क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन का मतलब होता है कि लंबे समय तक चलने वाली इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया है, जिसमें शरीर का तेजी से हेल्दी टिश्यूज और अंगों पर ही हमला करने लगता है। आमतौर पर आपने देखा होगा कि चोट ठीक होने के बाद सूजन कम हो जाती है, लेकिन क्रॉनिक इंफ्लेमेशन में ऐसा नहीं होता है। इसके ठीक विपरीत क्रॉनिक इंफ्लेमेशन होने पर यह सूजन बनी रहती है। ऐसा बढ़ते तनाव, खराब खान-पान और ऑटोइम्यून से जुड़ी बीमारियों के कारण हो सकता है। कई बार क्रॉनिक इंफ्लेमेशन असहजता का बड़ा कारण होता है। इसलिए, यहां यह सवाल जरूर उठता है कि क्या इसका मेंटल हेल्थ पर भी असर पड़ सकता है? आइए, जानते हैं ग्रेटर नोएडा स्थित सर्वोदय अस्पताल में Director-Neurology डॉ. अभिनव गुप्ता से।
क्या क्रॉनिक इंफ्लेमेशन मेंटल हेल्थ को भी प्रभावित करती है?
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साल 2025 में BMJ Journals में प्रकाशित मेडिकल रिसर्च से यह पता चलता है कि जो लोग ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित होते हैं, उनमें डिप्रेशन, एंग्जायटी और बाइपोलर डिसऑर्डर जैसी मानसिक समस्याओं का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में दोगुना हो जाता है। हालांकि, रिसर्चर स्पष्ट करते हैं कि यह एक ऑब्जर्वेशनल स्टडी है, इसलिए यह सीधे तौर पर कारण और प्रभाव को साबित नहीं करती है। बहरहाल, आपको बता दें कि जब किसी को ऑटोइम्यून डिजीज होता है, तो अक्सर इम्यून सिस्टम गलती से शरीर के हेल्दी सेल्स और टिश्यूज को अटैक करती रहता है, जिससे क्राॅनिक इंफ्लेमेशन का रिस्क बढ़ जाता है।
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क्रॉनिक इंफ्लेमेशन मेंटल हेल्थ को कैसे प्रभावित करती है?
न्यूरोट्रांसमीटर में गड़बड़ी हो जानाः जब शरीर में सूजन बढ़ती है, तो कुछ खास तरह के प्रोटीन्स (जिन्हें इंफ्लेमेटरी साइटोकिन्स कहते हैं) एक्टिव हो जाते हैं। ये प्रोटीन्स दिमाग के उन केमिकल्स को बिगाड़ देते हैं जो हमें खुश रखते हैं। यही नहीं, न्यूरोट्रांसमीटर में गड़बड़ी के कारण डोपामाइन हार्मोन के काम करने के तरीके में बदलाव होने लगता है। ऐसे में व्यक्ति बहुत ज्यादा उदास, थकान आदि महसूस करता है।
मूड पर गहरा असरः अगर क्राॅनिक सूजन है, तो इसकी वजह से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा हो जाता है। यह तनाव हमारे दिमाग के लिए सही नहीं है, क्योंकि इसकी वजह से उन सेल्स को सीधे नुकसान पहुंचता है, जो हमारे मूड को नियंत्रित करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पुरानी सूजन मुख्य रूप से दिमाग के दो हिस्सों को प्रभावित करता है। इसकी वजह से हमारे फैसले लेने की और भावनाओं को संभालने की क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में तनाव, चिंता बढ़ने लगती है।
अवसाद और थकानः 2019 में Frontiers in Immunology में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, डिप्रेशन और थकान सीधे तौर पर शरीर के इम्यून सिस्टम में पुरानी सूजन से संबंध रखते हैं। शोधकर्ताओं की मानें, तो जब इम्यून सिस्टम बहुत ज्यादा सक्रिय हो जाता है, तो इसकी वजह से दिमाग का फंक्शन प्रभावित होता है, जिससे मानसिक और शारीरिक कमजोरी आती है। अगर समय रहते स्थिति को पहचाना न जाए, तो भविष्य में यह अवसाद का रूप भी ले सकती है।
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पुरानी सूजन को मैनेज कैसे करें?
चूंकि, यह स्पष्ट है कि पुरानी सूजन और मानसिक स्वास्थ्य का गहरा संबंध है। इसलिए, बहुत जरूरी है कि अगर किसी को क्राॅनिक इंफ्लेमेशन है, तो वे कुछ जरूरी टिप्स अपनाएं, जैसे-
डाइट में सुधार करेंः क्राॅनिक इंफ्लेमेशन होने की स्थिति में मरीज को एंटी-इंफ्लेमेटरी डाइट फाॅलो करनी चाहिए। इसके लिए, ओमेगा फैटी एसिड, जैसे अखरोट और फ्लैकसीड का सेवन करना चाहिए। इसी तरह, एंटीऑक्सीडेंट्स और प्रोबायोटिक्स भी स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकते हैं।
करें एक्सरसाइजः क्राॅनिक इंफ्लेमेशन जैसी स्थिति में नियमित रूप से एक्सरसाइज करना काफी फायदेमंद होता है। विशेषज्ञों की मानें, तो रोजाना 30 मिनट की एक्सरसाइज करना काफी होता है। इसमें योग और वाॅक आदि हल्की एक्सरसाइज पर अधिक जोर दें।
तनाव को मैनेज करेंः विशेषज्ञ साफ सलाह देते हैं कि अगर किसी को क्राॅनिक इंफ्लेमेशन है, तो उन्हें अपने तनाव के स्तर को कम करना चाहिए। इसके लिए मेडिटेशन करना चाहिए और जरूरी हो, तो काॅग्नीटिक बिहेवियरल थेरेपी भी की जा सकती है।
नींद पर जोर देंः क्राॅनिक इंफ्लेमेशन होने पर नींद पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए। वैसे तो पर्याप्त नींद लेना हर व्यक्ति के लिए जरूरी है, लेकिन जो लोग क्राॅनिक इंफ्लेमेशन से जूझ रहे हैं, उनके लिए 7-9 घंटो की अनिवार्य होती है। इससे बॉडी रिपेयर मोड में आती है। अच्छी नींद के लिए स्लीप हाइजीन का ध्यान रखें। इसका मतलब है कि सोने से पहले मोबाइल से पूरी तरह दूर हो जाएं। अगर आप सोते हुए खर्राटे लेते हैं, तो एक बार एक्सपर्ट से मिलना जरूरी है।
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डाॅक्टर के पास कब जाएं?
वैसे तो इस कंडीशन में शुरू से ही डॉक्टर के ट्रीटमेंट की जरूरत होती है। अगर आपको समझ नहीं आ रहा है कि डाॅक्टर के पास जाने का सही समय क्या है, तो यहां बताए गए बिंदुओं पर गौर करें-
- अगर याददाश्त कमजोर होने लगे, ब्रेन फाॅग हो और चीजों पर ध्यान लगाना मुश्किल लगने लगे।
- अगर बार-बार मूड स्विंग हो रहा है, चिड़चिड़ापन महसूस हो रहा है और आप अपनी स्थिति को संभाल नहीं पा रहे हैं।
- अगर शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़े, जैसे अचानक वजन का बढ़ना या घटना, हल्का बुखार हो और ग्लैंड में सूजन नजर आए।
निष्कर्ष
क्राॅनिक इंफ्लेमेशन को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए, क्योंकि यह सीधे तौर पर मेंटल हेल्थ को प्रभावित करती है। यही नहीं, डिप्रेशन, मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन आदि के लिए भी क्राॅनिक इंफ्लेमेशन जिम्मेदार हो सकता है। ऐसी कंडीशन से बचने के लिए जरूरी है कि आप समय पर डाॅक्टर के पास जाएं और उनकी दी हुई सलाह को अमल में लाएं।
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FAQ
किस ब्लड टेस्ट कि शरीर में क्रॉनिक इंफ्लेमेशन का पता चलता है?
शरीर में इंफ्लेमेशन का पता लगाने के लिए डॉक्टर CRP (C-Reactive Protein) टेस्ट, ESR (Erythrocyte Sedimentation Rate) और Plasma Viscosity जैसे ब्लड टेस्ट करवाने की सलाह देते हैं।क्या लगातार रहने वाला गुस्सा या चिड़चिड़ापन भी शरीर में सूजन का संकेत हो सकता है?
बिल्कुल। जब इंफ्लेमेटरी साइटोकिन्स दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर (जैसे सेरोटोनिन) को प्रभावित करते हैं, तो बिना किसी बड़े कारण के भी व्यक्ति को गुस्सा, मूड स्विंग्स और गंभीर रूप से चिड़चिड़ापन महसूस हो सकता है।
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Current Version
Jul 09, 2026 10:00 IST
Modified By : Meera Tagore Jul 09, 2026 10:00 IST
Published By : Meera Tagore
Reviewed By : Dr Abhinav Gupta