यूकोसाइट एस्टरेज और नाइट्राइट पॉजिटिव होते हैं, तो UTI की संभावना हो सकती है। अगर अन्य पैरामीटर पॉजिटिव हैं, तो जरूरत पड़ने पर डॉक्टर यूरिन कल्चर कराने की सलाह दे सकते हैं।
8. कीटोन और बिलीरुबिन (Ketones and Bilirubin)
यूरिन में कीटोन आमतौर पर नेगेटिव होते हैं। लंबे समय तक कुछ न खाने, कम कार्बोहाइड्रेट वाली डाइट या ब्लड शुगर बढ़ने या कम होने पर ये बढ़ सकते हैं। अगर डायबिटीज से पीड़ित मरीज में कीटोन के साथ उल्टी, पेट दर्द या तेज सांस चलने जैसे लक्षण महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
यूरिन में बिलीरुबिन अगर बढ़ा हुआ दिखाई देता है, तो ये लिवर या पित्त नलियों से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है।
9. बैक्टीरिया और एपिथीलियल सेल्स (Bacteria and Epithelial Cells)
यूरिन में बैक्टीरिया दिख रहे हैं, तो यह इंफेक्शन की वजह से हो सकता है। वहीं एपिथीलियल सेल्स की मौजूदगी भी सैंपल की क्वालिटी समझने में मदद कर सकती है।
10. क्रिस्टल्स और कास्ट्स (Crystals and Casts)
क्रिस्टल्स आने का कारण स्टोन्स की वजह हो सकता है, वहीं कुछ खास प्रकार के कास्ट्स किडनी से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकते हैं। अगर ऐसा यूरिन रिपोर्ट में आता है, तो डॉक्टर कुछ और टेस्ट की सलाह दे सकते हैं।
यूरिन टेस्ट रिपोर्ट की सामान्य रेंज क्या है?
Cleveland Clinic के अनुसार, यूरिन टेस्ट के पैरामीटर्स की नॉर्मल रेंज को कुछ ऐसे पढ़ा जा सकता है।
टेस्ट |
नॉर्मल रेंज |
मतलब |
पेशाब का रंग |
पीला |
हल्का पीला रंग सामान्य |
बिलीरुबिन |
नेगेटिव |
लिवर की समस्या न होने का संकेत |
ग्लूकोज |
नेगेटिव या नाममात्र |
पेशाब में शुगर का न होना या बहुत मामूली मात्रा |
हीमोग्लोबिन |
नेगेटिव या नाममात्र |
मूत्र में लाल रक्त कोशिकाएं न होना |
कीटोन्स |
नेगेटिव या नाममात्र |
फैट्स न टूटने का कोई संकेत न होना |
प्रोटीन |
नेगेटिव या नाममात्र |
किडनी के ठीक से काम करने का संकेत |
ल्यूकोसाइट एस्टरेज |
नेगेटिव या नाममात्र |
UTI न होना |
नाइट्राइट |
नेगेटिव |
बैक्टीरिया न होना |
पेशाब का pH |
5.0 - 8.0 |
मूत्र का अम्लीय या क्षारीय संतुलन |
स्पेसिफिक ग्रेविटी |
1.005 - 1.030 |
मूत्र के गाढ़ेपन और हाइड्रेशन का स्तर |
बैक्टीरिया |
नेगेटिव |
कोई संक्रमण न होना |
कास्ट्स |
0/LPF (लो पावर्ड फील्ड) |
किडनी से जुड़ी समस्या न होना |
मूत्र RBC |
0 - 3 / HPF (हाई पावर्ड फील्ड) |
पेशाब में ब्लड नॉर्मल होना |
मूत्र WBC |
0 - 5 / HPF |
पेशाब में इंफेक्शन न होना |
यीस्ट |
नेगेटिव |
फंगल संक्रमण न होना |
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डॉक्टर की सलाह
Dr. Vineet Malhotra कहते हैं कि यूरिन रिपोर्ट में कुछ नंबर्स ज्यादा या कम आने पर खुद से किसी भी तरह की दवा शुरू न करें। सिर्फ एक नंबर ज्यादा या दूसरा कम आने से जरूरी नहीं है कि किडनी या पेशाब से जुड़ी समस्या हो। डॉक्टर मरीज से लक्षण और मेडिकल हिस्ट्री को देखकर ही आगे के चेकअप की सलाह देते हैं। जरूरत पड़ने पर यूरिन कल्चर, किडनी फंक्शन टेस्ट या ब्लड शुगर टेस्ट कराए जा सकते हैं।
निष्कर्ष
यूरिन टेस्ट की रिपोर्ट के जरिए शरीर में होने वाली परेशानियों की जानकारी मिल सकती है, लेकिन सिर्फ रीडिंग के आधार पर बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती है। इसलिए कई बार डॉक्टर यूरिन टेस्ट के साथ अन्य टेस्ट भी कराते हैं, ताकि बीमारी की सही तरीके से पहचान हो सके।
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FAQ
मासिक धर्म यानी पीरियड्स के दौरान यूरिन टेस्ट क्यों नहीं कराना चाहिए?
पीरियड्स के दौरान यूरिन सैंपल में योनि से आने वाले खून के लाल कण और बाहरी कोशिकाएं मिल जाती हैं। इससे रिपोर्ट में पेशाब में खून की गलत रिपोर्ट आ सकती है। इमरजेंसी न हो, तो पीरियड्स खत्म होने के दो से तीन दिन बाद ही कराना चाहिए।क्या यूरिन सैंपल देने से पहले ली गई दवाएं या विटामिन रिपोर्ट को प्रभावित कर सकते हैं?
बहुत मात्रा में विटामिन C लेने से यूरिन में ग्लूकोज, ब्लड और बिलीरुबिन के टेस्ट नेगेटिव रिपोर्ट आ सकती है। वहीं कुछ एंटीबायोटिक्स या बी-कॉम्प्लेक्स विटामिन्स पेशाब के प्राकृतिक रंग और गंध को पूरी तरह बदल सकते हैं।
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Oct 27, 2026 19:05 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Vineet Malhotra
