आपने कई लोगों को देखा होगा कि जरा सी कोई बात बुरी लगते ही वे रोने लगते हैं। विशेषकर, महिलाओं के साथ ऐसा अधिक होता है। ऐसे में यह सवाल मन में जरूर उठता है कि आखिर हर छोटी-छोटी बात पर आंसू क्यों आ जाते हैं? क्या यह किसी समस्या का संकेत है या फिर इसे सामान्य माना जा सकता है?
इस वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे के मौके में हम इसी विषय के बारे में विस्तार से समझेंगे। इस बारे में माइंडवेल काउंसल की संस्थापक, काउंसलर और फैमिली थेरेपिस्ट अर्चना सिंघल (Archana Singhal, Counsellor & Family Therapist and Founder of Mindwell Counsel) बताती हैं, "अक्सर लोग बात-बात पर रोने को कमजोरी या मेंटल हेल्थ से जुड़ी परेशानी समझ लेते हैं। रोने और मेंटल हेल्थ के बीच गहरा संबंध हो सकता है और छोटी सी बात पर रोना किसी अनकही तकलीफ की ओर इशारा भी कर सकता है।"
हर छोटी-छोटी बात पर रोना क्यों आ जाता है?
Why Do You Cry Easily
निजी जीवन से जुड़ी तकलीफें
कई बार छोटी-छोटी बात पर रोना उस स्थिति विशेष के बारे में नहीं बताता है, जो घटना घट रही है। कभी-कभी उस पल की घटना छोटी होती है, लेकिन जमा इमोशनल बर्डन इतना भारी होता है कि व्यक्ति न चाहते हुए भी रो देता है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे लंबे समय से तनाव होना, नींद की कमी, अनकही तकलीफ, रिश्तों में निराशा या लंबे समय से अपनी भावनाओं को दबाते रहना। ऐसे में छोटी-छोटी बात पर व्यक्ति रो सकता है, जो कि बिल्कुल गलत नहीं है।
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भावनात्मक दबाव
अक्सर वे भी छोटी-छोटी बात पर रो देते हैं, जिन्हें भावनात्मक दबाव होता है। सही मायनों में बात-बात पर रोना इमोशनल ओवरलोड का संकेत है। हालांकि, हर बार ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है। असल में, जब हम लगातार किसी न किसी तरह की जिम्मेदारियां निभाते रहते हैं और दूसरों की उम्मीदों पर खरे उतरना चाहते हैं, तब भी इमोशनल ओवरलोड महसूस होता है। ऐसे में अक्सर व्यक्ति अपनी जरूरतों, चाहतों और इच्छाओं को इग्नोर कर देता है। ऐसे में अगर कोई उनकी छोटी-सी आलोचना भी कर देता है, तो ये इमोशनली टूट पड़ते हैं।
इमोशनल रिस्पॉन्स
कई बार बात-बात पर रोना इमोशनल रिस्पॉन्स भी हो सकता है। असल में, जब कोई लगातार उदासी, चिड़चिड़ापन, घबराहट, निराशा में खुद व्यक्त नहीं कर पाता है, तो ऐसे लोग अक्सर बात-बात पर रो देते हैं। यहां तक कि इन लोगों की नींद और भूख भी प्रभावित हो जाती है। इन लोगों की अपने शरीर में नजर आ रहे सभी लक्षणों पर गौर करना चाहिए। जरूरी हो, तो प्रोफेशनल से संपर्क करना चाहिए।
क्या कहती है स्टडी?
साल 2024 में Research in Psychotherapy: Psychopathology, Process and Outcome जर्नल में प्रकाशित एक शोध से पता चलता है, कई लोग थेरेपी में रोते हैं और मरीजों का रोना केवल दुख का प्रतीक नहीं होता, बल्कि यह मुख्य रूप से चार रूपों में व्यक्त होता है- विरोध/आक्रोश में रोना, भावनात्मक रूप से कमजोर महसूस करने पर, शोक या दुख में रोना और सकारात्मक यानी राहत में रोना। वैसे तो थेरेपी में इसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
Comprehensive Psychiatry जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, हालांकि रोना एक आम व्यवहार है, लेकिन इसे हमेशा मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्या से जोड़कर देखना सही नहीं है। इनके बीच का संबंध हमेशा सीधा या एक जैसा नहीं होता। रोना हमेशा एक जैसी मनःस्थिति को बयान नहीं करता है।
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ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए?
डाॅ. अर्चना सिंघल सलाह देती हैं कि अगर आपको छोटी-छोटी बातों पर रोना आ जाता है, तो बेहतर है कि अपनी स्थिति को नजरअंदाज न करें। इसके लिए यहां बताए गए टिप्स को अपना सकते हैं, जैसे-
- जज करना बंद करेंः अक्सर बात-बात पर रोने वाले लोग खुद को बहुत ज्यादा जज करते हैं। मन में तरह-तरह के सवाल होते हैं कि मैं ऐसा क्यों करता हूं, दूसरों के सामने रोना न आए जाए वगैरह-वगैरह। इस भावना को मन से निकाल दें। रोना आ रहा है, तो सहजता से रो लें।
- कारण जानेंः बात-बात पर रोने की आदत है, तो इसे लेकर शर्मिंदगी महसूस न करें। इसकी वजह जानने की कोशिश करें। सवाल है, ऐसा कैसे कर सकते हैं? इसके लिए आप सबसे पहले खुद से सवाल करें कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? जब आप रोते हैं, तो इसका कारण क्या है? क्या आप अकेलापन महसूस कर रहे हैं या खुद को जिम्मेदारियों से लदा हुआ पाते हैं। कारण जानकर समस्या का समाधान करना आसान है।
- दोस्तों से साझा करेंः अगर आप उन लोगों में हैं, जो अकेलेपन से घिरे रहते हैं। ऐसे में छोटी-छोटी बात पर रोना आ सकता है। आप अपनी स्थिति को अकेले डील करने से बचें। ऐसे में आपकी समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके बजाय, कोशिश करें कि आप अपने दोस्तों, परिजनों या करीबियों से अपनी बात साझा करें। इससे मन हल्का होगा।
- सपोर्ट लेंः हर समस्या को खुद से डील करना जरूरी नहीं है। अगर आप खुद को संभाल नहीं पा रहे हैं, तो इसमें सपोर्ट ग्रुप का हिस्सा बन सकते हैं। इन लोगों के साथ अपनी समस्याओं का साझा करना और उनकी दी हुई सलाह को मानना भी आपको मानसिक रूप से मजबूत बना सकता है। हां, अगर कोई सलाह काम की न लगे, तो उसे अमल में न लाएं।
प्रोफेशनल की मदद कब लें?
अगर बार-बार रोना कई हफ्तों तक बना रहे, भावनाओं को संभालना मुश्किल होने लगे या इसका असर आपके काम, रिश्तों और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने लगे, तो किसी अपनी स्थिति को नजरअंदाज न करें। तुरंत एक्सपर्ट या प्रोफेशनल की मदद लें। ध्यान रखें कि कई बार बात-बात रोना तनाव या अन्य शारीरिक कारणों से भी हो सकते हैं, इसलिए जरूरत के अनुसार विशेषज्ञ सलाह लें।
निष्कर्ष
अक्सर वो लोग जो छोटी-छोटी बात पर रो देते हैं, लोग उनका मजाक उड़ाते हैं। जबकि, हकीकत बात यह है कि छोटी-छोटी बात पर रोना मानसिक स्थिति के बारे में बहुत कुछ बताता है। इससे यह भी पता चलता है कि किसी को तनाव या अवसाद तो नहीं है। वहीं, जो लोग जिम्मेदारियों से घिरे रहते हैं, लेकिन अपनी जरूरतों को इग्नोर कर देते हैं या परिवार में जिन्हें इंपोर्टेंस नहीं मिलती है, ऐसे लोग भी छोटी-छोटी बात पर रो देते हैं। इसलिए, अगर किसी के साथ यह समस्या हो रही है, तो उन्हें इसे इग्नोर नहीं करना चाहिए।
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FAQ
क्या शरीर में किसी हार्मोनल असंतुलन के कारण भी बात-बात पर आंसू आ सकते हैं?
थायराइड का असंतुलन (Hypothyroidism), कोर्टिसोल का बढ़ता स्तर और महिलाओं में एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरोन के उतार-चढ़ाव (जैसे PMS या Menopause के समय) के कारण भी लोगों को बात-बात पर रोना आ सकता है।जब बिना किसी स्पष्ट कारण के अचानक बहुत रोना आता है, तो मेडिकल भाषा में इसे क्या कहा जाता है?
बिना किसी भावनात्मक कारण के अचानक और अनियंत्रित रूप से रोने या हंसने की इस न्यूरोलॉजिकल स्थिति को सुडोबुलबार एफेक्ट (Pseudobulbar Affect-PBA) कहा जाता है। ऐसा असल में मस्तिष्क में आई गड़बड़ी के कारण होता है।
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Oct 09, 2026 12:43 IST
Published By : Meera Tagore
Reviewed By : Archana Singhal
