आज के समय में लोगों में वजन बढ़ने की समस्या काफी ज्यादा बढ़ गई है। ऐसे में लोग वजन कम करने और फिट दिखने के लिए सोशल मीडिया ट्रेंड्स पर नजर आने वाले अलग-अलग डाइट रूटीन को फॉलो करते हैं। वजन कम करने के लिए कोई कार्ब्स छोड़ देता है, कोई खाना गिनकर खाता है तो कोई लंबे समय तक खुद को भूखा रखता है। इस तरह की डाइट फॉलो करने से शरीर और मन दोनों पर दबाव पड़ता है, जो आपके सेहत के लिए फायदेमंद नहीं होता है। ऐसे में वजन कम करने वालों के लिए इस समस्या का एक हेल्दी और संतुलित समाधान इंट्यूटिव ईटिंग माना जाता है। आइए दिल्ली की क्लिनिकल डाइटिशियन और न्यूट्रिशनिस्ट रक्षिता मेहरा से जानते हैं कि इंट्यूटिव ईटिंग क्या है और यह कैसे काम करता है?
इंट्यूटिव ईटिंग क्या है?
न्यूट्रिशनिस्ट रक्षिता मेहरा के अनुसार, इंट्यूटिव ईटिंग का मतलब है अपने शरीर की आवाज को सुनकर भोजन करना है, जिसमें आप कैलोरी को गिनकर, सख्त डाइट या यह खाना अच्छा है या बुरा इन चीजों को सोचे बिना खाते हैं। इंट्यूटिव ईटिंग का यह तरीका हमें सिखाता है कि हमें कब भूख लगी है, कब पेट भर गया है और हमारे शरीर को वास्तव में किस चीज की जरूरत है। इंट्यूटिव ईटिंग के मुताबिक हमारा शरीर जन्म से ही जानता है कि हमारे शरीर को कितना और क्या खाना है। शिशु भूख लगने पर खाते हैं और पेट भरने पर खुद रुक जाते हैं। लेकिन बड़े होने के साथ साथ हम डाइट कल्चर के कारण अपने शरीर के संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं।
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इंट्यूटिव ईटिंग कैसे काम करता है?
इंट्यूटिव ईटिंग आपके शरीर और दिमाग दोनों को संतुलन में रखते हैं। आइए न्यूट्रिशनिस्ट रक्षिता मेहरा से जानते हैं यह कैसे काम करते हैं:
1. भूख के संकेतों को समझना
इंट्यूटिव ईटिंग के इस तरीके में भूख को समझना बहुत जरूरी है। भूख लगना हमारे शरीर की कमजोरी नहीं है, बल्कि शरीर के नेचुरल संकेतों को समझना है। यह तरीका हमें बताता है कि जब हल्की या मध्यम भूख लगे तभी भोजन करना चाहिए, बहुत ज्यादा भूखे रहने से बचना और समय पर खाना खाकर ओवरईटिंग को रोकना है।
2. पेट भरने के संकेतों को समझना
अक्सर लोग टीवी या फोन का इस्तेमाल करते हुए खाना खाते हैं, जिससे वे ज्यादा खाना खा लेते हैं और उन्हें पेट भारी महसूस होता है। इसलिए, जरूरी है कि आप अपने पेट भरने के संकेतों को समझें। इसके लिए धीरे-धीरे और ध्यान से खाना खाएं, इस बात को महसूस करें कि आपका पेट भर चुका है या नहीं और पूरी प्लेट खत्म करने वाली सोच छोड़ना जरूरी है, ताकि ज्यादा खाना से बचें।

3. खाने को दुश्मन न बनाना
वर्तमान के डाइट कल्चर में लोग कुछ फूड्स को बुरा मान लेते हैं। इंट्यूटिव ईटिंग में आप किसी फूड को बुरा नहीं मानते हैं, बल्कि किसी भी खाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से बचना है और जब मन करें तो सीमित मात्रा में इसका सेवन करें।
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4. इमोशनल भूख को समझना
कई बार हम भूख की वजह से नहीं, बल्कि तनाव, बोरियत या डिप्रेशन के कारण खाना खाते हैं। इसलिए, इस ईटिंग प्रोसेस में यह पहचानना जरूरी है कि भूख शारीरिक है या इमोशनल। इसके साथ ही भावनाओं से निपटने के लिए खाने के अलावा दूसरे तरीके अपनाना जरूरी है जैसे टहलना, गाने सुनना या किसी से बात करना।
5. पोषण को समझदारी से चुनना
इंट्यूटिव ईटिंग का मतलब यह नहीं होता है कि आप सिर्फ जंक फूड खाएं। बल्कि इसमें स्वाद और पोषण दोनों का संतुलन बहुत जरूरी है। साथ ही यह देखना भी कि कौन-सा खाना आपेक शरीर को एनर्जी दे रहा है। इसलिए फल, सब्जियां, प्रोटीन और अनाज को डाइट में शामिल करना जरूरी है।
निष्कर्ष
इंट्यूटिव ईटिंग के द्वारा हमें यह सीखने में मदद मिलती है कि हमारा शरीर हमारा दुश्मन नहीं है, बल्कि यह हमें खाने का सही तरीका सिखाता है। जब हम अपने पेट और मन की बात सुनना सीख लेते हैं तो न सिर्फ यह हमारे स्वास्थ्य में सुधार करता है, बल्कि खाने के साथ हमारा रिश्ता भी पॉजिटिव होता है।
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Jan 18, 2026 12:42 IST
Modified By : Katyayani Tiwari Jan 18, 2026 12:42 IST
Modified By : Katyayani TiwariJan 18, 2026 12:42 IST
Published By : Katyayani Tiwari