क्या ज्यादा सोचने से बुझ जाती है दिमाग की बत्ती

अगर आप ऑफिस में बैठे-बैठे थक जाते हैं और ये सोचते हैं कि बिना काम किए इतना थक रहे हैं तो आप गलत हैं, क्योंकि दिमाग के थकने से शरीर भी थक जाता है।

Gayatree Verma
तन मनWritten by: Gayatree Verma Published at: Oct 05, 2016
क्या ज्यादा सोचने से बुझ जाती है दिमाग की बत्ती

हमेशा आपको कोई ना कोई ये कहने वाला मिल जाएगा कि दिमाग की नहीं दिल की सुननी चाहिए।


लेकिन प्लीज... तरक्की करनी है तो दिमाग की सुनिए क्योंकि दिमाग के बल पर ही ये दुनिया चलती है और दिमाग से ही दुनिया को आप चला सकते हैं।

 

खैर हम शारीरिक मेहनत व मानसिक मेहनत करने वालों के बीच तुलना नहीं कर रहे हैं। आज हम इस लेख में बात कर रहे हैं कि क्यों मानिसक तौर पर मेहनत करने वाला इंसान शारीरिक तौर पर मेहनत करने वाले से ज्यादा थकावट महसूस करता है...?


दरअसल आपका पूरा शरीर दिमाग के जरिए ही काम करता है। यहां तक की दिल को धड़कने और आपको सांस लेने का संदेश भी दिमाग ही देता है। इसके अलावा आपको जिंदा बनाए रखने के लिए जितनी भी सारी क्रियाएं हैं वे दिमाग से ही कंट्रोल होती हैं। इसका मतलब है कि आपका दिमाग पूरे दिन काम करता रहता है। ऐसे में काम कर-करके एक वक्त के बाद वह थक भी जाता है। फिर दिमाग के थकने के बाद इंसान को भी थकावट महसूस होने लगती है। और फिर देखने वाले लोग हैरानी जताने लगते हैं कि ये अगला बिना हाथ पैर चलाए ऐसे कैसे बैठे-बैठे थक गया।

शोध में हुई पुष्टि

इन सारी बातों की पुष्टि कुछ वैज्ञानिक अध्ययन भी करते हैं। इन अध्ययनों के अनुसार कुछ सामान्य सी दिमागी क्रियाओं, जैसे कि क्रॉसवर्ड खेलने से दिमागी ऊर्जा अधिक खर्च नहीं होती। इस पर अमेरिका की केंट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सैमुअल मारकोरा ने एक रिसर्च की थी। इस रिसर्च में 90 लोगों को शामिल किया गया। इन 90 लोगों को दो समूहों में बांटा गया। इनमें से एक समूह को वीडियो गेम खेलने के लिए दिया गया जिसमें दिमाग का इस्तेमाल करना था वहीं दूसरे समूह को एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म देखने को कहा गया।


तत्पश्चात दोनों समूहों के लोगों को स्टेशनरी साइकिल चलाने के निर्देश दिए गए। उम्मीद के विपरीत वीडियो गेम खेलने वाले लोग तेजी से पैडल मारते नजर आए जबकि फिल्म देखने वाले समूह के लोग धीरे-धीरे पैडल मार रहे थे। हां लेकिन फिल्म देखने वाले लोगों ने ज्यादा देर तक पैडल मारा।


मारकोरा ने इस रिसर्च से ये रिपोर्ट तैयार की कि दिमाग और शरीर दोनों के साथ में मेहनत करने से ही शरीर थकता है। इस रिसर्च के द्वारा मारकोरा ने दिमागी कार्य और हृदय संबंधी प्रतिक्रियाओं जैसे ब्लडप्रेशर, ऑक्सीजन की खपत और धड़कनों पर भी अध्ययन किया और उसके बाद ये रिपोर्ट तैयार की। मतलब की शरीर में थकावट के लिए केवल शारीरिक मेहनत या दिमागी मेहनत ही अकेले जिम्मेदार नहीं होते बल्कि इन दोनों के साथ में मेहनत करने से शरीर थकता है।


लेकिन हर वैज्ञानिक इसे नहीं मानते। मनोजैविकी (ये मनोविज्ञान की एक शाखा है जिसमें दिमाग की जैविक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है) इस बात को नकारते हैं और कहते हैं कि शरीर के भार में दिमाग की हिस्सेदारी केवल दो प्रतिशत की होती है जबकि वो शरीर की ऊर्जा का 20 प्रतिशत हिस्सा खपत करता है। ऐसे में ये कहना नाकाफी है कि दिमागी काम करने से शरीर थकता है लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि इससे ऊर्जा की खपत होती है और हम सुस्त महसूस करते हैं।

 

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