कार्डियक अरेस्ट होने पर शुरुआती समय बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इसमें हार्ट अचानक से पंपिंग करना बंद कर देता है। इससे शरीर के कई जरूरी अंगों को ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। इसलिए इसे इमरजेंसी की स्थिति भी माना जाता है। हालांकि, समय पर मरीज को मदद मिल जाए, तो उसकी जान बचाई जा सकती है। इस बारे में Dr. Ujjawal Kumar, Senior Consultant - Cardiology, Sarvodaya Hospital, Faridabad कहते हैं कि कार्डियक अरेस्ट में मरीज के लिए हर मिनट जरूरी होता है। इसलिए मदद जितनी जल्दी शुरू होती है, मरीज को उतने ही बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
कार्डियक अरेस्ट में किन 5 बातों का ध्यान रखें?
Cleveland Clinic और Dr. Ujjwal Kumar के अनुसार, कार्डियक अरेस्ट के बाद मरीज के बचने की संभावना को बढ़ाने के लिए बीमारी की जल्दी पहचान, तुरंत सीपीआर देना और जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाना जरूरी होता है। आस-पास के लोग मरीज की पांच बातों को ध्यान में रखकर मदद कर सकते हैं।
1. कार्डियक अरेस्ट की जल्दी पहचान करना
Dr. Ujjwal Kumar कहते हैं, “सबसे पहले आस-पास के लोगों के लिए यह जानना और समझना जरूरी है कि मरीज को कार्डियक अरेस्ट आया है। अगर कोई भी व्यक्ति अचानक से बेहोश हो गया है और उसे सांस लेने में तकलीफ है या सांस नहीं ले पा रहा, तो यह कार्डियक अरेस्ट हो सकता है। कुछ लोगों को कार्डियक अरेस्ट से पहले धड़कन तेज होना, सांस फूलना, चक्कर आना या सिर हल्का महसूस हो सकता है। ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज बिल्कुल नहीं करना चाहिए, लेकिन कुछ लोगों को कार्डियक अरेस्ट से पहले किसी भी तरह के लक्षण महसूस नहीं होते। इसलिए अचानक गिरने पर समय गंवाना सबसे बड़ी मुश्किल बन सकता है।”
2. CPR तुरंत शुरू करना
Dr. Ujjwal Kumar ने कहा, “अगर कोई व्यक्ति गिरने के बाद कुछ भी रिस्पांस न दें, तो एम्बुलेंस बुलाने के साथ ही सीपीआर (Cardiopulmonary Resuscitation) शुरू कर देनी चाहिए। अगर किसी को CPR देना नहीं आता, तो मरीज की छाती पर दबाव देना चाहिए, ताकि ब्लड मरीज की महत्वपूर्ण अंगों तक पहुंच सके। CPR मरीज के लिए बहुत फायदेमंद हो सकता है।”
American Heart Association के अनुसार, अगर किसी वयस्क को कार्डियक अरेस्ट आया है, तो उसकी छाती पर 100 से 120 प्रति मिनट की रफ्तार से दबाव डालना चाहिए और इस दबाव की गहराई करीब 5 सेंटीमीटर यानी 2 inches तक होनी चाहिए।
factors affecting cardiac arrest survival rate
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3. AED का जल्दी मिलना
Dr. Ujjwal Kumar ने बताया कि अगर कार्डियक अरेस्ट के कारण दिल की धड़कन अनियमित होती है, तो समय पर इलेक्ट्रिक शॉक यानी डिफिब्रिलेटर देने से मरीज को बचाया जा सकता है। AED यानी Automated External Defibrillator ऐसा उपकरण है, जो हार्ट की रिदम को चेक करता है और जरूरत होने पर शॉक देता है। अगर मरीज के आस-पास डिफिब्रिलेटर है, तो तुरंत उसका इस्तेमाल करना चाहिए।
4. मेडिकल इमरजेंसी जल्द मिलना
Dr. Ujjwal Kumar कहते हैं, “कार्डियक अरेस्ट में एम्बुलेंस और अनुभवी डॉक्टरों का समय पर पहुंचाना बहुत जरूरी है। अस्पताल पहुंचने से पहले मरीज को सही इलाज मिलना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। सीपीआर और डिफिब्रिलेटर देते समय अगर एम्बुलेंस भी आ जाए, तो मरीज के बचने की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ सकती है।”
5. अस्पताल में पोस्ट-कार्डियक अरेस्ट उपचार मिलना
Dr. Ujjwal Kumar के मुताबिक, कार्डियक अरेस्ट में मरीज की हार्ट बीट वापस आने के बाद भी इलाज खत्म नहीं होता। मरीज की ICU में लगातार निगरानी रखना, एंजियोप्लास्टी, वेंटिलेटर सपोर्ट और दिमाग व जरूरी अंगों का लगातार चेकअप करना भी बहुत जरूरी है। कार्डियक अरेस्ट के बाद रिकवरी भी बहुत जरूरी है, ताकि मरीज अपनी सामान्य जिंदगी जी सके।
क्या कार्डियक अरेस्ट के बाद मरीज पूरी तरह ठीक हो सकता है?
Dr. Ujjwal Kumar कहते हैं, “यह मरीज की हेल्थ कंडीशन पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है। इसमें सबसे जरूरी है कि कार्डियक अरेस्ट की पहचान कितनी जल्दी हुई और उसे CPR और AED कितनी जल्दी मिला। इसके साथ मेडिकल इमरजेंसी में अस्पताल कितनी जल्दी पहुंचा है? इसके अलावा, मरीज का ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और हार्ट की कंडीशन जैसे फैक्टर्स पर भी निर्भर करता है।”
निष्कर्ष
कार्डियक अरेस्ट में सबसे जरूरी है कि मरीज को समय पर सीपीआर मिल जाए, ताकि उसके शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ सके और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को ऑक्सीजन मिल सके। ऐसे में मरीज के बेहोश होने पर आस-पास के लोगों को तुरंत मदद करनी चाहिए।
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FAQ
क्या मरीज की उम्र और पहले से मौजूद बीमारियां रिकवरी को प्रभावित करती हैं?
अगर मरीज को पहले से गंभीर किडनी रोग, फेफड़ों की बीमारी या पुराना दिल का दौरा पड़ा हो, तो अरेस्ट के बाद रिकवरी की संभावना कम हो जाती है। हालांकि, सही समय पर मिला सही फर्स्ट-एड किसी भी उम्र के मरीज की जान बचा सकता है।जो मरीज कार्डियक अरेस्ट से बच जाते हैं, उन्हें भविष्य में दोबारा अरेस्ट से बचाने के लिए क्या उपाय किया जाता है?
ऐसे मरीजों के दिल में सर्जरी द्वारा आइसीडी (ICD - Implantable Cardioverter Defibrillator) मशीन लगाई जाती है। यह छोटी डिवाइस छाती में फिट रहती है और भविष्य में दिल की धड़कन असामान्य होते ही खुद इलेक्ट्रिक शॉक देकर धड़कन को सामान्य कर देती है।
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Oct 08, 2026 13:59 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Ujjawal Kumar
