लगातार एक साल तक कोशिश करने के बाद भी जब महिला प्रेग्नेंट नहीं हो पाती, तो उसे डॉक्टर IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) की सलाह देते हैं। कई मामलों में देखा गया है कि कपल्स IVF से जुड़ी अफवाहों और अधूरी जानकारी की वजह से इलाज कराने से डरते हैं। कई लोगों को लगता है कि IVF से सिर्फ जुड़वां बच्चे ही होते हैं, तो किसी को लगता है कि इससे महिला का शरीर कमजोर हो जाता है या फिर IVF सिर्फ उन महिलाओं के लिए है, जो कभी मां नहीं बन सकती। ऐसे मिथकों की सच्चाई जानने के लिए हमने वृंदावन स्थित Mumma's Blessing IVF और Birthing Paradise की मेडिकल डायरेक्टर, गायनेकोलॉजिस्ट और IVF स्पेशलिस्ट Dr. Shobha Gupta से बात की।
IVF से जुड़े मिथक और उनके सच्चाई
Dr. Shobha Gupta ने बताया कि सही जानकारी न होने के कारण कई कपल समय पर इलाज नहीं करा पाते और इससे उनकी सफलता की संभावना पर भी असर पड़ता है।
1. मिथक: IVF करवाने से गर्भधारण की 100% गारंटी होती है।
सच्चाई: Dr. Shobha Gupta कहती हैं, “ऐसा बिल्कुल नहीं है। IVF गर्भधारण की संभावना जरूर बढ़ाता है, लेकिन यह सफलता की गारंटी नहीं देता। इलाज की सफलता महिला की उम्र, एग्स की क्वालिटी, स्पर्म की कंडीशन और महिला की मेडिकल कंडीशन पर निर्भर करती है।”
Cureus में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, IVF कराने वाली 30 साल से कम उम्र की महिलाओं में सफलता का दर 52 फीसदी था, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ इसमें कमी आने लगी थी। 35 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं में IVF की सफलता का दर सिर्फ 30 फीसदी रह गया था।
2. मिथक: IVF सिर्फ उन्हीं महिलाओं के लिए है, जो इनफर्टिलिटी से परेशान है।
सच्चाई: Dr. Shobha Gupta ने कहा, “ IVF का इस्तेमाल सिर्फ इंफर्टिलिटी तक सीमित नहीं है। आजकल जिन महिलाओं की फैलोपियन ट्यूब बंद है, पुरुषों को गंभीर इंफर्टिलिटी की समस्या है, एंडोमेट्रियोसिस से पीड़ित महिलाएं, बार-बार गर्भपात होना, जेनेटिक बीमारी से बचाव के लिए भ्रूण की जांच कराना या फिर कैंसर जैसी बीमारी का इलाज कराने से पहले एग फ्रीजिंग कराने पर IVF किया जा सकता है। इसलिए अगर किसी कपल को समस्या है, तो उसे डॉक्टर से जरूर सलाह लेनी चाहिए।”
3. मिथक: IVF से जन्म लेने वाले बच्चे सामान्य बच्चों जैसे नहीं होते।
सच्चाई: Dr. Shobha Gupta के मुताबिक, “मेरे पास भी कई कपल्स आकर यही सवाल करते हैं, लेकिन यह सबसे बड़ी गलतफहमी है। IVF से जन्मे शिशु पूरी तरह से स्वस्थ होते हैं, क्योंकि शिशु का विकास मां के गर्भ में ही होता है। IVF में सिर्फ शुरुआत में एग और स्पर्म को लैब में फर्टिलाइज किया जाता है। इसके बाद एम्ब्रियो को मां के यूटरस में ट्रांसफर कर दिया जाता है। इसके बाद प्रेग्नेंसी आम महिलाओं की तरह ही होती है। इसलिए यह कहना गलत है कि IVF से जन्म लेने वाले शिशु सामान्य नहीं होते।”

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Frontier in Reproductive Health में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, IVF या ART तकनीकों से पैदा हुए बच्चों का स्वास्थ्य लंबा और सामान्य पाया गया है। हालांकि, शुरुआत में समय से पहले डिलीवरी या बच्चे का वजन कम होने का रिस्क हो सकता है, लेकिन जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, ये अंतर लगभग खत्म हो जाता है। IVF तकनीक से जन्मे बच्चों में ब्लड प्रेशर, शुगर या हार्ट की सेहत नेचुरल रूप से जन्मे बच्चों जैसी ही सामान्य पाई गई।
4. मिथक: IVF बहुत दर्दनाक प्रक्रिया है।
सच्चाई: Dr. Shobha Gupta ने बताया कि पहले की मुकाबले आज IVF काफी सुरक्षित और आरामदायक हो गया है। IVF के दौरान हार्मोन इंजेक्शन जरूर दिए जाते हैं, लेकिन इनमें इस्तेमाल होने वाली सुई बहुत पतली होती है। एग रिट्रीवल भी हल्की बेहोशी में किया जाता है, इसलिए महिला को प्रक्रिया के दौरान दर्द महसूस नहीं होता। हालांकि, कुछ महिलाओं को इलाज के दौरान हल्की सूजन, पेट में भारीपन या असहजता महसूस हो सकती है, लेकिन ज्यादातर मरीज इसे आसानी से सहन कर लेते हैं। यह प्रक्रिया बहुत दर्दनाक नहीं होती।”
5. मिथक: IVF कराने से हमेशा जुड़वां या तीन बच्चे होते हैं।
सच्चाई: Dr. Shobha Gupta के मुताबिक, आज ऐसा बहुत कम होता है। पहले सफलता बढ़ाने के लिए एक से ज्यादा भ्रूण ट्रांसफर किए जाते थे, जिससे जुड़वां बच्चों की संभावना बढ़ जाती थी। लेकिन अब ज्यादातर मामलों में सिंगल एम्ब्रियो ट्रांसफर को प्राथमिकता दी जाती है। इससे मां और बच्चे दोनों के लिए रिस्क कम होता है और सेहतमंद प्रेग्नेंसी की संभावना बनी रहती है।”
6. मिथक: IVF कराने से जल्दी मेनोपॉज आ जाता है।
सच्चाई: Dr. Shobha Gupta कहती हैं, “यह लोगों में बड़ी गलतफहमी है। दरअसल, महिलाओं के शरीर में हर महीने कई अंडे विकसित होते है, लेकिन सामान्य स्थिति में सिर्फ एक अंडा परिपक्व होता है और बाकी अपने आप नष्ट हो जाते हैं। IVF में दी जाने वाली दवाएं उन्हीं एग्स को विकसित होने में मदद करती हैं, जो वैसे भी उस महीने खत्म होने वाले थे। इसका मतलब यह नहीं कि भविष्य के अंडे पहले ही इस्तेमाल हो जाते हैं या जल्दी मेनोपॉज आ जाता है। IVF में ऐसे मामले नहीं देखे गए है कि किसी महिला को सिर्फ IVF कराने से जल्दी मेनोपॉज आ गया हो। जल्दी मेनोपॉज आने के कई अन्य कारण हो सकते हैं।”
7. मिथक: IVF की सफलता सिर्फ महिला की ही होती है।
सच्चाई: Dr. Shobha Gupta ने बताया कि इनफर्टिलिटी की समस्या सिर्फ महिला में ही नहीं होती, बल्कि पुरुषों से जुड़ी समस्याएं भी प्रेग्नेंसी में रुकावट बन सकती है। इसमें पुरुषों के स्पर्म की संख्या, कम गतिशीलता और अन्य समस्याएं शामिल है। इसलिए IVF शुरू करने से पहले महिला और पुरुष दोनों का चेकअप कराना जरूरी है। ऐसे में प्रेग्नेंसी के लिए सिर्फ महिला ही जिम्मेदार नहीं होती, बल्कि पुरुष भी इसके जिम्मेदार हो सकते हैं।
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निष्कर्ष
Dr. Shobha Gupta लोगों को सलाह देती हैं कि अगर कपल लंबे समय से प्रेग्नेंट नहीं हो पा रहा है, तो घबराने के बजाय समय रहते चेकअप कराना चाहिए। इसके अलावा, IVF को लेकर फैली आधी-अधूरी जानकारी की सच्चाई समझने के लिए डॉक्टर से सलाह लेकर ही इलाज कराना चाहिए।
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FAQ
क्या IVF कराने से महिला में कैंसर का खतरा बढ़ जाता है?
कई वैज्ञानिक अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि आईवीएफ के दौरान दिए जाने वाले हार्मोनल दवाओं से ब्रेस्ट या ओवेरियन कैंसर का कोई सीधा खतरा नहीं बढ़ता है।क्या IVF प्रेग्नेंसी में नॉर्मल डिलीवरी हो सकती है या सिजेरियन ही जरूरी है?
IVF में नॉर्मल डिलीवरी पूरी तरह संभव है। IVF होने के बाद प्रेग्नेंसी सामान्य तरीके से ही चलती है। सिजेरियन सिर्फ तभी किया जाता है, जब मां की उम्र ज्यादा हो, जुड़वां बच्चे हों या डिलीवरी के समय कोई मेडिकल जटिलता आए।
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Jul 24, 2026 19:30 IST
Modified By : Aneesh Rawat Jul 24, 2026 19:30 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Shobha Gupta