क्या रिश्ते संभालने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की है? पुरुषों की नहीं!

पारंपरिक रूप से रिश्ते संभालने का कार्य स्त्रियां ही करती आ रही हैं, पर बदलते सामाजिक संदर्भ में यह सवाल बेहद प्रासंगिक है कि क्या रिश्ते निभाना सिर्फ स्त्रियों की जि़म्मेदारी है?

Rashmi Upadhyay
Written by: Rashmi UpadhyayUpdated at: Nov 17, 2017 12:49 IST
क्या रिश्ते संभालने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की है? पुरुषों की नहीं!

पारंपरिक रूप से रिश्ते संभालने का कार्य स्त्रियां ही करती आ रही हैं, पर बदलते सामाजिक संदर्भ में यह सवाल बेहद प्रासंगिक है कि क्या रिश्ते निभाना सिर्फ स्त्रियों की जि़म्मेदारी है? आज की पीढ़ी का मानना है कि पारिवारिक और सामाजिक संबंधों के निर्वाह में स्त्रियों की तरह पुरुषों की भी भागीदारी होनी चाहिए। परिवार पति-पत्नी के सहयोग से ही चलता है। इसलिए संबंधों को अच्छी तरह निभाने की कोशिश पति की ओर से भी होनी चाहिए।

पुराने समय में स्त्रियां घर पर ही रहती थीं। इसलिए उनके पास पर्याप्त समय होता था और वे मायके-ससुराल के अलावा पास-पड़ोस के सामाजिक संबंधों को निभाने की जि़म्मेदारी अकेले ही उठा लेती थीं। आज के दौर में ज्य़ादातर स्त्रियां जॉब करती हैं। घर और दफ्तर के कार्यों की वजह से उनकी व्यस्तता बढ़ गई है और वे चाहकर भी रिश्तेदारों से मिलने-जुलने का वक्त नहीं निकाल पातीं। ऐसे में पति का यह फर्ज़ बनता है कि वह अपने परिवार के अलावा पत्नी के मायके वालों से भी मिलने-जुलने के लिए समय जरूर निकालें।

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स्त्री ही निभाती है रिश्ते

आदर्श स्थिति तो यही है कि पति-पत्नी दोनों को साथ मिलकर अपने रिश्तों का ख्याल रखना चाहिए, लेकिन व्यावहारिक रूप से आज भी ऐसा संभव नहीं हो पाता। पुरुष अपनी नौकरी या व्यवसाय से जुड़े कार्यों में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में घर-परिवार और रिश्तों को संभालने की जि़म्मेदारी अकेले स्त्री को ही निभानी पड़ती है।

यहां तक कि जिन परिवारों में पति-पत्नी दोनों जॉब करते हैं, वहां भी सामाजिक संबंधों को लेकर स्त्रियां ही ज्य़ादा गंभीर नज़र आती हैं। दरअसल उनके व्यक्तित्व में स्वाभाविक रूप से केयरिंग और शेयरिंग की भावना होती है। इसीलिए उन्हें लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है। इसी वजह से अति व्यस्तता के बावज़ूद कामकाजी स्त्रियां भी सामाजिक उत्सवों में शामिल होने के लिए वक्त निकाल ही लेती हैं।

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क्या है हकीकत

भारतीय समाज में पारंपरिक रूप से स्त्री-पुरुष के कार्यों का स्पष्ट विभाजन था। पति रोजगार के लिए घर से बाहर जाता था। इसलिए उसके परिवार के सभी सदस्यों का ख्याल रखने की जि़म्मेदारी स्त्री के कंधों पर होती थी। फिर समय के साथ स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार हुआ और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने लगीं। ऐसे में उन पर घर-बाहर की दोहरी जि़म्मेदारियां आ गईं। बढ़ती व्यस्तता की वजह से आज की कामकाजी स्त्री अपने सामाजिक संबंधों को बहुत ज्य़ादा वक्त नहीं दे पाती।

ऐसे में वह जिस तरह घरेलू कार्यों में पति से सहयोग की अपेक्षा रखती है, उसी तरह रिश्तों को लेकर भी उसके मन में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठने लगा है कि क्या रिश्ते निभाना सिर्फ उसी की जि़म्मेदारी है? सामाजिक संबंधों के निर्वाह में पुरुषों की भी सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। व्यावहारिक रूप से आज भी रिश्तों को संजोने की जि़म्मेदारी स्त्रियों को ही निभानी पड़ती है। जबकि रिश्ता चाहे कोई भी हो, उसे संजोने की कोशिश मिलजुल कर होनी चाहिए।

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