रिश्तों को कमजोर बनाता है पार्टनर की किसी से तुलना करना, जानें क्यों?

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Mar 23, 2018
Quick Bites

  • तुलना की एक सीमा तय होनी चाहिए।
  • खूबसूरती देखने वाले की आंखों में होती है।
  • अच्छा करने पर खुद की तारीफ करें।

हर व्यक्ति की अपनी विशेषता है। वह खुद में तब तक संतुष्ट रहता है, जब तक कि दूसरों से अपनी तुलना नहीं करता। तुलना कभी-कभी व्यक्तित्व विकास में सहायक होती है लेकिन यह हीन-भावना से भी भर सकती है। कुछ लोग हर बात में अपने पार्टनर की तुलना दूसरों से करने लगते हैं। महिलाओं के साथ अक्सर ये चीजें होती हैं। जब तक महिलाएं अपने पार्टनर के साथ खुश है तब तक सब सही रहता है। लेकिन जैसे ही उनकी जिंदगी में जरा उथल-पुथल होती है तो वो मन ही मन अपने पार्टनर की दूसरे पुरुषों से तुलना करने लगती हैं। ये चीजें रिश्तों में सीधे तौर पर दरार लाती हैं। इसलिए इस चीज से दूर रहें।

ग्रीक दार्शनिक प्लेटो और अरस्तू बहुत पहले तुलना के मनोविज्ञान पर लिख चुके हैं। कोई व्यक्ति अपने भीतर सुखी व संतुष्ट हो सकता है मगर जैसे ही वह दूसरे से अपनी तुलना करता है, दुखी और असंतुष्ट होने का बहाना उसे मिल जाता है। सोशल साइंटिस्ट लिऑन फेस्टिंगर का 'सामाजिक तुलना का सिद्धांत दर्शाता है कि तुलना की भावना व्यक्ति में प्राकृतिक रूप से है। इसी के बलबूते वह जान पाता है कि वह कितना अच्छा या बुरा है। 

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स्वस्थ प्रतिस्पर्धा अच्छी

तुलना के कुछ अच्छे आधार होते हैं। मसलन, किसी धावक के लिए 200 मीटर की रेस 50 सेकंड में पूरा करना एक उपलब्धि हो सकता है लेकिन जब वह देखता है कि दूसरा धावक उसी दूरी को 40 सेकंड में तय कर रहा है तो उसे पता चलता है कि उसकी रेस में अभी सुधार की गुंजाइश है। ऐसी तुलना में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना है, जो अच्छी है।

तुलना की सीमा हो

तुलना की एक सीमा तय होनी चाहिए। सीमा से बाहर तुलना से मन पर बोझ बढ़ता है कि कुछ तो ऐसा है, जो दूसरों के पास है, हमारे पास नहीं। किसी में पहले से आत्मविश्वास की कमी हो तो दूसरों से तुलना उसे और हीन-भावना से ग्रस्त कर देगी। यह भी सच है कि कोई कितना भी सफल, काबिल, धनवान या बुद्धिजीवी क्यों न हो, हमेशा कोई दूसरा उससे अधिक मजबूत, धनवान, सफल, बड़ा, सुंदर, खुश और ताकतवर होता ही है।

कैसे करें तुलना

कहते हैं, खूबसूरती देखने वाले की आंखों में होती है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि जो दिख रहा है, उससे अधिक महत्व उसका है, जो देख रहा है। वास्तविकता यह है कि देखने वाले की नजर केवल चेहरे, कद या वजन तक जा सकती है, वह यह नहीं जान सकता कि सामने वाला कितना कूल या गुस्सैल है। कोई भी व्यक्ति हूबहू दूसरे की कार्बन कॉपी नहीं हो सकता। जिस समाज में लोगों से ऐसी अपेक्षा की जाए, वहां सिर्फ क्लोन तैयार होंगे, वहां रचनात्मकता या प्रयोगों की संभावना नही रहती। तुलना से परेशान हों तो ये उपाय करें-

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  • सोचें कि इस खेल में जीत नहीं मिलती। किसी मुकाम पर जीत का एहसास हो सकता है लेकिन अगले ही क्षण कोई न कोई दूसरा बड़ा, महान या सफल मिल जाता है।
  • तुलना के बजाय मेहनत, सफलता और लक्ष्य के प्रति दृढ़ता व लगन के बारे में सोचें। अच्छा करने पर खुद की तारीफ करें। इस अभ्यास से विचार-प्रक्रिया को सकारात्मक दिशा देने में मदद मिलेगी।
  • दूसरों के प्रति सहज, सकारात्मक, उदार और मददगार रहने से अपने प्रति अच्छी भावनाएं पनपती हैं जबकि आलोचना या तुलना दूसरों के साथ ही खुद के प्रति भी क्रूर बनाती है।
  • कोई भी परफेक्ट नहीं होता लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कोई विफल या बुरा है। हर व्यक्ति स्वयं में पूर्ण है क्योंकि हर व्यक्ति में कोई न कोई विशेषता होती है।
  • भीड़ से अलग चलने का जजबा व हौसला रखना आसान नहीं है। ऐसा वही लोग कर पाते हैं, जो अनावश्यक तुलना में नहीं फंसते और ऐसे ही लोग कुछ नया रच पाते हैं।

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