Fri Sep 11, 2026 | 06:51 PM IST

Medically Reviewed by Dr Deepak Prajapat , Senior Consultant – Pulmonology

क्या प्राणायाम करने से अस्थमा कंट्रोल हो सकता है? जानें क्या कहती है स्टडी और डॉक्टर

प्राणायाम अस्थमा के लक्षणों में सुधार कर सकता है, लेकिन यह दवाओं का विकल्प या इसका इलाज नहीं होता है। नियमित रूप से प्राणायाम करने से सांस लेने की क्षमता बढ़ती है और तनाव कम होता है। 

अस्थमा सांस से जुड़ी ऐसी समस्या है, जिसमें सांस की नली में सूजन और सिकुड़न आ जाती है। अस्थमा के मरीजों में सांस लेने की समस्या काफी आम होती है। ऐसे में अस्थमा से राहत पाने के लिए लोग कई तरह के उपायों को आजमाते हैं। लोगों का मानना है कि प्राणायाम से भी अस्थमा के लक्षणों को कंट्रोल करने में मदद करता है। हालांकि, Dr. Deepak Prajapat, Pulmonologist, Metro Heart Institute, Noida का कहना है कि प्राणायाम अस्थमा के मरीजों के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन यह इसे कंट्रोल नहीं कर सकता है। आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

क्या प्राणायाम वास्तव में अस्थमा में मदद करता है?

Dr. Deepak Prajapat का कहना है कि नियमित और सही तकनीक से किया गया प्राणायाम अस्थमा से पीड़ित कई मरीजों की स्थिति में सुधार कर सकता है। जो मरीज इनहेलर, सही लाइफस्टाइल और डाइट के साथ नियमित रूप से प्राणायाम करते हैं तो इसका उनकी सेहत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। जिन मरीजों ने नियमित रूप से प्राणायाम या सांस से जुड़े योग का अभ्यास किया है, उनमें कई मामलों में सांस फूलने की समस्या कम हुई, मानसिक तनाव कम हुआ और लाइफ की क्वालिटी भी बेहतर हुई है। हालांकि, इसका फायदा हर मरीज की स्थिति और प्राणायाम करने के तरीके पर निर्भर करता है। इसलिए, अस्थमा से पीड़ित हर व्यक्ति में इसका फायदा एक जैसा नहीं होता है।

स्टडी क्या कहती हैं?

साल 2021 में Indian Journal of Pediatrics में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, अस्थमा सांस से जुड़ी एक ऐसी बीमारी है, जिसका कोई पक्का इलाज नहीं है लेकिन प्राणायाम यानी सांस से जुड़ी एक्सरसाइज जैसे प्राणायाम इसे बेहतर बनाने में बहुत फायदेमंद हो सकती है। अस्थमा का मतलब होता है हांफना या तेज-तेज सांसें लेना और प्राणायाम करने से हम अपनी सांसों को काबू में कर सकते हैं और उन्हें शांत करना सीखते हैं। प्राणायाम करने से न सिर्फ फेफड़ों की मांसपेशियों को ताकत मिलती है, बल्कि शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत बढ़ती है और तनाव या घबराहट को कम करने में प्रभावी हो सकती है।

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साल 2009 में International Journal of Yoga में बताया गया है कि सांस लेने की एक्सरसाइज करने के दौरान सांस लेने की प्रक्रिया को कंट्रोल करने और बहुत तेजी से सांस लेने को कम करने में मदद मिलती है। यह श्वसन मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, तनाव और एंग्जायटी को कम करने में फायदेमंद होता है।

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अस्थमा में कौन-कौन से प्राणायाम उपयोगी हो सकते हैं?

Dr. Deepak Prajapat ने बताया कि अगर अस्थमा से पीड़ित मरीज की स्थिति स्थिर है तो वह डॉक्टर की सलाह पर इन प्राणायाम का अभ्यास कर सकते हैं-

1. अनुलोम-विलोम

अनुलोम-विलोम करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है और शरीर में ऑक्सीजन के लेवल में सुधार होता है। अस्थमा के मरीजों के लिए यह एक्सरसाइज फायदेमंद होती है, क्योंकि यह सांस की नली की सूजन को कम करने और मानसिक तनाव को दूर करने में मदद कर सकती है।

साल 2018 में International Journal of Advances in Medicine में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, रोजाना 10 मिनट तक, लगातार एक महीने तक अनुलोम-विलोम प्राणायाम करने से मरीजों की सांस फूलने की समस्या में कमी आई और फेफड़ों की कार्यक्षमता में सुधार हुआ है।

2. भ्रामरी प्राणायाम

Dr. Deepak Prajapat के अनुसार, अस्थमा का एक बड़ा ट्रिगर मानसिक तनाव और एंजायटी भी होता है। भ्रामरी प्राणायाम इस समस्या को कम करने में काफी कारगर हो सकता है। जब आप भौंरे जैसी आवाज की गूंज निकालते हैं तो इससे निकलने वाले वाइब्रेशन से नाक और फेफड़ों के रास्ते खुलते हैं और मन शांत होता है।

3. डायाफ्रामेटिक ब्रीदिंग 

साल 2020 में Cochrane Database of Systematic Reviews के अनुसार अस्थमा को मैनेज करने में डायाफ्रामैटिक ब्रीदिंग (Diaphragmatic breathing) यानी पेट से गहरी सांस लेने का अभ्यास करना काफी प्रभावी माना जाता है। अस्थमा से पीड़ित लोग छाती से उथली सांस लेते हैं, जिससे फेफड़ों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता है। डायाफ्रामेटिक ब्रीदिंग एक्सरसाइज करने से फेफड़ों के निचले हिस्से को मजबूती मिलती है, जिससे शरीर को कम मेहनत में ज्यादा ऑक्सीजन मिलती है।

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किन बातों का विशेष ध्यान रखें?

Dr. Deepak Prajapat का कहना है कि हर प्राणायाम अस्थमा के मरीजों के लिए सही नहीं होता है। खासकर तेज गति वाले श्वास अभ्यास, बहुत जोर से सांस लेना और लंबे समय तक सांस रोकना कुछ मरीजों में सांस की तकलीफ को बढ़ा सकते हैं। इसलिए, अस्थमा के मरीजों के लिए किसी भी श्वास अभ्यास को शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर या पल्मोनोलॉजिस्ट से सलाह लेना जरूरी है।

डॉक्टर से कब मिलना चाहिए?

अस्थमा के मरीजों के लिए प्राणायाम करना फायदेमंद हो सकता है। हालांकि, अगर मरीज को बार-बार सांस फूलने की समस्या, रिलीवर इनहेलर की जरूरत बढ़ गई हो, रात में खांसी और सांस की तकलीफ से नींद टूटती हो, बोलने में भी सांस फूलने लगे या सीने में ज्यादा जकड़न महसूस हो तो इन समस्याओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में मरीज को बिना देर किए तुरंत डॉक्टर से कंसल्ट करना चाहिए।

निष्कर्ष

Dr. Deepak Prajapat का कहना है कि अस्थमा के मरीजों के लिए नियमित रूप से प्राणायाम करने से श्वसन क्षमता में सुधार, दिमाग को शांत करने और संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर रखने में मदद मिलती है। इस बात का ध्यान रखें कि इनहेलर अस्थमा की दवा का विकल्प नहीं होता है। अस्थमा एक कंट्रोल की जाने वाली बीमारी है, जिसे सही इलाज, नियमित इनहेलर, संतुलित लाइफस्टाइल और प्रदूषण से बचाव के साथ डॉक्टर की सलाह फॉलो करना प्रभावी हो सकता है।
Image Credit: Freepik

FAQ

  • अस्थमा किसकी वजह से होता है?

    अस्थमा जेनेटिक कारणों, एलर्जी और पर्यावरण के कारकों के कारण फेफड़ों की सांस की नलियों में सूजन और सिकुड़न आने से होता है।
  • अस्थमा के लिए सबसे खराब भोजन कौन सा है?

    अस्थमा के मरीजों के लिए सबसे खराब भोजन सल्फाइट से भरपूर चीजें, तले-भुने और प्रोसेस्ड फूड्स हैं।

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कात्यायनी तिवारी पिछले 6 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। करियर की शुरुआत उन्होंने न्यूज चैनल से की और बाद में डिजिटल मीडिया में हेल्थ और लाइफस्टाइल विषयों पर काम करना शुरू किया। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं।वह महिला स्वास्थ्य, पोषण, आयुर्वेद, योग, स्किन हेल्थ और प्रेग्नेंसी जैसे विषयों पर लिखती हैं। उनका प्रयास रहता है कि ताजा रिसर्च, विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय और प्रमाणित स्रोतों के आधार पर सही स्वास्थ्य जानकारी सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचे। जिन लेखों में मेडिकल पुष्टि जरूरी होती है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है।OnlyMyHealth से पहले वह Jantantra TV और Boldsky के साथ काम कर चुकी हैं।

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    Jul 25, 2026 16:34 IST

    Published By : Katyayani Tiwari
    Reviewed By : Dr Deepak Prajapat

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