Fri Sep 11, 2026 | 06:53 PM IST

Medically Reviewed by Dr Nitu Pandey , Radiation Oncologist

क्या बिना स्मोकिंग के भी हो सकता है फेफड़ों का कैंसर? जानें क्या कहते हैं डॉक्टर?

फेफड़ों का कैंसर सिर्फ स्मोकिंग करने वालों को ही नहीं, बल्कि बिना स्मोकिंग करने वालों को भी हो सकता है। वायु प्रदूषण, पैसिव स्मोकिंग, रेडॉन गैस और जेनेटिक कारण इसके मुख्य जोखिम कारक हैं। 

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जब भी फेफड़ों के कैंसर का नाम आता है तो सबसे पहले दिमाग में सिगरेट और तंबाकू का ही ख्याल आता है। यही कारण है कि ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि लंग कैंसर सिर्फ सिगरेट पीने वाले लोगों को ही होता है। हालांकि, यह सच नहीं है, फेफड़ों का कैंसर स्मोकिंग न करने वाले लोगों में भी हो सकता है। वायु प्रदूषण, पैसिव स्मोकिंग और जेनेटिक जैसे कारण फेफड़ों के कैंसर का कारक बन सकते हैं। आइए इस लेख में नोएडा के फोर्टिस हॉस्पिटल के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग की कंसल्टेंट डॉ. नीतू पांडे और डॉ. चिराग भिरुड, सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, वेंसर हॉस्पिटल, पुणे से जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।

क्या स्मोकिंग न करने वालों को भी फेफड़ों का कैंसर हो सकता है?

डॉ. नीतू पांडे का कहना है कि बिना स्मोकिंग किए भी किसी व्यक्ति को लंग कैंसर यानी फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। हालांकि, स्मोकिंग को इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण माना जाता है, लेकिन विश्वस्तर और भारतीय आंकड़ों के अनुसार, फेफड़ों के कैंसर के कुल मामलों में से एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों का होता है, जिन्होंने कभी भी अपने जीवन में स्मोकिंग नहीं की होती है।

Centers for Disease Control and Prevention के Lung Cancer जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, अमेरिका में, फेफड़ों के कैंसर के लगभग 10% से 20% मामले यानी हर साल 20,000 से 40,000 मामले, ऐसे लोगों में होते हैं जिन्होंने कभी स्मोकिंग नहीं की या जिन्होंने अपनी जिंदगी में 100 से कम सिगरेट पी हैं। रिसर्च करने वालों का अनुमान है कि फेफड़ों के कैंसर के इन मामलों में से लगभग 7,300 मामले सेकंड हैंड स्मोक और लगभग 2,900 मामले रेडॉन गैस की वजह से होते हैं।

बिना स्मोकिंग के लंग कैंसर क्यों हो सकता है?

डॉ. चिराग भिरुड के अनुसार, कैंसर तब विकसित होता है, जब सेल्स के डीएनए में ऐसे बदलाव होने लगते हैं, जिनसे सेल्स बढ़ने और उनका विभाजन अनियंत्रित हो जाता है। ये बदलाव सिर्फ तंबाकू के धुएं से ही नहीं, बल्कि प्रदूषण, रेडिएशन, कुछ केमिकल्स और शरीर में होने वाली नेचुरल प्रक्रियाओं से भी हो सकते हैं।

साल 2025 में JAMA जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, नॉन-स्मोकर्स में सबसे आम कैंसर एडेनोकार्सिनोमा (60-80%) होता है, जो फेफड़ों के कैंसर का एक प्रकार है। इसके होने के मुख्य कारणों में जेनेटिक, दूसरों के सिगरेट का धुएं, वायु प्रदूषण और रेडॉन जैसी गैसें शामिल हैं।

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1. सेकंड-हैंड स्मोक

अगर कोई व्यक्ति खुद सिगरेट नहीं पीता है, लेकिन घर, ऑफिस या किसी अन्य जगह पर लगातार दूसरों के तंबाकू के धुएं के संपर्क में रहता है तो इसे पैसिव स्मोकिंग या सेकंड हैंड स्मोक कहा जाता है। यह सुरक्षित नहीं होता है, क्योंकि इसका स्मोक कैंसर पैदा करने वाले केमिकल को स्मोकिंग न करने वालों के फेफड़ों तक पहुंचा सकता है।

2. वायु प्रदूषण

लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से फेफड़ों पर असर पड़ सकता है। खासकर बहुत छोटे कण, जैसे PM2.5, सांस के साथ फेफड़ों के अंदर तक पहुंच सकते हैं।

3. काम की जगह पर केमिकल का संपर्क

कुछ लोगों को अपने काम के दौरान ऐसे पदार्थों के संपर्क में रहना पड़ता है, जो फेफड़ों के कैंसर के खतरे को बढ़ाते हैं। इनमें एस्बेस्टस, आर्सेनिक, क्रोमियम, निकेल, बेरिलियम और कैडमियम जैसे पदार्थ होते हैं। ऐसी जगहों पर काम करने वाले लोगों में फेफड़े का कैंसर होने की संभावना ज्यादा होती है।

4. रेडॉन गैस का खतरा

रेडॉन एक नेचुरल रेडियोएक्टिव गैस है, जो जमीन और चट्टानों से निकल सकती है और इमारतों के अंदर जमा हो सकती है। लंबे समय तक रेडॉन को सांस के जरिए अंदर लेना फेफड़ों के सेल्स को नुकसान पहुंचा सकता है और कैंसर का जोखिम बढ़ा सकता है। यह जोखिम स्मोकिंग न करने वालों में भी होता है।

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5. जेनेटिक और अन्य कारण

कुछ लोगों में पारिवारिक या जेनेटिक सेंसिटिविटी भी फेफड़ों के कैंसर में अहम भूमिका निभा सकती है। इसके अलावा, पहले से मौजूद कुछ फेफड़ों की बीमारियां और अन्य बायोलॉजिकल प्रक्रियाएं भी जोखिम से जुड़ी हो सकती हैं।

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कौन से लक्षण नजरअंदाज नहीं करने चाहिए?

डॉ. नीतू पांडे कहती हैं कि स्मोकिंग न करने वाले व्यक्ति को भी लंबे समय तक रहने वाली खांसी को सिर्फ मौसम या एलर्जी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार खांसी, सांस फूलना, सीने में दर्द, आवाज में बदलाव, बार-बार सीने में इंफेक्शन, बिना कारण वजन कम होना या खांसी में खून आना जैसे लक्षण होने पर डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। इनमें से किसी लक्षण का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को फेफड़ों का कैंसर है। इनके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं, लेकिन लक्षण लगातार बने रहें या बढ़ते जाएं तो मेडिकल कंसल्ट करना जरूरी है।

फेफड़े के कैंसर से बचाव कैसे करें?

डॉ. चिराग भिरुड के मुताबिक, फेफड़े के कैंसर से बचाव के लिए इन बातों का ध्यान रखें

  • तंबाकू के धुएं से दूर रहना, जिसमें सेकड-हैंड स्मोक भी शामिल है।
  • वायु प्रदूषण वाले क्षेत्रों में बिना काम लंबे समय तक रहने से बचें
  • जरूरत पड़ने पर प्रदूषण वाले स्थान पर सही सुरक्षा उपायों को अपनाएं
  • ऑफिस पर एस्बेस्टस या अन्य खतरनाक केमिकल के संपर्क की स्थिति में सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करें।

डॉक्टर से कब मिलें?

डॉ. चिराग भिरुड का कहना है कि अगर 3 हफ्ते से ज्यादा समय तक खांसी बनी रहे, खांसी में खून आए, लगातार सीने में दर्द हो, सांस फूलने लगे या बिना किसी कारण वजन कम होने लगे, तो इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्मोकिंग न करने वाले लोगों में ये लक्षण फेफड़ों के कैंसर का संकेत होते हैं, जिसमें तुरंत डॉक्टर से मिलने की जरूरत है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार स्कैन, टिश्यू जांच और अन्य टेस्ट की मदद से सही बीमारी की पहचान और इलाज तय कर सकते हैं।

निष्कर्ष

बिना स्मोकिंग के भी फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। स्मोकिंग इसका सबसे बड़ा जोखिम कारक है, लेकिन सेकंड-हैंड स्मोक, वायु प्रदूषण, रेडॉन, काम की जगह पर किसी केमिकल के संपर्क में आना और जेनेटिक कारणों से भी फेफड़ों का कैंसर हो सकता है। इसलिए, स्मोकिंग न करने वाले व्यक्ति को भी लगातार या असामान्य सांस से जुड़े लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर डॉक्टर से जांच कराने और सही इलाज की मदद से कैंसर को समय पर रोका जा सकता है।
Image Credit: Freepik

FAQ

  • क्या बिना स्मोकिंग वाले फेफड़ों के कैंसर की पहचान करना मुश्किल होता है?

    नॉन-स्मोकर्स में फेफड़ों के कैंसर की समय पर पहचान कई बार मुश्किल हो सकती है। डॉक्टर आमतौर पर स्मोकिंग करने वालों में ही इस बीमारी की ज्यादा आशंका जताते हैं। ऐसे में नॉन-स्मोकर्स को जब लंबे समय तक खांसी या सांस की समस्या होती है, तो वे इसे आम इंफेक्शन समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।
  • क्या डाइट का भी नॉन-स्मोकर्स में फेफड़ों के कैंसर से कोई कनेक्शन है?

    सीधे तौर पर डाइट फेफड़ों के कैंसर का कारण नहीं बनती है, लेकिन एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर आहार फेफड़ों के सेल्स को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और प्रदूषण से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद करते हैं।

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Disclaimer

इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

कात्यायनी तिवारी पिछले 6 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज चैनल से की और बाद में डिजिटल मीडिया में हेल्थ और लाइफस्टाइल विषयों पर काम करना शुरू किया। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं।वह महिला स्वास्थ्य, पोषण, आयुर्वेद, योग, स्किन हेल्थ और प्रेग्नेंसी जैसे विषयों पर लिखती हैं। उनका प्रयास रहता है कि ताजा रिसर्च, विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय और प्रमाणित स्रोतों के आधार पर सही स्वास्थ्य जानकारी सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचे। जिन लेखों में मेडिकल पुष्टि जरूरी होती है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है।OnlyMyHealth से पहले वह Jantantra TV और Boldsky के साथ काम कर चुकी हैं।

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    Aug 14, 2026 15:12 IST

    Modified By : Katyayani Tiwari
  • Aug 14, 2026 15:12 IST

    Published By : Katyayani Tiwari
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