सेहत के लिए बहुत हानिकारक है एंटीबायोटिक दवा, हर साल इतने लोगों की होती है मौत

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Apr 05, 2018

एंटीबायोटिक दवाओं के हानिकारक प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए एटना इंटरनेशनल ने अपने श्वेत पत्र 'एंटीबायोटिक प्रतिरोध' एक बहुमूल्य चिकित्सा संसाधन की ओर से बेहतर प्रबंध' में इस पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। एंटीमिक्रोबियल प्रतिरोध (एएमआर) से दुनिया भर में हर साल करीब सात लाख लोगों की मौत हो रही है। भारत, विश्व में एंटीबायोटिक दवाओं के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है।

पत्र में कहा गया कि बीमारी का बोझ, खराब सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे, बढ़ती आय और सस्ते एंटीबायोटिक दवाओं की अनियमित बिक्री जैसे कारकों ने भारत में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के संकट को बढ़ा दिया है। एंटीमिक्रोबियल प्रतिरोध (एएमआर) से दुनिया भर में करीब सात लाख लोगों की मौत हो रही है और 2050 तक मृत्यु का आंकड़ा एक करोड़ तक पहुंच सकता है। इन मौतों में बढ़ोतरी का प्रमुख कारण एंटीबायोटिक दवाओं का अनियंत्रित इस्तेमाल है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 2015 में 12 देशों में किए सर्वेक्षण में यह दर्शाया गया कि भारत सहित चार देशों के कम से कम 75 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने पिछले छह महीनों में एंटीबायोटिक प्रयोग किया। ब्रिक्स देशों में एंटीबायोटिक खपत में 99 प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है। पत्र में कहा गया, जितनी तेजी से दुनिया का मेडिकल सेक्टर विकसित हो है उतनी ही तेजी से एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल लोगों में बढ़ता जा रहा है।

दुनिया भर में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के प्रति बढ़ती चिंता पर वी हेल्थ बाई एटना के चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. प्रशांत कुमार दास ने कहा, अधिकांश भारतीय सोचते हैं कि एंटीबायोटिक दवाएं सामान्य सर्दी और गैस्ट्रोएन्टेरिटिस जैसी बीमारियों का इलाज कर सकती हैं, जो गलत धारणा है। इन संक्रमणों में से अधिकांश वायरस के कारण होते हैं और एंटीबायोटिक दवाइयों की उनके इलाज में कोई भूमिका नहीं होती है।

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वहीं एटना इंडिया के प्रबंध निदेशक मानसीज मिश्रा ने कहा, एंटीबायोटिक प्रतिरोध एक संकट है जो विश्व स्तर पर सभी को प्रभावित करता है। एक वैश्विक, बहुमुखी रणनीतिक समाधान के साथ अब हमें इस मुद्दे को हल करने की आवश्यकता है। एंटीबायोटिक दवाओं से होने वाली मौत के आंकड़ों में यूरोप सहित संयुक्त राज्य अमेरिका भी शामिल है। रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक इन दवाओं की बिक्री दुनिया के 76 गरीब देशों में तेजी से हो रही है।

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