अक्सर लोगों का सवाल होता है कि जब दो लोग एक जैसे वातावरण में रहते हैं, इसके बावजूद एक को कैंसर होता है और दूसरे को नहीं। अब इसके कारणों को हाल ही में हुई स्टडी में विस्तार से बताया है। वैज्ञानिकों ने पहली बार ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण पेश किए हैं, जिनसे पता चलता है कि हमारे वंशानुगत जीन (Inherited Genes) कैंसर के रिस्क को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसका मतलब यह है कि सिर्फ स्मोकिंग, प्रदूषण या धूप ही नहीं, बल्कि हमारी आनुवंशिक बनावट भी यह तय करती है कि डीएनए को हुए नुकसान से हमारा शरीर कितनी अच्छी तरह निपट पाता है।
क्या कहती है नई रिसर्च?
Nature में प्रकाशित इस अध्ययन को यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज, यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग और यूरोप व अमेरिका के कई वैज्ञानिक संस्थानों के रिसर्चर्स ने मिलकर किया। रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि किसी व्यक्ति की आनुवंशिक संरचना यह तय कर सकती है कि पर्यावरण से होने वाला डीएनए डैमेज शरीर में किस हद तक म्यूटेशन में बदलता है और आगे चलकर ट्यूमर बनने का रिस्क कितना बढ़ता है। यह पहली बार हुआ है कि रिसर्चर्स ने पाया कि वंशानुगत जीन और जिंदगीभर होने वाले डीएनए म्यूटेशन मिलकर कैंसर होने की दिशा तय करते हैं। इस रिसर्च से कैंसर से जुड़ी कई बातें साफ हुई है।
हर स्मोकिंग करने वाले को फेफड़ों का कैंसर क्यों नहीं होता?
अक्सर देखा जाता है कि कई लोग सालों तक स्मोकिंग करते हैं, लेकिन उन्हें कभी फेफड़ों का कैंसर नहीं होता। वहीं कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिन्होंने कभी सिगरेट नहीं पी, फिर भी उन्हें लंग कैंसर हो जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि व्यक्ति की जेनेटिक प्रोफाइल भी जिम्मेदार होती है। कुछ लोगों के शरीर में मौजूद जीन डीएनए को हुए नुकसान की बेहतर मरम्मत कर लेते हैं, जबकि कुछ लोगों में यही क्षमता थोड़ी कम होती है। ऐसे में समान रिस्क होने के बावजूद कैंसर का खतरा अलग-अलग हो सकता है।
DNA डैमेज से कैंसर का खतरा कैसे होता है?
हमारे शरीर की हर कोशिका में डीएनए मौजूद होता है, जो कोशिकाओं को सही तरीके से काम करने के निर्देश देता है, लेकिन जब स्मोकिंग या यूवी किरणें, प्रदूषण या अन्य कारणों डीएनए को बार-बार नुकसान पहुंचता है, तो उसमें बदलाव होने लगते हैं। अगर शरीर समय रहते इन बदलावों को ठीक नहीं कर पाता, तो कोशिकाएं अनियंत्रित तरीके से बढ़ने लगती हैं और यही आगे चलकर ट्यूमर या कैंसर का रूप ले सकती हैं। हालांकि, हर डीएनए डैमेज कैंसर में नहीं बदलता। यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति के जीन उस नुकसान को कितनी प्रभावी तरह से ठीक कर पाते हैं।

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स्टडी से कैंसर के इलाज पर असर पड़ सकता है?
इस रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भविष्य में कैंसर की रोकथाम और स्क्रीनिंग सभी लोगों के लिए एक जैसी नहीं होगी। रिसर्चर्स का मानना है कि आगे चलकर किसी व्यक्ति के जेनेटिक रिस्क प्रोफाइल के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि उसे किस उम्र में स्क्रीनिंग शुरू करनी चाहिए, कितनी बार जांच करानी चाहिए और किन रिस्क फैक्टर्स से ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है।
लाइफस्टाइल में किस तरह के बदलाव करने चाहिए?
रिसर्च में साफ किया गया है कि अच्छी अनुवंशिक बनावट होने के बावजूद लोगों को स्मोकिंग, तंबाकू, तेज धूप और अनहेल्दी आदतों से दूरी बनाना भी जरूरी है। फेफड़ों के कैंसर की बड़ी वजह स्मोकिंग हो सकती है और लंबे समय तक तेज धूप में रहने से स्किन कैंसर का खतरा बढ़ सकता है, इसलिए सेहतमंद जीवनशैली अपनाना बहुत जरूरी है।
निष्कर्ष
इस रिसर्च में बताया गया है कि कैंसर का खतरा काफी हद तक पर्यावरण, आदतों और अनुवांशिक बनावट, तीनों पर निर्भर करता है। व्यक्ति की अनुवांशिक जेनेटिक जीन यह प्रभावित करती है कि स्मोकिंग, यूवी किरणें जैसे फैक्टर्स से होने वाला डीएनए डैमेज किस तरह म्यूटेशन में बदलता है और ट्यूमर बनने की प्रक्रिया को कितना प्रभावित करता है।
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Jul 28, 2026 19:19 IST
Published By : Aneesh Rawat