Fri Sep 11, 2026 | 06:51 PM IST

Medically Reviewed by Archana Jain , Nutritionist

इंटरमिटेंट फास्टिंग का इंसुलिन सेंसिटिविटी पर क्या असर पड़ता है? डॉक्टर से जानें

कई लोग वजन कम करने के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग का सहारा लेते हैं, लेकिन क्या इससे इंसुलिम सेंसिटिविटी पर असर होता है? आइए लेख में जानें।

आज के समय में वजन कम करने के लिए ज्यादातर लोग इंटरमिटेंट फास्टिंग का सहारा लेते हैं। इसे लोग वजन कम करने, फिट रहने और अपनी लाइफस्टाइल को बेहतर बनाने के लिए भी अपनाते हैं। हालांकि कई लोगों के मन में सवाल आता है कि क्या इसका इंसुलिन सेंसिटिविटी पर क्या असर पड़ता है? बता दें, इंटरमिटेंट फास्टिंग में व्यक्ति 16 घंटे की फास्टिंग करते हैं और 8 घंटों के दौरान हेल्दी और पोषक तत्वों से युक्त फूड्स को डाइट में लेते हैं। वहीं, इंसुलिन हमारे शरीर का एक जरूरी हार्मोन है, जो ब्लड में मौजूद ग्लूकोज को सेल्स तक पहुंचाने में मदद करता है। ऐसे में आइए इस बारे में Dr. Prathamesh Deorukhkar, Consultant-Endocrinologist, Kokilaben Dhirubhai Ambani Hospital, Navi Mumbai और जयपुर स्थित Angelcare-A Nutrition and Wellness Center की निदेशक, डाइटिशियन एवं न्यूट्रिशनिस्ट अर्चना जैन से जानें।

इंटरमिटेंट फास्टिंग क्या है?

Dr. Prathamesh Deorukhkar के अनुसार, इंटरमिटेंट फास्टिंग का मतलब है लंबे समय तक - जैसे 10-12 घंटे तक भूखे रहना या फिर दिन के एक थोड़े से टाइम में ही खाना खाना।

इंसुलिन सेंसिटिविटी क्या होती है?

इंसुलिन सेंसिटिविटी का मतलब है कि शरीर की सेल्स इंसुलिन के प्रति कितने अच्छे से तरह प्रतिक्रिया देता है। जब इंसुलिन सेंसिटिविटी अच्छी होती है, तो शरीर कम इंसुलिन की मदद से भी ब्लड में मौजूद ग्लूकोज का सही तरीके से इस्तेमाल कर सकता है। वहीं, इंसुलिन सेंसिटिविटी के कम होने पर शरीर को ज्यादा इंसुलिन की जरूरत पड़ सकती है।

इंटरमिटेंट फास्टिंग का इंसुलिन सेंसिटिविटी पर असर

Dr. Prathamesh के अनुसार, इंटरमिटेंट फास्टिंग के तरीके से कुल कैलोरी की मात्रा कम की जा सकती है, जिससे इंसुलिन रेजिस्टेंस कम हो सकता है और इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर हो सकती है। जब इंटरमिटेंट फास्टिंग में कार्बोहाइड्रेट का सेवन कम किया जाता है, तो शरीर को लिवर में जमा ग्लाइकोजन खत्म होने के बाद फैट और प्रोटीन जैसे दूसरे तरह के फ्यूल का इस्तेमाल करने के लिए बढ़ावा मिलता है।

डाइटिशियन एवं न्यूट्रिशनिस्ट अर्चना जैन के अनुसार, लोगों में इंटरमिटेंट फास्टिंग इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करने में मदद कर सकती है। खाने के बीच लंबे गैप के दौरान शरीर को लगातार इंसुलिन बनाने की जरूरत कम हो सकती है। इससे कुछ लोगों में इंसुलिन की कार्यक्षमता बेहतर हो सकती है। हालांकि, इसका असर हर व्यक्ति में बराबर नहीं होता है और यह उम्र, स्वास्थ्य, वजन तथा लाइफस्टाइल जैसे कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है।

इसे भी पढ़ें: वजन कम करने के लिए वॉटर फास्टिंग या इंटरमिटेंट फास्टिंग, क्या है ज्यादा फायदेमंद?

साल 2025 में Journal of Family Medicine and Primary Care में प्रकाशित रिव्यू के अनुसार, इंटरमिटेंट फास्टिंग डायबिटीज को कंट्रोल करने का एक बेहतरीन तरीका है। इससे वजन कम करने, इंसुलिन को बेहतर बनाने और ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल में रखने में काफी मदद मिलती है। रिसर्च से पता चलता है कि इंटरमिटेंट फास्टिंग के अलग-अलग तरीके - जैसे 16/8 का नियम (16 घंटे भूखे रहना और 8 घंटे के बीच खाना) या 5:2 डाइट (हफ्ते में 5 दिन नॉर्मल खाना और 2 दिन फास्टिंग करने) - टाइप 2 डायबिटीज वाले मरीजों का वजन कम करने और उनकी सेहत को सुधारने में बहुत असरदार हैं।

how does intermittent fasting affect insulin sensitivity explains doctor

वजन नियंत्रण से भी मिलती है मदद

अगर इंटरमिटेंट फास्टिंग के साथ बैलेंस डाइट और नियमित फिजिकल एक्टिविटीज भी अपनाई जाए, तो कुछ लोगों में वजन कम होने में मदद मिल सकती है। एक्स्ट्रा वजन, खासकर पेट के आसपास जमा चर्बी, इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़ी हो सकती है। इसलिए हेल्दी तरीके से वजन को कंट्रोल करने से इंसुलिन सेंसिटिविटी में भी सुधार हो सकता है।

क्या यह सभी लोगों के लिए सही है?

Dr. Prathamesh के अनुसार, यह तरीका हर किसी के लिए सही नहीं है, जैसे कि गंभीर डायबिटीज, इंसुलिन लेने वाले मरीज और बहुत कम या बहुत ज्यादा उम्र के लोगों के लिए यह तरीका सही नहीं हो सकता है, इसलिए उन्हें इसके बारे में अपने एंडोक्रिनोलॉजिस्ट या डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

डाइटिशियन एवं न्यूट्रिशनिस्ट अर्चना जैन का कहना है, इंटरमिटेंट फास्टिंग हर व्यक्ति के लिए सही नहीं होती है। प्रेग्नेंट महिलाओं, ब्रेस्टफीड कराने वाली महिलाओं, बच्चों, खानपान से जुड़े डिसऑर्डर से जूझ रहे लोगों और कुछ गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों को इसे शुरू करने से पहले एक्सपर्ट से सलाह लेनी चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को डायबिटीज है और वह इंसुलिन या अन्य दवाएं ले रहा है, तो बिना डॉक्टर की सलाह के इंटरमिटेंट फास्टिंग शुरू नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे ब्लड शुगर का स्तर बहुत कम हो सकता है।

इसे भी पढ़ें: क्या रोजाना योग करने से इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ती है? एक्सपर्ट से जानें

इंटरमिटेंट फास्टिंग में कुछ बातों का रखें ध्यान

Dr. Prathamesh के अनुसार, इंटरमिटेंट फास्टिंग के कॉन्सेप्ट में एक जरूरी बात यह है कि इस दौरान प्रोटीन का सेवन पर्याप्त होना चाहिए, ताकि मसल्स सेफ रहें और कुल मिलाकर मेटाबॉलिज्म को फायदा हो। 

इंटरमिटेंट फास्टिंग के दौरान खाने की गुणवत्ता पर खास ध्यान दें। खाने के समय हेल्दी और बैलेंस डाइट लें, जिसमें साबुत अनाज, दालें, हरी सब्जियां, फल, प्रोटीन औ हेल्दी फैट्स शामिल हों। पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी जरूरी है। सिर्फ लंबे समय तक भूखे रहने से फायदा नहीं मिलता है, बल्कि बैलेंस डाइट और हेल्दी लाइफस्टाइल भी उतनी ही जरूरी है।

निष्कर्ष

इंटरमिटेंट फास्टिंग कुछ लोगों में इंसुलिन सेंसिटिविटी सुधारने में सहायक हो सकती है, खासकर जब इसे बैलेंस डाइट, नियमित एक्सरसाइज और हेल्दी लाइफस्टाइल के साथ अपनाया जाए। हालांकि, इसका असर हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकता है और इसे किसी बीमारी के इलाज का ऑप्शन नहीं माना चाहिए। अगर आपको ब्लड शुगर या कोई अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, तो इंटरमिटेंट फास्टिंग शुरू करने से पहले एक्सपर्ट से सलाह लेनी चाहिए। ध्यान रहे, ब्लड शुगर से जुड़ी कोई भी परेशानी होने पर डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

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FAQ

  • इंसुलिन रेजिस्टेंस को कैसे ठीक करें?

    इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या होने पर व्यक्ति को नियमित एक्सरसाइज करने, बैलेंस डाइट लेने, पर्याप्त नींद लेने, स्ट्रेस को कम करने और वजन को नियंत्रित करने की सलाह दी जाती है।
  • इंसुलिन की अधिक मात्रा के क्या लक्षण हैं?

    इंसुलिन का स्तर बढ़ने पर व्यक्ति को अधिक पसीना आने, घबराहट होने, चक्कर आने, तेज भूख लगने, भ्रम होने और हाथों-पैरों में कंपन होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

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Priyanka Sharma

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Sub Editor

प्रियंका शर्मा हेल्थ और लाइफस्टाइल पत्रकारिता में करीब 3 साल का अनुभव रखती हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत डिजिटल मीडिया से की है। फिलहाल प्रियंका जागरण न्यू मीडिया (Onlymyhealth) में बतौर सब एडिटर काम कर रही हैं। प्रियंका को स्वास्थ्य, पोषण, स्किन केयर और फिटनेस जैसे विषयों पर लिखने का अच्छा अनुभव है। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नलिज्म की है। Editorial Policy: प्रियंका द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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