महिलाओं में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) की वजह से शरीर के कई अंगों को नुकसान होता है और इसमें फर्टिलिटी भी शामिल है। पहले इसे PCOS कहा जाता था, लेकिन वैज्ञानिकों ने माना कि हार्मोनल बदलावों को असर सिर्फ ओवरीज पर ही नहीं पड़ता, बल्कि यह शरीर के मेटाबोलिक को भी प्रभावित करता है। इसलिए हाल ही में इसका नाम बदलकर पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) रख दिया गया है। सबसे परेशानी की बात यह है कि कई महिलाओं को पता ही नहीं चलता कि उन्हें PMOS की समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर की 70 फीसदी महिलाओं को यह पता ही नहीं कि वे PMOS से पीड़ित है। इसलिए कई बार PMOS से पीड़ित महिलाओं को समझ ही नहीं आता कि उनकी फर्टिलिटी का कारण PMOS हो सकता है।
अगर किसी महिला को PMOS की वजह से प्रेग्नेंसी में दिक्कत होती है, तो उसकी मेडिकल कंडीशन को स्टडी करने के बाद IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) की सलाह दे सकते हैं। लेकिन PMOS वाली महिलाओं में IVF के दौरान कुछ अतिरिक्त सावधानियां बरतना बेहद जरूरी होता है। इस बारे में जानने के लिए हमने Dr. Hrishikesh Pai, Consultant Gynaecologist & IVF Specialist, Lilavati Hospital Mumbai and Fortis Hospitals Delhi & Chandigarh से बात की। उन्होंने बताया कि PMOS के मरीजों को भी IVF के अच्छे परिणाम मिल सकते हैं, लेकिन इसके लिए इलाज का प्लान महिला की मेडिकल कंडीशन को देखकर ही बनाया जाता है।
PMOS से पीड़ित महिलाओं को IVF कब कराना चाहिए?
Journal of Psychosomatic Research के मुताबिक, PMOS महिलाओं में इनफर्टिलिटी का सबसे बड़ा कारण हो सकता है। जब दवाओं की मदद से ओव्यूलेशन नहीं हो पाता, तो डॉक्टर IVF की सलाह देते हैं। अगर PMOS पीड़ित महिलाओं का पुरानी IVF टेक्नीक से IVF किया जाता है, तो उससे ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम (OHHS) का खतरा 17 से 31 फीसदी तक बढ़ सकता है। इस तकनीक में एग्स को परिपक्व करने के लिए भारी मात्रा में हार्मोनल इंजेक्शन दिए जाते हैं। इसलिए PMOS से ग्रस्त महिलाओं को IVF कराते समय कुछ खास बातों को ध्यान रखना चाहिए, ताकि महिला की प्रेग्नेंसी सफलतापूर्वक हो सके।
क्या PMOS के कारण IVF मुश्किल हो जाता है?
Dr. Hrishikesh Pai कहते हैं, “PMOS वाली महिलाओं की ओवरी हार्मोनल इंजेक्शन के प्रति ज्यादा सेंसिटिव होती है। इसलिए एक बार में एक से ज्यादा एग्स को निकाला जाता है। इससे OHHS का रिस्क बढ़ सकता है। जिन महिलाओं को OHSS हो जाता है, उन्हें पेट में दर्द, भारीपन, पेट फूलना, तेजी से वजन बढ़ना, मतली, उल्टी, सांस लेने में परेशानी और शरीर में पानी जमा हो सकता है। इसलिए IVF कराते समय अनुभवी फर्टिलिटी एक्सपर्ट और मॉडर्न टेक्नोलॉजी वाले सेंटर्स में ही जाना चाहिए, क्योंकि नई IVF तकनीकों और कम डोज दवाओं की मदद से OHSS के रिस्क को काफी हद तक कम किया जा सकता है।”
IVF शुरू करने से पहले किन बातों का रखें ध्यान?
Dr. Hrishikesh Pai ने बताया कि PMOS से पीड़ित महिलाओं को IVF शुरू करने से पहले कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए।
वजन कंट्रोल करना
Dr. Hrishikesh Pai के अनुसार, “PMOS में महिलाओं का वजन तेजी से बढ़ता है और जब किसी महिला को प्रेग्नेंट होना है, तो उसे अपना वजन कम करना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि कम वजन होने पर हार्मोन तेजी से काम करते हैं और IVF की सफलता की संभावना भी बढ़ सकती है।”
NHS के अनुसार, प्रेग्नेंसी होने और एक स्वस्थ शिशु को जन्म देने के लिए महिला का हेल्दी वजन होना महत्वपूर्ण है। अगर शरीर में बहुत ज्यादा या बहुत कम फैट होता है, तो इंसुलिन और एस्ट्रोजन हार्मोन का संतुलन बिगड़ सकता है। जब वजन बहुत ज्यादा या कम होता है, तो IVF के दौरान ओव्यूलेशन कराने वाली दवाओं का असर बहुत धीमा होता है और प्रेग्नेंसी के दौरान जेस्टेशनल डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और मिसकैरेज का खतरा बढ़ सकता है।

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ब्लड शुगर चेक कराना जरूरी
Dr. Hrishikesh Pai कहते हैं कि PMOS के कारण शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ती है और महिलाओं को प्रीडायबिटीज या डायबिटीज होने का रिस्क बहुत ज्यादा रहता है। इसलिए PMOS की बीमारी होने पर ब्लड शुगर का रेगुलर टेस्ट कराना चाहिए। जब IVF शुरू किया जाता है, तो महिला का पहले ब्लड शुगर, HbA1c और अन्य जरूरी चेकअप कराना महत्वपूर्ण होता है। अगर किसी महिला को डायबिटीज है, तो उसे कंट्रोल करना बहुत जरूरी होत है।
हेल्दी डाइट अपनाएं
Dr. Hrishikesh Pai ने बताया कि IVF शुरू करने से पहले महिलाओं को हेल्दी डाइट लेनी चाहिए। इसमें प्रोटीन, साबुत अनाज, हरी सब्जियां, फल, दालें और हेल्दी फैट शामिल करना चाहिए। इसके अलावा, महिलाओं को जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक्स, प्रोसेस्ड फूड और बहुत मीठी चीजों से परहेज करना चाहिए।
रेगुलर एक्सरसाइज करना
Dr. Hrishikesh Pai ने कहा, “PMOS से पीड़ित महिलाओं को IVF शुरू कराने से पहले रेगुलर फिजिकल एक्टिविटीज पर ध्यान देना चाहिए। महिलाओ को रोजाना 0 से 45 मिनट तेज चलना, योग, स्विमिंग या हल्की एक्सरसाइज करनी चाहिए। इससे इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार हो सकता है। हालांकि, IVF प्रक्रिया शुरू होने के बाद किसी भी तरह की एक्सरसाइज डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करनी चाहिए।
IVF के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
Dr. Hrishikesh Pai ने PMOS से पीड़ित महिलाओं को सलाह दी है कि उन्हें IVF के दौरान कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।
- डॉक्टर ने जो भी हार्मोन इंजेक्शन या दवाएं दी हैं, उसे समय पर लेना चाहिए।
- डॉक्टर ने जिस समय अल्ट्रासाउंड और फॉलिकल मॉनिटरिंग टेस्ट कराने की सलाह दी है, उसे मिस न करें।
- किसी भी हर्बल दवा, आयुर्वेदिक सप्लीमेंट या घरेलू नुस्खे का इस्तेमाल बिना डॉक्टर की सलाह के न करें।
- पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं और शरीर को हाइड्रेट रखें।
- स्मोकिंग, शराब और तंबाकू का इस्तेमाल बिल्कुल न करें।
- महिलाएं खुद को स्ट्रेस फ्री रखें और शरीर को आराम दें।
क्या PMOS में IVF की सफलता अच्छी होती है?
Dr. Hrishikesh Pai कहते हैं, “अक्सर PMOS से पीड़ित महिलाएं मेरे से यही सवाल करती हैं और मेरा जवाब होता है कि PMOS वाली महिलाओं में अक्सर एग्स की संख्या अच्छी होती है। इसलिए सही समय पर इलाज कराने पर सफलता की संभावना काफी अच्छी हो सकती है। हालांकि, IVF की सफलता महिला की उम्र, एग्स की क्वालिटी, यूटरस की क्षमता, वजन, पुरुषों की स्पर्म क्वालिटी और मेडिकल कंडीशन्स पर निर्भर करती है।”
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निष्कर्ष
Dr. Hrishikesh Pai ने बताया कि PMOS होने का यह कतई मतलब नहीं है कि वे महिलाएं प्रेग्नेंट नहीं हो सकती। बस, इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अगर महिला को पता है कि वह PMOS से पीड़ित है और एक साल से ज्यादा समय से कोशिश करने के बाद भी प्रेग्नेंट नहीं हो पा रही, तो उसे तुर्ंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। सभी मेडिकल टेस्ट करने के बाद डॉक्टर महिला को IVF की सलाह दे सकते हैं।
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FAQ
क्या पुरुष साथी के स्पर्म की गुणवत्ता भी मायने रखती है?
IVF की सफलता 50% महिला के अंडे और 50% पुरुष के स्पर्म पर निर्भर करती है। अगर PMOS के साथ-साथ पार्टनर के स्पर्म काउंट या मोटिलिटी में कमी है, तो डॉक्टर साधारण IVF के बजाय ICSI तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें एक स्वस्थ स्पर्म को सीधे अंडे में इंजेक्ट किया जाता है।फ्रोजन एम्ब्रियो ट्रांसफर (FET) PMOS मरीजों के लिए क्यों बेहतर माना जाता है?
PMOS में अंडों की संख्या अधिक होने के कारण OHSS (ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम) यानी ओवरी में सूजन का खतरा रहता है। इसलिए डॉक्टर अंडे निकालकर लैब में एम्ब्रियो बनाने के बाद उन्हें फ्रीज कर देते हैं। अगले साइकिल में जब शरीर का हार्मोनल लेवल पूरी तरह नॉर्मल हो जाता है, तब फ्रोजन भ्रूण ट्रांसफर (FET) किया जाता है, जिससे सफलता की दर बढ़ जाती है।
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Jul 21, 2026 16:54 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Hrishikesh D Pai