अच्छी परवरिश के गुण नहीं है बच्चों को डांटना, पड़ते हैं ये 4 बुरे असर

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jul 13, 2018
Quick Bites

  • माता पिता की आदतों से बच्चे होते हैं प्रभावित।
  • बच्चों को डांटना और उन पर चिल्लाना अच्छी बात नहीं है।
  • हर उम्र की प्राथमिकतां अलग हैं इसलिए दूसरों से तुलना न करें।

कभी किसी बच्चे के नज़रिये से इस बात को समझने की कोशिश करे। जब वह बोलना-चलना सीख रहा होता है, उसी उम्र में जिस शब्द से उसका पहला परिचय होता है वह है-'नहीं, नहीं। अपने लिए लोगों से लगातार यही शब्द सुनते हुए बच्चे बड़े हो रहे होते हैं। सात-आठ साल की उम्र तक जब उनमें तर्क करने की क्षमता विकसित होने लगती है तो उनके मन में अकसर यह सवाल पैदा होता है कि मेरे पेरेंट्स मुझे हर काम के लिए मना करते हैं तो फिर मैं क्या करूं? यहीं पर बड़ों से अक्सर चूक हो जाती है। वे छोटी-छोटी बातों के लिए बच्चों को बहुत ज्य़ादा रोकते-टोकते हैं पर उन्हें यह बताने की कोशिश नहीं करते कि उनको क्या-क्या करना चाहिए, ताकि बच्चों को भी यह मालूम हो कि मेरे इन प्रयासों से मम्मी-पापा बहुत खुश होते हैं। इसलिए मुझे ऐसे अच्छे कार्यों को बार-बार करना चाहिए।   

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खूबियों को पहचानें

बच्चों और पेरेंट्स के आपसी व्यवहार में क्रिया-प्रतिक्रिया का अनवरत सिलसिला चलता रहता है। अभिभावक जब बच्चे पर किसी कार्य के लिए दबाव डालते हैं तो उनकी बात मानने के बजाय वह उनसे बहस करने लगता है। इससे पेरेंट्स को बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है और वे उन्हें डांटने लगते हैं, इससे वह रोने-चिल्लाने लगता है। ऐसे में उसे दोबारा डांट कर चुप कराने के बजाय शांतिपूर्वक यह समझने की ज़रूरत है कि उसके ऐसे व्यवहार की असली वजह क्या है? दरअसल जब पेरेंट्स बच्चों के साथ बातचीत के लिए समय नहीं निकाल पाते तो वे उनका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए ऐसी हरकतें करते हैं। इसलिए रोज़ाना बच्चे के साथ बातचीत के लिए थोड़ा समय ज़रूर निकालें पर इस क्वॉलिटी टाइम में उसे पढ़ाई या अनुशासन से जुड़ी कोई नसीहत न दें। इस दौरान केवल उनकी रुचि से जुड़े विषयों पर हलकी-फुलकी बातचीत करें।

अगर आप उसके व्यक्तित्व, व्यवहार और गतिविधियों पर थोड़ा ध्यान देंगी तो आपको बड़ी आसानी से उसकी कुछ अच्छाइयां नज़र आएंगी। अगर किसी सुबह वह अपने आप जल्दी उठ कर स्कूल के लिए खुद तैयार होने की कोशिश करे या आपके कहने से पहले होमवर्क करने बैठ जाए तो उसके इन कार्यों की प्रशंसा ज़रूर करें। इससे उसे यह मालूम हो जाएगा कि ऐसा करने पर मम्मी मुझे शाबाशी देती हैं। इससे उसकी आदतों में अपने आप सुधार आने लगेगा। अगली बार आप उसके किसी दूसरे अच्छे कार्य को पहचान कर उसकी तारीफ करें तो निश्चित रूप से वह दोबारा वही कार्य करने के लिए प्रेरित होगा।    

बदलें अपना नज़रिया 

समय के साथ परवरिश के तौर-तरीकों में भी बदलाव आना स्वाभाविक है। आजकल बाल मनोवैज्ञानिक ज्यादा रोक-टोक करने के बजाय बच्चों के साथ बातचीत में सकारात्मक वाक्यों का इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। इस संदर्भ में चाइल्ड काउंसलर गीतिका कपूर कहती हैं, 'जहां डांट-फटकार की वजह से बच्चों का सेल्फ एस्टीम कमज़ोर हो जाता है। वहीं थोड़ी सी तारीफ सुनकर वे दोगुने उत्साह के साथ अपने काम में जुट जाते हैं। पेरेंटिंग का यह तरीका जयादा कारगर साबित होता है। इसकी मदद से बच्चों को बहुत आसानी से अच्छी आदतें सिखाई जा सकती हैं।

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अगर आपको ऐसा लगता है कि मेरा बच्चा बहुत शरारती है तब भी आप दोबारा शांतिपूर्वक इस ढंग से सोचने की कोशिश करें कि अच्छाइयों के साथ थोड़ी खामियां तो हर बच्चे में होती हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपने बच्चे पर शरारती, आलसी, जि़द्दी या लापरवाह जैसे लेबल लगा दें। बड़ों के मुंह से अपने बारे में हमेशा ऐसे नकारात्मक  विशेषण सुनकर उसके मन में अपने लिए स्थायी रूप से यह धारणा बन जाती है कि 'मैं तो जि़द्दी/शरारती हूं ही। ऐसी गलत सोच की वजह से बच्चे अपने व्यवहार में बदलाव लाने की ज़रा भी कोशिश नहीं करते।   

कमज़ोर न पड़े मनोबल

आजकल स्कूलों में बच्चों पर पढ़ाई और एक्टिविटीज़ में नंबर वन बने रहने का ज़बर्दस्त दबाव होता है। ऐसे में छोटी-छोटी नाकामियों से भी उनके कोमल मन को बहुत ज्य़ादा ठेस पहुंचती है और उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। 'हर बार मुझसे $गलती हो जाती है, मैं ही हमेशा पीछे रह जाता हूं, मेरे ही साथ ऐसा क्यों होता है?

अगर परेशान होकर कोई बच्चा बार-बार ऐसे वाक्य दोहराता है तो पेरेंट्स को सचेत हो जाना चाहिए क्योंकि इससे उसके मन में हीन भावना पैदा होने लगेगी और कोई भी नया कार्य करने में उसे बहुत घबराहट होगी। ऐसे स्थिति में डांटने के बजाय उसे यह समझाएं कि तुमने पूरी ईमानदारी से कोशिश की, हमारे लिए यही का$फी है। अगर इस बार कम माक्र्स मिले तो कोई बात नहीं, मन लगा कर पढ़ाई करो तो तुम्हारे रिज़ल्ट में ज़रूर सुधार आएगा। 

बनें रोल मॉडल 

बच्चों के लिए उनके पेरेंट्स ही उनके रोल मॉडल होते हैं। बिना सिखाए ही वे माता-पिता के हर व्यवहार को अपनाने की कोशिश करते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चों में अनुशासन, सहयोग, परोपकार और विनम्रता जैसे गुण विकसित हों तो इसके  लिए बार-बार उन्हें उपदेश देना व्यर्थ है। इससे बच्चे बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं। वे अपने माता-पिता की नसीहतों पर अमल करने की ज़रा भी कोशिश नहीं करते।

मान लीजिए, अगर किसी बच्चे से उसके पेरेंट्स स$फाई का ध्यान रखने को कहते हों लेकिन खुद ही उन्हें कहीं भी कूड़ा फेंकने की आदत हो तो भले ही वे अपने बच्चे को बार-बार समझाएं लेकिन वह उनकी बात नहीं मानेगा। वहीं दूसरी ओर जब कोई बच्चा दो साल की उम्र से ही यह देखता है कि उसके मम्मी-पापा अपनी सारी चीज़ें सही जगह पर रखते हैं, घर को साफ-सुथरा रखते हैं, कूड़ा डस्टबिन में ही फेंकते हैं, ज़रूरत पडऩे पर दूसरों की मदद करते हैं तो बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के बच्चों में ऐसी अच्छी आदतें अपने आप विकसित होने लगेंगी। 

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