एंडोमेट्रियोसिस के कारण महिलाओं को मां बनने में दिक्कत आ सकती है। इस बीमारी की वजह से कई महिलाओं को सालों तक दर्दनाक पीरियड्स और पेल्विक पेन जैसी परेशानियां झेलती रहती हैं, लेकिन उन्हें यह पता ही नहीं होता कि इसकी वजह एंडोमेट्रियोसिस हो सकती है। अगर महिला को पीरियड्स के दौरान दर्द और लगातार एक साल तक असुरक्षित सेक्शुअल रिलेशन बनाने के बाद भी प्रेग्नेंट नहीं हो पा रही, तो उसे एंडोमेट्रियोसिस का चेकअप कराना चाहिए।
जब प्राकृतिक तरीके से गर्भधारण नहीं हो पाता, तो कई कपल्स IVF (In Vitro Fertilization) कराते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल होता है कि क्या एंडोमेट्रियोसिस होने पर IVF की सफलता कम हो जाती है? इस बारे में जानने के लिए हमने Dr. Hrishikesh Pai, Consultant Gynaecologist & IVF Specialist, Lilavati Hospital Mumbai and Fortis Hospitals Delhi & Chandigarh से बात की। उन्होंने बताया कि इसका जवाब इतना आसान नहीं है। इसका असर हर महिला में अलग-अलग हो सकता है और कई मामलों में सही इलाज के साथ IVF के जरिए सफल प्रेग्नेंसी भी संभव है।
एंडोमेट्रियोसिस में प्रेग्नेंसी क्यों मुश्किल होती है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में रिप्रोडेक्टिव उम्र की करीब 10% महिलाएं एंडोमेट्रियोसिस की बीमारी से प्रभावित है। एंडोमेट्रियोसिस क्रोनिक बीमारी है, जो पीरियड्स शुरू होने से लेकर मेनोपॉज तक किसी भी महिला को प्रभावित कर सकती है।
Dr. Hrishikesh Pai कहते हैं, “इस बीमारी में यूटरस की अंदरूनी परत जैसी कोशिकाएं यूटरस के बाहर विकसित होने लगती हैं। ये कोशिकाएं ओवरीज, फैलोपियन ट्यूब, पेल्विक हिस्से या आसपास के अन्य अंगों पर भी पहुंच सकती हैं। हर महीने हार्मोनल बदलावों के रिप्रोडेक्टिव अंगों के आसपास सूजन, दर्द और सिस्ट बनने जैसी समस्याएं हो सकती है। इस वजह से महिला की फर्टिलिटी पर भी असर पड़ सकता है। सूजन और चिपकाव की वजह से फैलोपियन ट्यूब बंद हो सकती हैं। ओवरी में बनने वाले सिस्ट (एंडोमेट्रियोमा) स्वस्थ एग्स की संख्या और क्वालिटी पर भी असर डाल सकते हैं। इसके अलावा, पेल्विक हिस्से में बनने वाली सूजन एग्स, स्पर्म और भ्रूण के विकास को भी प्रभावित कर सकती है। इसलिए कुछ महिलाओं में एंडोमेट्रियोसिस की वजह से प्राकृतिक गर्भधारण मुश्किल हो जाता है।”
क्या एंडोमेट्रियोसिस होने पर IVF की सफलता कम हो जाती है?
Dr. Hrishikesh Pai के मुताबिक, यह पूरी तरह बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करता है। अगर एंडोमेट्रियोसिस शुरुआती या हल्के स्तर का है, तो IVF की सफलता सामान्य महिलाओं के बराबर हो सकती है, लेकिन अगर बीमारी गंभीर है और ओवरीज को काफी ज्यादा नुकसान पहुंचा चुकी है, तो इससे एग्स की संख्या और क्वालिटी दोनों पर असर पड़ सकता है। कुछ मामलों में देखा गया है कि गर्भाशय के भीतर का वातावरण भी भ्रूण के सफल इंप्लान्टेशन को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, लेटेस्ट IVF टेक्नीक और बेहतर एम्ब्रायोलॉजी लैब की वजह से ऐसे मामलों में भी सफलता की संभावना पहले के मुकाबले काफी बेहतर हुई है।”
Reproductive Biology and Endocrinology में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि अक्सर लोग मानते हैं कि एंडोमेट्रियोमा (चॉकलेट सिस्ट) को हटाने वाली सर्जरी के कारण ओवरी रिजर्व को नुकसान पहुंचता है। इस वजह से IVF की सफलता का दर कम हो सकता है, लेकिन स्टडी में इस भ्रांति को दूर करने के लिए रिसर्चर्स ने IVF प्रोसेस के हर स्टेज का बारीकी से अध्ययन किया। इस स्टडी में बताया गया कि एंडोमेट्रियोसिस का ओवरी स्टिमुलाइजेशन पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। अगर सिस्ट का आकार 4 सेटीमीटर से बड़ा है, तो दवाओं के प्रति ओवरीज में मामूली कमी देखी गई। IVF के दौरान इस बीमारी से अंडों की क्वालिटी खराब नहीं होती और फर्टिलाइजेशन रेट सामान्य महिलाओं जैसा ही होता है। इसके साथ-साथ IVF कराने वाली महिलाओं के भ्रूण का विकास भी सामान्य स्तर पर होता है। इस स्टडी में साफ किया गया है कि एंडोमेट्रियोसिस बीमारी IVF के रिजल्ट या सफलता के दर को किसी भी स्टेज में नुकसान नहीं पहुंचाती है। इसलिए अगर किसी महिला को एंडोमेट्रियोमा सिस्ट है, तो ओवरेयिन रिजर्व को सुरक्षित रखने के लिए पहले IVF या एग फ्रीजिंग की सलाह दी जा सकती है।

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IVF शुरू करने से पहले क्या चेकअप किए जाते हैं?
Dr. Hrishikesh Pai के अनुसार, एंडोमेट्रियोसिस से पीड़ित महिलाओं में IVF प्लान अन्य महिलाओं के मुकाबले थोड़ा अलग हो सकता है। इसलिए IVF शुरू करने से पहले महिलाओं की ओवरीज की क्षमता पता करने के लिए AMH टेस्ट, पेल्विक अल्ट्रासाउंड, एमआरआई, एंडोमेट्रियोमा सिस्ट का चेकअप, यूटरस की कंडीशन, हार्मोन प्रोफाइल और महिला की उम्र और मेडिकल हिस्ट्री चेक करके ही IVF प्लान तैयार किया जाता है।
IVF की सफलता बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए?
Dr. Hrishikesh Pai ने एंडोमेट्रियोसिस से जूझ रही महिलाओं को IVF के सफलता दर को बढ़ाने के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव करने की सलाह दी है।
- अगर महिला को पता है कि उसे एंडोमेट्रियोसिस की बीमारी है, तो समय पर फर्टिलिटी एक्सपर्ट से सलाह लेनी चाहिए।
- डॉक्टर की बताई सभी दवाएं और इंजेक्शन समय पर लेना जरूरी है।
- बैलेंस्ड डाइट लेने से हार्मोन संतुलित रखना आसान हो जाता है।
- शरीर का वजन नियंत्रित रखना बहुत महत्वपूर्ण है।
- स्मोकिंग और शराब को पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए।
- नींद पूरी करने से IVF को सफल बनाने में मदद मिलती है।
- स्ट्रेस कम करने के लिए योग, मेडिटेशन या हल्की एक्सरसाइज करें।
- बिना डॉक्टर की सलाह कोई सप्लीमेंट या हर्बल दवा न लें।
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निष्कर्ष
Dr. Hrishikesh Pai कहते हैं कि कुछ साल पहले तक एंडोमेट्रियोसिस को बांझपन का बड़ा कारण माना जाता था, लेकिन अब IVF की लेटेस्ट टेक्नीक, बेहतर एम्ब्रियो कल्चर सिस्टम और अनुभवी डॉक्टरों की मदद से महिलाएं सफलतापूर्वक मां बन रही हैं। हालांकि, कुछ मामलों में एंडोमेट्रियोसिस की वजह से IVF की सफलता को प्रभावित कर सकता है। इसी वजह बीमारी की गंभीरता, महिला की उम्र, ओवरी की क्षमता और अन्य बीमारियां हो सकती है, लेकिन अगर एंडोमेट्रियोसिस से पीड़ित महिला समय पर IVF एक्सपर्ट से सलाह लेकर इलाज शुरू कर दे, तो प्रेग्नेंसी की संभावना को काफी बढ़ा सकता है।
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FAQ
क्या एंडोमेट्रियोसिस के मरीजों में IVF की सफलता महिला की उम्र पर निर्भर करती है?
अगर महिला की उम्र 35 साल से कम है, तो एंडोमेट्रियोसिस होने के बावजूद IVF के जरिए मां बनने की संभावना बहुत अधिक होती है, क्योंकि इस उम्र में अंडों की गुणवत्ता बेहतर होती है। 35 से 40 की उम्र के बाद अंडों की क्वालिटी तेजी से घटती है, जिससे चुनौती बढ़ जाती है।अंडों का स्टॉक (Egg Reserve - AMH) सफलता को कैसे प्रभावित करता है?
एंडोमेट्रियोसिस अक्सर ओवरी के स्वस्थ टिश्यूज को नुकसान पहुंचाता है। IVF शुरू करने से पहले डॉक्टर AMH (एंटी-मुलरियन हार्मोन) टेस्ट करते हैं। यदि AMH का स्तर अच्छा है, तो आईवीएफ के दौरान ज्यादा और बेहतर अंडे मिलने की उम्मीद होती है, जिससे सफलता की संभावना बढ़ जाती है।
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Jul 20, 2026 16:34 IST
Modified By : Aneesh Rawat Jul 20, 2026 16:34 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Hrishikesh D Pai