क्रोहन डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस, दोनों ही पेट से जुड़ी बीमारियां हैं और दोनों मे ही कुछ ऐसे लक्षण देखे जाते हैं जिससे दोनों ही बीमारियां एक जैसी लगती थीं। हालांकि, ऐसा नहीं है। ये दोनों ही बीमारियां बिलकुल अलग हैं और दोनों अलग-अलग कारणों से होती है जिनमें शरीर में अलग-अलग लक्षण महसूस हो सकते हैं। इन्हीं तमाम चीजों के बारे में हमने Dr. Anupama N K, Senior Consultant - Medical Gastroenterology, Aster CMI Hospital, Bangalore से बात की और विस्तार से समझा इन दोनों बीमारियों के बारे में।
क्रोहन डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस में क्या है अंतर?
डॉ. अनुपना बताती हैं कि क्रोहन की बीमारी और अल्सरेटिव कोलाइटिस, दोनों ही आंतों में सूजन वाली बीमारियां (inflammatory bowel diseases) हैं, लेकिन ये पाचन तंत्र पर अलग-अलग तरह से असर डालती हैं। जैसे
क्रोहन डिजीज
क्रोहन की बीमारी पाचन तंत्र के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकती है जैसे मुंह से लेकर गुदा तक। यह अक्सर छोटी आंत के आखिरी हिस्से और बड़ी आंत के शुरुआती हिस्से को प्रभावित करती है। इसमें सूजन पैच (धब्बों) के रूप में हो सकती है और आंत की गहरी परतों तक फैल सकती है।
अल्सरेटिव कोलाइटिस
अल्सरेटिव कोलाइटिस सिर्फ बड़ी आंत और मलाशय (रेक्टम) को प्रभावित करती है। इसमें सूजन आमतौर पर मलाशय से शुरू होकर कोलन यानी बड़ी आंत में लगातार फैलती जाती है।
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अल्सरेटिव कोलाइटिस के लक्षण
डॉ. अनुपमा कहती हैं कि क्रोहन डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस, दोनों बीमारियों के लक्षण एक जैसे हो सकते हैं हालांकि, अल्सरेटिव कोलाइटिस में कुछ लक्षण अलग हो सकते हैं जैसे
- दस्त
- पेट दर्द
- थकान
- वजन कम होना
- भूख न लगना।
हालांकि, मल में खून या बलगम आना, तुरंत मल त्यागने की जरूरत महसूस होना और बार-बार मल त्यागना अल्सरेटिव कोलाइटिस में ज्यादा आम है।
क्रोहन डिजीज के लक्षण
क्रोहन डिजीज की बीमारी में अक्सर पेट में मरोड़, वजन कम होना, पोषक तत्वों की कमी, मुंह में छाले और गुदा के आसपास दर्द जैसी समस्याएं होती हैं। साथ ही, क्रोन की बीमारी वाले कुछ लोगों में फिस्टुला बन सकता है या आंत सिकुड़ सकती है।

क्या हैं इन दोनों बीमारियों का कारण
ये पूछने पर डॉ. अनुपमा कहती हैं कि इन दोनों बीमारियों के सही कारणों का पूरी तरह से पता नहीं चल पाया है और ये बीमारियां सिर्फ कोई खास खाना खाने से नहीं होतीं। डॉक्टरों का मानना है कि ये बीमारियां इम्यून सिस्टम की असामान्य गतिविधि, जेनेटिक झुकाव, गट बैक्टीरिया में बदलाव और पर्यावरण से जुड़े कारणों के मेल से होती हैं और परिवार में बीमारी का इतिहास होने से इनका खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा
- स्मोकिंग का खास तौर पर क्रोहन रोग से संबंध है और यह बीमारी को और गंभीर बना सकती है, जबकि अल्सरेटिव कोलाइटिस का स्मोकिंग से अलग संबंध है और इसे रोकने या इलाज के लिए स्मोकिंग शुरू नहीं करनी चाहिए।
- कुछ इन्फेक्शन, दवाएं तनाव और खान-पान जैसे कारक लक्षणों पर असर डाल सकते हैं या बीमारी को अचानक बढ़ा सकते हैं, भले ही वे बीमारी की असल वजह न हों।
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कैसे लगाया जाता है बीमारी का पता?
डॉ. अनुपमा कहती हैं कि सिर्फ लक्षणों के आधार पर पक्की पहचान नहीं हो सकती, इसलिए डॉक्टर क्रोहन रोग और अल्सरेटिव कोलाइटिस में फर्क करने और इन्फेक्शन या दूसरी बीमारियों का पता लगाने के लिए ब्लड और स्टूल टेस्ट, बायोप्सी के साथ कोलोनोस्कोपी और कभी-कभी CT या MRI जैसी इमेजिंग का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके अलावा Cureus Journal of Medical Science के अनुसार पहली बार IBD का पता चलने वाले मरीजों में, साधारण एब्डॉमिनल CT से मापे गए विसरल और सबक्यूटेनियस फैट के क्रॉस-सेक्शनल एरिया के आधार पर क्रोहन डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस के बीच फर्क किया जा सकता है।
बचाव के उपाय
डॉ. अनुपमा कहती हैं कि अभी क्रोहन रोग या अल्सरेटिव कोलाइटिस को रोकने का कोई पक्का तरीका नहीं है, लेकिन कुछ आदतें मुश्किलों को कम कर सकती हैं और लोगों को बीमारी को कंट्रोल में रखने में मदद कर सकती हैं जैसे
- धूम्रपान या तंबाकू का इस्तेमाल न करें
- ऐसा संतुलित खाना खाएं जो आपको सूट करे
- पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लें
- शारीरिक रूप से एक्टिव रहें
- स्वस्थ वजन बनाए रखें
- अच्छी नींद लें और तनाव को मैनेज करें
NSAID ग्रुप की दर्द निवारक दवाएं बार-बार न लें जब तक कि डॉक्टर न कहे क्योंकि ये कुछ लोगों में लक्षणों को और खराब कर सकती हैं।
निष्कर्ष:
अंत में डॉ. अनुपमा कहती हैं कि बीमारी के अचानक बढ़ने (फ्लेयर-अप) के दौरान, कुछ मरीजों को डॉक्टर की सलाह पर अपने खाने-पीने में कुछ समय के लिए बदलाव करने की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन कोई एक ऐसी IBD डाइट नहीं है जो हर बार बीमारी को बढ़ने से रोक सके और जिन लोगों को लगातार दस्त, मल में खून आना, बिना वजह वजन कम होना, पेट में तेज दर्द, बुखार या बार-बार पेट से जुड़ी दिक्कतें हों, उन्हें इसे आम एसिडिटी या इरिटेबल बाउल सिंड्रोम मानकर नजरअंदाज करने के बजाय गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट को दिखाना चाहिए, क्योंकि समय पर बीमारी का पता चलने और सही इलाज से सूजन कम हो सकती है, मुश्किलों से बचा जा सकता है और लंबे समय तक जीवन की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है।
FAQ
आंतों में सूजन कितने दिन में ठीक हो जाती है?
आंतों में सूजन किस बीमारी से है, इस बात पर निर्भर करती है ये कितनी जल्दी ठीक हो सकती है जैसे अगर कोलाइटिस या गैस्ट्रोएंट्राइटिस की वजह से है तो हफ्ता या 15 दिन भी लग सकता है।आंतों में सूजन कम करने के लिए क्या खाना चाहिए?
आंतों में सूजन कम करने के लिए लो फाइबर वाले फूड्स का सेवन करें जिसे पचाना आसान होता है। इसके अलावा आप एंटी इंफ्लेमेटरी फूड्स का सेवन कर सकते हैं जो कि पेट का सूजन कम कर सकते हैं।
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Sep 01, 2026 16:40 IST
Published By : Pallavi Kumari
Reviewed By : Dr Anupama N K