Laparoscopic Ovarian Drilling in PCOS in Hindi: PCOS में महिलाएं कंसीव करने के लिए कई तरह के ट्रीटमेंट आजमाती हैं। लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग (LOD) एक ऐसी ही छोटी सर्जरी है, जो कुछ महिलाओं में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम के कारण होने वाली इनफर्टिलिटी के इलाज के लिए की जाती है। PCOS एक हार्मोन से जुड़ी समस्या है, जिसमें ओवरी से अंडा सही समय पर नहीं निकलता। इस कारण महिलाओं के लिए कंसीव करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जब PCOS की महिलाओं के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव, वजन कम करने और दवाइयों से ओवुलेशन करवाना नाकाम हो जाता है, तो लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग करवाना फायदेमंद हो सकता है। ऐसे में आइए Dr. M. V. Jyothsna, Consultant Obstetrician & Gynaecologist, Yashoda Hospitals, Hyderabad से जानते हैं कि लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग क्या है और यह PCOS में कैसे फायदेमंद होता है।
लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग कैसे की जाती है?
डॉ. एम. वी. ज्योत्सना ने बताया कि, लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग सर्जरी जनरल एनेस्थीसिया यानी पूरी तरह बेहोश करके की जाती है और इसमें लैप्रोस्कोपी यानी छोटे चीरे वाली सर्जरी का इस्तेमाल किया जाता है।
- इस सर्जरी को करने के लिए पेट में छोटे-छोटे कट लगाए जाते हैं।
- सर्जरी के दौरान एक पतला कैमरा और छोटा इक्विपमेंट शरीर के अंदर डाला जाता है।
- इसकी मदद से डॉक्टर ओवरी की बाहरी सतह पर छोटे-छोटे छेद बनाते हैं।
- यह छेद इलेक्ट्रिक करंट या लेजर से किए जाते हैं।
- इन छेदों से ओवरी के उस हिस्से को कम किया जाता है जो ज्यादा एंड्रोजन बनाता है।
बता दें कि PCOS से पीड़ित महिलाओं में अक्सर एंड्रोजन का स्तर बढ़ा हुआ होता है, जो फॉलिकल के सामान्य विकास और ओव्यूलेशन में रुकावट का कारण बनता है। एंड्रोजन के प्रोडक्शन को कम करके, LOD हार्मोनल संतुलन को फिर से ठीक करने में मदद करती है, जिससे फॉलिकल मैच्योर हो पाते हैं और ओव्यूलेशन ज्यादा नियमित रूप से फिर शुरू हो पाता है।
2025 में यूरोपियन जर्नल ऑफ कार्डियोवैस्कुलर मेडिसिन में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम में महिलाओं में ओव्यूलेशन बेहतर करने और पीरियड को नियमित करने के लिए लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग एक बहुत ही उपयोगी ट्रीटमेंट है। यह प्रक्रिया टेस्टोस्टेरोन और LH के लेवल को काफी कम करती है। इसके साथ ही ओव्यूलेशन और पीरियड साइकिल में सुधार करती है, जिससे प्रजनन क्षमता बेहतर होती है।
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लेप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग कैसे फायदेमंद होती है?
2020 में International Journal Of Molecular Sciences में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार, लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग उन महिलाओं के लिए एक असरदार इलाज है, जो PCOS की वजह से इनफर्टिलिटी का सामना कर रही हैं। यह खासतौर पर उनके लिए फायदेमंद है, जिन पर क्लोमिफेन साइट्रेट दवा का असर नहीं होता या जिन्हें अपनी अन्य समस्याओं के लिए सर्जरी की जरूरत होती है। लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग शरीर में चल रहे एक खराब साइकिल को तोड़ देता है। इस साइकिल में इंफ्लेमेशन, ऑक्सीडेटिव तनाव, पुरुष हार्मोन का बढ़ना, इंसुलिन का बढ़ना, इंसुलिन रेजिस्टेंस, इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएं शामिल होती हैं, जिसे लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग ठीक करने में मदद कर सकता है। PCOS में महिलाओं में एंड्रोजन हार्मोन का लेवल बहुत ज्यादा बढ़ जाता है, जिससे अंडा बनने और निकलने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इस प्रक्रिया से महिलाओं को कई तरह के फायदे होते हैं, जैसे-
- PCOS से पीड़ित महिलाओं में एंड्रोजन हार्मोन कम होता है।
- महिलाओं के शरीर में हार्मोन संतुलन बेहतर होता है।
- अंडा बनने और निकलने की प्रक्रिया यानी ओवुलेशन नॉर्मल हो सकती है।
- कंसीव करने की संभावना बढ़ाने में मदद मिलती है।
किन महिलाओं के लिए लेप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग उपयोगी है?
डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के मुताबिक, लेप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग PCOS से पीड़ित उन महिलाओं के लिए फायदेमंद होता है-
- जिन पर ओवुलेशन की दवाइयां असर नहीं करतीं। अक्सर पीसीओएस में कुछ दवाइयां अंडे बनाने में नाकाम हो जाती हैं, जिसे क्लोमीफीन रेजिस्टेंस कहते हैं। ऐसी स्थिति में LOD ओवरी की बाहरी परत को हल्का सा जला देता है, जिससे हार्मोनल रुकावट दूर होती है और अंडे नेचुरल तरीके से बनते हैं।
- PCOS में जो महिलाएं बार-बार हार्मोन इंजेक्शन लेने से बचना चाहती हैं, उनके लिए भी यह फायदेमंद होता है। LOD एक बार होने वाली सर्जिकल प्रक्रिया है, जो महिला को दर्द देने वाले हार्मोनल इंजेक्शनों के साइकिल से बचा सकती है।
- कुछ महिलाओं की ओवरी ऐसी हो जाती हैं कि वे हाई डोज दवाइयों पर भी रिएक्ट नहीं करती हैं। ऐसे में इस सर्जरी के बाद ओवरी के अंदर मौजूद एंड्रोजन का लेवल गिर जाता है, जिससे ओवरी ज्यादा सेंसिटिव हो जाती है। इसके साथ ही, कम डोज वाली दवाइयां भी बेहतर रिजल्ट दे सकती हैं।
2020 में International Journal Of Molecular Sciences में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार, लेप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग तकनीक के फायदे यह हैं कि इससे महिलाएं बहुत जल्दी प्रेग्नेंट हो सकती हैं और अंडों के बनने की संभावना काफी बढ़ जाती है। खास बात यह है कि लगभग आधी महिलाएं बिना किसी और दवा के नेचुरल तरीके से ही मां बन पाती हैं।
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क्या लेप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग से PCOS पूरी तरह ठीक हो जाता है?
डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के अनुसार, लेप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग कुछ महिलाओं के लिए असरदार है, लेकिन यह PCOS का कोई पक्का इलाज नहीं होता है। यह एक लंबे समय तक चलने वाला मेटाबॉलिक और एंडोक्राइन डिसऑर्डर है और अनियमित पीरियड्स, इंसुलिन रेजिस्टेंस, एक्ने और वजन बढ़ने जैसे लक्षणों के लिए सही केयर की जरूरत पड़ सकती है। यह एक फर्टिलिटी ट्रीटमेंट है, जिसका काम उन महिलाओं में ओवुलेशन शुरू करना है जो कंसीव करना चाहती हैं। इसलिए, लेप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग सिर्फ कंसीव करने की स्थिति को आसान बनाता है। PCOS को पूरी तरह मैनेज करने के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव ही सबसे बेहतर तरीका होता है।
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लेप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग के जोखिम कारक
डॉ. एम. वी. ज्योत्सना कहते हैं कि किसी भी सर्जरी की तरह, लेप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग सर्जरी प्रक्रिया में भी कुछ जोखिम कारक होते हैं, जिनमें शामिल हैं-
- ब्लीडिंग होना
- इंफेक्शन का खतरा
- सर्जरी के आस-पास के अंगों को नुकसान पहुंचना
- एनेस्थीसिया से जुड़ी समस्याएं होना
इसके अलावा, पेल्विक एडहेसन्स (अंदरूनी घाव के टिशू) का बनना भी एक परेशानी का कारण है, जो आगे चलकर महिलाओं की प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इतना ही नहीं, ड्रिलिंग से ओवेरियन रिजर्व भी कम हो सकता है, इसलिए यह प्रक्रिया किसी एक्सपर्ट द्वारा ही करवानी चाहिए।
लेप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग सर्जरी के बाद रिकवरी में समय
डॉ. एम. वी. ज्योत्सना बताते हैं कि ओपन सर्जरी के मुकाबले इसमें रिकवरी आमतौर पर जल्दी होती है और ज्यादातर मरीजों को 24 घंटे के अंदर डिस्चार्ज मिल जाता है और वे घर चले जाते हैं। इसके साथ ही, वे मरीज कुछ ही दिनों में हल्की-फुल्की शारीरिक गतिविधियां भी दोबारा शुरू कर सकते हैं। इन मरीजों को पूरी तरह ठीक होने में 1 से 2 हफ्ते तक का समय लग सकता है। रिकवरी के दौरान मरीजों को पेट में हल्का-फुल्का दर्द और थकान की समस्या महसूस हो सकती है।
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डॉक्टर से कब मिलें?
PCOS में लेप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग के लिए आपको डॉक्टर से तब मिलना जरूरी है, जब लाइफस्टाइल में हेल्दी बदलाव और ओवुलेशन की शुरुआती दवाइयां लेने के बाद भी कम से कम 3 से 6 महीनों तक अंडे सही तरह से नहीं बनते हैं। इस स्थिति में आप कंसीव करने की कोशिश कर रही हैं और ओवरी दवाओं को लेकर रेजिस्टेंस कर रही है तो यह सर्जरी एक बेहतर विकल्प हो सकती है। इसके अलावा, अगर महंगे और बार-बार लगने वाले हार्मोनल इंजेक्शन से परेशान हैं तो भी इस ट्रीटमेंट के लिए डॉक्टर से मिलना जरूरी है।
निष्कर्ष
लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग सर्जरी PCOS से पीड़ित उन महिलाओं के लिए एक उपयोगी विकल्प हो सकता है, जिन्हें PCOS से जुड़ी इनफर्टिलिटी की समस्या है और जिन पर नॉर्मल ट्रीटमेंट का कोई असर नहीं होता है। इस सर्जरी के तरीके को अपनाने का फैसला लेने से पहले जरूरी है कि महिलाएं डॉक्टर से कंसल्ट करें और प्रजनन क्षमता की स्थिति, हार्मोन की जांच और इस सर्जरी के फायदे और जोखिम दोनों के बारे में अच्छे से जानकारी इकट्ठा करें।
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FAQ
PCOS दर्द कहां स्थित है?
PCOS में दर्द आमतौर पर पेट के निचले हिस्से, पेल्विक एरिया और पीठ के निचले हिस्से में दर्द या ऐंठन की समस्या हो सकती है। यह दर्द आमतौर पर पीरियड्स के दौरान या ओव्यूलेशन के समय महसूस हो सकता है।PCOS में क्या नहीं खाना चाहिए?
PCOS में हार्मोनल असंतुलन और इंसुलिन रेजिस्टेंस को कंट्रोल करने के लिए चीनी, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, प्रोसेस्ड फूड्स, फ्राइड फूड्स और ज्यादा फैट वाले डेयरी प्रोडक्ट्स से परहेज करना चाहिए।बिगड़ते पीसीओएस के लक्षण क्या हैं?
PCOS बिगड़ने पर महिलाओं के शरीर में कई तरह के लक्षण नजर आ सकते हैं, जिसमें ज्यादा अनियमित या मिस पीरियड्स, वजन का तेजी से बढ़ना, चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल, एक्ने और बालों के झड़ने की समस्या बढ़ सकती है।पीसीओएस किस उम्र में होता है?
PCOS की समस्या आमतौर पर किशोरावस्था से लेकर 30 से 35 साल की फर्टिलिटी उम्र वाली महिलाओं को हो सकता है। हालांकि, यह हार्मोनल असंतुलन की समस्या कभी भी हो सकती है, जिसमें लक्षण पहले पीरियड्स के समय से ही या बाद में भी नजर आ सकते हैं।
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Apr 14, 2026 12:27 IST
Modified By : Katyayani Tiwari Apr 14, 2026 12:27 IST
Published By : Katyayani Tiwari
Reviewed By : Dr M V Jyothsna