Tue Sep 29, 2026 | 04:36 PM IST

Medically Reviewed by Dr Bala Raja Sekhar Chandra , Sr. Consultant - Neuro & Spine Surgeon

एक ही इंसान, अलग-अलग पहचान और बदलता व्यवहार, डॉक्‍टर से जानें क्या है Dissociative Identity Disorder?

डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर होने पर एक ही व्‍यक्‍त‍ि अपने द‍िमाग में अलग-अलग पहचान बना लेता है। उसकी सोच, व्यवहार, पसंद और खुद को देखने का तरीका भी अलग हो सकता है।
एक ही इंसान, अलग-अलग पहचान और बदलता व्यवहार, डॉक्‍टर से जानें क्या है Dissociative Identity Disorder?एक ही इंसान, अलग-अलग पहचान और बदलता व्यवहार, डॉक्‍टर से जानें क्या है Dissociative Identity Disorder?

डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर (Dissociative Identity Disorder) को पहले मल्टीपल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर कहा जाता था। यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जो अक्सर गंभीर मानस‍िक शॉक (ट्रॉमा) से जुड़ी होती है। इसमें व्यक्ति को ऐसा महसूस हो सकता है जैसे उसकी पहचान दो या उससे ज्यादा अलग-अलग पहचान में बंट गई है। हर पहचान का खुद को और आस-पास की दुनिया को देखने, सोचने और दूसरों से व्यवहार करने का तरीका अलग हो सकता है। एक्‍ट्रेस व‍िद्या बालन की फ‍िल्‍म भूल भुलैया भी इसी डिसऑर्डर पर आधार‍ित है। आइए जानते हैं इस कंडीशन के लक्षण, कारण और इलाज। बेहतर जानकारी के ल‍िए हमने Dr. Bala Raja Sekhar Chandra Yetukuri, Sr. Consultant Neuro & Spine Surgeon And Clinical Director- Advance Endoscopic Spine Surgery At Yashoda Hospitals, Hitec City, Hyderabad से बात की।

Mayo Clinic के मुताब‍िक, डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर में व्‍यक्‍त‍ि को ऐसा महसूस होता है जैसे वह अपने द‍िमाग में दो या उससे ज्‍यादा लोगों से बात कर रहा है या उसके द‍िमाग में दो से ज्‍यादा लोग रह रहे हैं। व्‍यक्‍त‍ि को ऐसा महसूस हो सकता है जैसे क‍ि वह क‍िसी दूसरे व्‍यक्‍त‍ि के वश में है। हर पहचान का अपना अलग नाम, व्यक्तिगत इतिहास और विशेषताएं हो सकती हैं। इन पहचानों में आवाज, लिंग, हाव-भाव और यहां तक कि चश्मे की जरूरत जैसी शारीरिक विशेषताओं में भी अंतर हो सकता है।

साल 2023 में Cureus में प्रकाश‍ित एक स्‍टडी के मुताब‍िक, डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर में अलग-अलग पहचानें सिर्फ नाम या व्यवहार में अलग नहीं हो सकतीं, बल्कि दुनिया को देखने, रिश्ते बनाने और अपने आस-पास के माहौल को समझने के तरीके भी अलग हो सकते हैं।

क्या इस कंडीशन में व्यक्ति को अपनी दूसरी पहचान के बारे में पता होता है?

हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है। कुछ लोगों को अपनी दूसरी पहचान के बारे में जानकारी हो सकती है, जबकि कुछ को इसका अंदाजा नहीं होता है या वे इसे भूल जाते हैं।

क्या डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर और सिजोफ्रेनिया एक ही कंडीशन हैं?

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नहीं। दोनों अलग-अलग मानसिक स्वास्थ्य समस्‍याएं हैं। डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर मुख्य रूप से पहचान और डिसोसिएशन से जुड़ा है, जबकि सिजोफ्रेनिया में सोच और धारणा में गंभीर बदलाव हो सकते हैं।

डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर के लक्षण क्‍या हैं?

  • रोजमर्रा की घटनाओं, निजी जानकारी या किसी दर्दनाक घटना से जुड़ी बातें बार-बार याद न रहना।
  • व्यक्ति को कभी-कभी खुद से या अपने आस-पास की दुनिया से अलग होने जैसा भी महसूस हो सकता है।
  • इस कंडीशन में लोगों को कई बार बचपन की बातें भी याद नहीं रहती हैं।
  • अनजाने में ऐसे कपड़े पहनना या हरकतें करना जो व्‍यक्‍त‍ि आमतौर पर नहीं करता है।
  • कई ऐसी चीजें द‍िखना जो असल में नहीं हैं।

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कारण

  • यह स्थिति आमतौर पर बचपन में हुए गंभीर और बार-बार होने वाले मानसिक ट्रॉमा से निपटने के एक तरीके के रूप में विकसित हो सकती है, खासकर जब उस स्थिति से बच निकलने का कोई रास्ता न हो।
  • शारीर‍िक या मानस‍िक शोषण झेलना।
  • रेप, वॉर या भयानक एक्‍सीडेंट का अनुभव करना।
  • क‍िसी मुश्‍क‍िल या दर्दनाक मेड‍िकल प्रक्र‍िया से गुजरना।
  • कुछ मामलों में जेनेट‍िक कारणों से भी ऐसा हो सकता है।

जांच कैसे होती है?

डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर का पता लगाने के लिए डॉक्टर व्यक्ति की पूरी स्थिति को ध्‍यान से परखते हैं। इसका उद्देश्य दूसरी मानसिक या शारीरिक समस्याओं की संभावना को भी दूर करना होता है।

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इस कंडीशन का इलाज कैसे क‍िया जाता है?

  • इसके इलाज में मुख्य रूप से साइकोथेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य ट्रॉमा से जुड़ी समस्याओं को समझना, लक्षणों को कंट्रोल करना और अलग-अलग पहचान के बीच बेहतर तालमेल बनाना होता है। सही इलाज से कई लोगों में लक्षणों में सुधार हो सकता है और वे बेहतर जीवन जी सकते हैं।
  • इस कंडीशन में साइकोथेरेपी लंबे समय तक चल सकती है।
  • र‍िलैक्‍सेशन तकनीक, फैम‍िली थेरेपी, मेड‍िटेशन, दवाओं की मदद ली जाती है।
  • इस कंडीशन के मरीजों में एंग्‍जाइटी ड‍िसऑर्डर, ड‍िप्रेशन, सब्‍सटेंस अब्‍यूज जैसी समस्‍याएं भी देखी जाती हैं। इसका इलाज भी साथ-साथ क‍िया जाता है।

न‍िष्‍कर्ष:

डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर के ज्‍यादातर मामलों में गंभीर मानस‍िक ट्रॉमा या बचपन क‍ी क‍िसी गंभीर घटना के कारण यह कंडीशन होती है। इस कंडीशन में कई बार व्‍यक्‍त‍ि को अपने दो से अध‍िक व्‍यक्‍त‍ित्‍वों की जानकारी होती है, कई बार नहीं भी होती है या वह भूल जाता है। यह कंडीशन स‍िजोफ्रेन‍िया से अलग होती है क्‍योंक‍ि यह पहचान से संबंध‍ित है और स‍िजोफ्रेन‍िया सोच और धारणा से संबंध‍ित है। इस कंडीशन में व्‍यक्‍त‍ि की पहचान दो या उससे ज्‍यादा अलग-अलग पहचान में बंट जाती है। इस कंडीशन के इलाज के ल‍िए साइकोथेरेपी का इस्‍तेमाल क‍िया जाता है।

image credit: magnific

FAQ

  • क्या डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर में याददाश्त चली जाती है?

    कुछ लोगों को रोजमर्रा की घटनाओं, व्यक्ति की जानकारी या पुरानी घटनाओं को याद रखने में परेशानी हो सकती है।
  • क्या डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर और सामान्य मूड स्विंग एक ही हैं?

    नहीं। मूड स्विंग में भावनाएं बदलती हैं, जबकि इस डिसऑर्डर में व्‍यक्‍त‍ि अपनी पहचान बदल लेता है और उससे जुड़े अनुभव अलग हो सकते हैं।

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Yashaswi Mathur

Senior Sub Editor

यशस्वी माथुर पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिनमें से करीब 8 साल उन्होंने हेल्थ जर्नलिज्म को दिए हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं। यहां वह स्वास्थ्य, महिला स्वास्थ्य, पोषण और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। यशस्वी की खासियत है जटिल मेडिकल विषयों और रिसर्च को आसान भाषा में समझाना, ताकि आम पाठक भी उन्हें आसानी से समझ सके। लेख तैयार करते समय वह विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय, मेडिकल रिसर्च और भरोसेमंद स्रोतों का ध्यान रखती हैं। जिन विषयों में मेडिकल वैरिफिकेशन जरूरी होता है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्तान अखबार से की थी। उस दौरान स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी एक खोजी रिपोर्ट के बाद लखनऊ के KGMU स्थित क्वीन मेरी अस्पताल के गायनेकोलॉजी विभाग में व्यवस्थाओं को लेकर स्वास्थ्य विभाग को सुधारात्मक कदम उठाने पड़े। Editorial Policy: यशस्वी द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Sep 29, 2026 15:03 IST

    Published By : Yashaswi Mathur
    Reviewed By : Dr Bala Raja Sekhar Chandra