प्री-एक्लेम्पसिया प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली एक गंभीर स्थिति है, जिसमें प्रेग्नेंट महिला का ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ जाता है और शरीर के कई जरूरी अंगों पर असर पड़ सकता है। यह समस्या आमतौर पर प्रेग्नेंसी के 20वें सप्ताह के बाद सामने आती है और यदि समय पर पहचान और इलाज न किया जाए तो यह मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। इस स्थिति में अक्सर पेशाब में प्रोटीन आना, हाथ-पैर या चेहरे पर सूजन, सिरदर्द और धुंधला दिखाई देना जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं। इस लेख में यशोदा हॉस्पिटल्स, हैदराबाद की कंसल्टेंट ऑब्स्टेट्रिशियन और गायनेकोलॉजिस्ट, डॉ. एम. वी. ज्योत्सना से जानिए, प्रेग्नेंसी के दौरान प्री-एक्लेम्पसिया होने पर शरीर में क्या होता है?
प्रेग्नेंसी में प्री-एक्लेम्पसिया होने का शरीर पर असर
डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के अनुसार, कई महिलाओं में शुरुआती स्टेज में इसके कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए नियमित प्रसवपूर्व यानी एंटीनेटल (Antenatal) जांच इस बीमारी की समय रहते पहचान करने में अहम भूमिका निभाती है। डॉ. एम. वी. ज्योत्सना बताती हैं कि प्री-एक्लेम्पसिया प्रेग्नेंसी से जुड़ी एक गंभीर स्थिति है, जिसमें हाई ब्लड प्रेशर के साथ-साथ किडनी, लिवर, दिमाग और अन्य अंगों पर भी असर पड़ सकता है। यदि इसका समय पर इलाज न किया जाए तो यह मां और गर्भ में पल रहे शिशु दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। हालांकि शुरुआती अवस्था में कई महिलाओं को किसी प्रकार की परेशानी महसूस नहीं होती, लेकिन नियमित हेल्थ चेकअप के दौरान ब्लड प्रेशर और अन्य जांचों के जरिए इसकी पहचान संभव है।
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- डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के अनुसार, यदि प्री-एक्लेम्पसिया का समय पर इलाज नहीं किया जाता है तो प्लेसेंटा तक पहुंचने वाले ब्लड फ्लो में कमी आ सकती है।
- इसका सीधा असर शिशु के विकास पर पड़ता है, जिससे बच्चे की ग्रोथ धीमी हो सकती है और समय से पहले प्रसव (प्री-टर्म बर्थ) का खतरा बढ़ जाता है।
- गंभीर मामलों में प्लेसेंटा का समय से पहले अलग हो जाना या मृत शिशु के जन्म जैसी गंभीर स्थितियां भी पैदा हो सकती हैं।
- वहीं मां के लिए भी यह स्थिति बेहद जोखिमभरी हो सकती है। बिना इलाज के प्री-एक्लेम्पसिया गंभीर सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना, पेट के ऊपरी हिस्से में लगातार दर्द, सांस लेने में तकलीफ, किडनी और लिवर को नुकसान, दौरे पड़ना, स्ट्रोक और अन्य जानलेवा समस्याओं का कारण बन सकता है।
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प्रीक्लेम्पसिया का इलाज कैसे किया जाता है?
डॉ. एम. वी. ज्योत्सना बताती हैं कि प्री-एक्लेम्पसिया का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी कितनी गंभीर है और प्रेग्नेंसी किस स्टेज में है। कई मामलों में मां और शिशु दोनों की नियमित निगरानी की जाती है। हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए दवाएं दी जाती हैं और गंभीर स्थिति में दौरे रोकने वाली दवाओं का भी उपयोग किया जा सकता है।
इसके साथ ही गर्भ में पल रहे शिशु की नियमित जांच की जाती है ताकि उसकी बढ़ोतरी और हेल्थ पर नजर रखी जा सके। यदि डॉक्टर को लगता है कि प्रेग्नेंसी को आगे बढ़ाना मां या बच्चे के लिए ज्यादा जोखिमपूर्ण हो सकता है, तो समय से पहले प्रसव कराना सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है।
निष्कर्ष
प्री-एक्लेम्पसिया प्रेग्नेंसी की एक गंभीर लेकिन समय रहते पहचानी और कंट्रोल की जा सकने वाली समस्या है। नियमित एंटीनेटल चेकअप, ब्लड प्रेशर की निगरानी और किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज न करना मां और शिशु दोनों की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
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FAQ
प्री-एक्लेम्पसिया क्या होता है?
यह प्रेग्नेंसी में हाई ब्लड प्रेशर और अंगों पर असर डालने वाली गंभीर स्थिति है।प्री-एक्लेम्पसिया कब होता है?
आमतौर पर प्री-एक्लेम्पसिया प्रेग्नेंसी के 20वें सप्ताह के बाद होता है।1 महीने की गर्भावस्था के क्या लक्षण हैं?
प्रेग्नेंसी के पहले महीने में पीरियड का न आना, बार-बार पेशाब लगना, जी मिचलाना, थकान और स्तनों में भारीपन महसूस हो सकता है।
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Jun 30, 2026 16:17 IST
Modified By : Akanksha Tiwari Jun 30, 2026 16:17 IST
Published By : Akanksha Tiwari
Reviewed By : Dr M V Jyothsna