ये होते है अंधेरे में सोने के फायदे, जानकर चौंक जाएंगे आप

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
May 08, 2017
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Quick Bites

  • कृत्रिम रोशनी में सोने से डिप्रेशन बढ़ता है।
  • कृत्रिम रोशनी में सोने से मूड में नकारात्मक परिवर्तन होते हैं।
  • कृत्रिम रोश्नी में सोना कैंसर का कारण बन सकता है।

अंधेरे में सोना हमारे लिए क्यों जरूरी है, यह जानने के लिए एक बार पाषाण युग की ओर अग्रसर होते हैं। यदि आपको ज्ञात हो तो उस समय ही नहीं हमेशा से ही इंसान प्राकृतिक लाइट पर ही निर्भर रहा है। दिन में सूरज और रात में चांद। इसका मतलब यह है कि हमारा शरीर रात को कम बिजली का आदी है। जहां बात दिन में मिल रही सूरज की रोशनी इतनी पर्याप्त है कि अंाखों पर किसी भी तरह का असर नहीं पड़ता। कहने का मतलब साफ है कि हमारे शरीर का एक बायोलाजिकल क्लाक सूरज और चांद की रोशनी से नियंत्रित होता रहा है जो कि इन दिनों कृत्रिम रोशनी के कारण गड़बड़ा रहा है। अपने स्वास्थ्य को नियंत्रित रखने के लिए बायोलाजिकल क्लाक का सही होना और अंधेरे में सोना आवश्यक है।

रोशनी दवा है - रोश्नी को अगर दवा कहा जाए तो गलत नहीं होगा। लेकिन जैसे कि हर दवा अति में ली जाए तो वह नुकसादेय होती है, ठीक इसी तरह रोशनी पर भी यही नियम लागू होता है। यदि हम रात को कृत्रित रोशनी अपने इर्द-गिर्द जलाए रखते हैं तो इससे हमारे शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे हमारी नींद प्रभावित होती जिस कारण हमारा ब्लड प्रेशर में असामान्य उतार चढ़ाव आ सकता है। दरअसल कृत्रिम रोशनी हमारे मस्तिष्क पर असर डालती है। अतः यह रोशनी रात के समय के लिए सही नहीं है।

सोने से पहले रोशनी - सोने पहले यदि आप कृत्रिम बिजली बंद नहीं करते तो आपका शरीर उस रोशनी से प्रभावित होता है। बंद आंखें भी इस बात को जान रही होती है कि बिजली जल रही है। नतीजत गहरी नींद नहीं आ पाती। आपने यदि गौर किया हो तो कभी भी फोन या टैबलेट की अचानक लाइट जल जाने से हमारी नींद खुल जाती है। मतलब साफ है कि कृत्रिम बिजली के कारण गहरी नींद नहीं हो पाती। यह स्वास्थ्य के लिहाज से सही नहीं है। अतः सोने से पहले रोशनी आवश्यक रूप में बंद करें।

तनाव बढ़ता है - अगर आप रात के समय कंप्यूटर में काम करते हैं या फिर कम बिजली में पढ़ते हैं तो इससे तनाव का स्तर बढ़ जाता है। असल में रात के समय प्राकृतिक रूप से अंधेरा हो रहा होता है जबकि हम कृत्रिम रोशनी में पढ़ने की कोशिश करते हैं। बायोलाजिकल क्लाक इशारा करता है कि यह हमारे सोने का समय है जबकि कृत्रिम रोशनी हमें सोने नहीं देती। ऐसे में काम का बोझ और प्राकृतिक समय आपस में टकरा रहे होते हैं। परिणामस्वरूप हमंे तनाव का एहसास होने लगता है। निरंतर इस तरह की जीवनशैली से हमें अवसाद भी हो सकता है।

कैंसर - ठीक ठीक वजह के बारे में तो नहीं कहा जा सकता लेकिन यह सुनिश्चित है कि यदि हम रात को सोते समय रोशनी जलाकर रखते हैं तो इसका रिश्ता कैंसर जैसी घातक बीमारी से है। इस सम्बंध में 10 साल तक हुए एक अध्ययन से इस बात की पुष्टि हुई है कि सोने के माहौल में यदि रोशनी हो तो ब्रेस्ट कैंसर होने की आशंका में 22 फीसदी की बढ़ोत्तरी होती है। जबकि अंधेरे में सोने वाली महिला को इस तरह का कोई रिस्क नहीं होता।

मूड में बदलाव - कम रोशनी या नीली रोशनी में पढ़ने या सोने से मूड में कई किस्म के बदलाव होते हैं। संभवतः यह सकारात्मक नहीं है। जैसा कि पहले ही कहा गया है कि कम रोशनी तनाव और अवसाद का जरिया बनते हैं। इसी प्रकार कम रोशनी जलाए रखने से, उसमें पढ़ने से मूड में नकारात्मक परिवर्तन आते हैं। झेंप होती है, चिड़चिड़ापन भर जाता है। इतना ही नहीं दूसरों की छोटी छोटी बातें भी परेशान करती हैं। साथ ही हमारा स्वभाव झगड़ालू जैसा हो जाता है।


हृदय सम्बंधी बीमारी - रात में कृत्रिम रोशनी जलाए रखना हमारे मूड पर तो असर डालता है। हमारा हृदय भी इससे अछूता नहीं है। कृत्रिम रोशनी के कारण हृदय सम्बंधी बीमारियां हमें धर दबोचती हैं। विशेषज्ञों की मानें तो उम्र बढ़ने से जुड़ी तमामा बीमारियां भी कृत्रिम रोशनी के कारण हो सकती है। अतः अंधेरे में ही सोएं। रात के समय बायोलाजिकल क्लाक की अवश्य सुनें। ऐसा न करने का मतलब है समस्याओं का न्योता देना।

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