Cleveland Clinic के अनुसार, ऑटोइम्यून डिजीज ऐसी कंडीशन होती है, जब शरीर का इम्यून सिस्टम शरीर की रक्षा करने की बजाय उसी पर हमला करने लगता है। इम्यून सिस्टम शरीर के इनबिल्ट सिक्योरिटी सिस्टम की तरह होता है, जो शरीर में किसी भी तरह की इंफेक्शन, बैक्टीरिया और वायरस के संपर्क में आने पर सफेद ब्लड सेल्स (WBC) के जरिए इंफेक्शन को खत्म करता है। ऑटोइम्यून में यही इम्यून सिस्टम जरूरत से ज्यादा एक्टिव हो जाता है और गलती से शरीर के हेल्दी टिश्यू को नुकसान पहुंचाने लगता है। ये बीमारियां जीवनभर चल सकती हैं और मरीज को इसके लक्षणों को मैनेज करना होता है। ऑटोइम्यून के लक्षणों और कारणों के साथ-साथ लक्षणों को मैनेज करने के तरीकों के बारे में हमने Dr. Pooja Pillai, Consultant - Internal Medicine, Aster CMI Hospital, Bangalore और Dr. Bhaskar Shukla, Consultant Neurology, PSRI Hospital, Delhi से बात की।
ऑटोइम्यून डिजीज क्यों होती है?
Johns Hopkins Medicine के मुताबिक, ऑटोइम्यून डिजीज होने के तीन मुख्य कारण हो सकते हैं। इसमें जीन्स, इम्यून सिस्टम और पर्यावरणीय फैक्टर्स शामिल हैं।
जीन्स (फैमिली हिस्ट्री)
ऑटोइम्यून डिजीज पॉलीजेनिक होती हैं, यानी ये किसी एक जीन की खराबी से नहीं, बल्कि कई जीनों के छोटे-छोटे प्रभावों से होती है। MHC/HLA लोकस ऐसा जीनोम है, जो ऑटोइम्यूनिटी से जुड़ा हुआ है। अगर किसी को टाइप 1 डायबिटीज या ल्यूपस की बीमारी है, तो यह HLA के कारण हो सकती है। इसके अलावा, Johns Hopkins Medicine के अनुसार, अगर एक जुड़वां भाई को ऑटोइम्यून की बीमारी है, तो दूसरे व्यक्ति में इसका रिस्क करीब 10 गुना तक बढ़ सकता है।

यह भी पढ़ें- पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस: डिलीवरी के बाद थायरॉइड की समस्या, जानें इसके कारण, लक्षण और इलाज
इम्यून सिस्टम
इसके मुताबिक, बीमारी के लक्षण दिखने से पहले ही इम्यून सिस्टम में दिक्कत होने लगती है। शरीर में टी सेल्स अनियंत्रित तरीके से फैलने लगते हैं। इसके अलावा, बीमारी के लक्षण दिखने से पांच से सात साल पहले ही ब्लड में ऑटो-एंटीबॉडीज दिखने लगते हैं। जैसे कि हाशिमोटो थायराइडाइटिस के लक्षण आने से सात साल पहले ही थायरोपेरोक्सीडेज एंटीबॉडी शरीर में मौजूद हो सकती है।
अन्य कारण
वैज्ञानिकों का मानना है कि पिछले 50 सालों से मानव जीन में कुछ खास बदलाव नहीं हुए हैं। इसलिए कुछ फैक्टर्स ऑटोइम्यून डिजीज को बढ़ा सकते हैं। इसमें इंफेक्शन, विटामिन D की कमी, आयोडीन का ज्यादा सेवन या शिशुओं को मां के दूध के बजाय गाय का दूध देना शामिल है। इसके अलावा, स्ट्रेस और प्रदूषण भी इम्यून सिस्टम का बैलेंस बिगाड़ सकते हैं।
हार्मोनल बदलाव
Dr. Bhaskar Shukla कहते हैं, “ऑटोइम्यून बीमारियां महिलाओं में हार्मोनल बदलाव होने के कारण से भी हो सकती हैं। एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन और टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोनल बदलावों के कारण इम्यून सिस्टम में असंतुलन हो सकता है। इसके अलावा, प्यूबर्टी और मेनोपॉज के दौरान हार्मोनल बदलाव के कारण लूपस और थायराइड जैसी समस्याएं शुरू हो सकती हैं। मेनोपॉज के समय भी कई ऑटोइम्यून डिजीज एक्टिव हो सकते हैं। इसलिए इस दौरान खासतौर पर ऑटोइम्यून बीमारियों के लक्षणों पर ध्यान देने की जरूरत होती है।"
महिलाओं को ऑटोइम्यून ज्यादा क्यों होता है?
Evolutionary Application में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, महिलाओं में पुरुषों की तुलना में ऑटोइम्यून बीमारियाँ होने का जोखिम चार गुना ज्यादा हो सकता है। महिलाओं के शरीर में जन्मजात रूप से और इंफेक्शन या टीकाकरण के जवाब में पुरुषों के मुकाबले ज्यादा एंटीबॉडीज बनते हैं। ये एंटीबॉडीज एक ओर शरीर की रक्षा करते हैं, वहीं दूसरी ओर ऑटो-एंटीबॉडी बनकर सेहतमंद टिश्यू पर हमला कर सकते हैं, जिससे लूपस जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
ऑटोइम्यून डिजीज कितने तरह के होते हैं?
Cleveland Clinic के अनुसार, ऑटोइम्यून बीमारियां 100 से भी ज्यादा हैं, जो शरीर के लगभग हर अंग को प्रभावित कर सकती हैं। इनमें कुछ बीमारियां एक खास अंग को प्रभावित करती हैं, जैसे टाइप 1 डायबिटीज, हाशिमोटो थायराइडाइटिस और सीलिएक डिजीज शामिल है। कुछ सिस्टेमिक होती है, जो पूरे शरीर या कई अंगों को प्रभावित कर सकती है।
कॉमन ऑटोइम्यून डिजीज
Dr. Bhaskar Shukla कहते हैं, “वैसे तो ऑटोइम्यून से जुड़ी कई बीमारियां हैं और किसी को भी कॉमन कहना सही नहीं होगा, लेकिन कुछ ऑटोइम्यून बीमारियां तेजी से लोगों में देखने को मिल रही हैं, जिसके बारे में जानना बहुत महत्वपूर्ण है।
टाइप 1 डायबिटीज
जब शरीर का इम्यून सिस्टम पैंक्रियाज में इंसुलिन बनाने वाले टिश्यू को खत्म कर देता है, तब टाइप 1 डायबिटीज होने का रिस्क होता है। इंसुलिन वह हार्मोन है जो ब्लड शुगर को एनर्जी देने के लिए टिश्यू में प्रवेश करने में मदद करता है। टाइप 1 डायबिटीज में बहुत ज्यादा प्यास, बार-बार पेशाब आना, अचानक वजन कम होना और थकान होना शामिल हैं। इससे पीड़ित मरीजों को रेगुलर शुगर चेक करना चाहिए और रोजाना इंसुलिन के इंजेक्शन लगाने की जरूरत पड़ती है।
रूमेटाइड आर्थराइटिस
इस बीमारी में इम्यून सिस्टम जोड़ों पर हमला कर देता है, जिससे प्रभावित एरिया में सूजन और अकड़न महसूस होने लगती है।रूमेटाइड आर्थराइटिस आमतौर पर हाथों, कलाई, घुटनों और टखनों को प्रभावित करता है। गंभीर मामलों में यह जोड़ों के शेप को बिगाड़ सकता है। अगर किसी को सुबह उठते ही जोड़ों में अकड़न, गर्माहट और थकान हो, तो ये रूमेटाइड आर्थराइटिस के लक्षण हो सकते हैं।
सोरायसिस
यह बीमारी स्किन से जुड़ी हुई है, जिसमें स्किन के टिश्यू बहुत तेजी से बनने लगते हैं। इसमें प्लाक सोरायसिस सबसे आम है। इस बीमारी में स्किन पर लाल, उभरे हुए पैच बन जाते हैं जिन पर चांदी जैसी पपड़ी जम जाती है। यह अक्सर कोहनी, घुटनों और खोपड़ी पर होता है। लगभग 30 प्रतिशत रोगियों को सोरायटिक आर्थराइटिस भी हो सकता है।

मल्टीपल स्क्लेरोसिस
यह बीमारी दिमाग और रीढ़ की हड्डी की तंत्रिका कोशिकाओं के माइलिन शीथ (Myelin Sheath) को नुकसान पहुंचाती है। इसमें चलने में मुश्किल, सुन्नता, बैलेंस खोना और आंखों संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं। मल्टीपल स्क्लेरोसिस के कारण दिमाग और शरीर के बाकी हिस्सों के बीच मैसेजिंग धीमी हो जाती है।
इंफ्लेमेटरी बॉवेल डिजीज
इस बीमारी में आंतों में सूजन आने लगती है और दो तरह की बीमारियां ज्यादा होती हैं।
क्रोहन रोग - इसमें डाइजेशन सिस्टम के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकता है।
अल्सरेटिव कोलाइटिस - इसमें सिर्फ बड़ी आंत और मलाशय की परत प्रभावित होती है।
ग्रेव्स डिजीज
इस बीमारी में गर्दन में मौजूद थायराइड ग्लैंड पर हमला होता है, जिस वजह से बहुत ज्यादा थायराइड हार्मोन बनने लगते हैं। इस बीमारी में आमतौर पर मरीजों की हार्ट बीट तेज हो जाती है, वजन कम होने लगता है और हाथों में कंपन महसूस होता है।
लूपस
इस ऑटोइम्यून बीमारी में शरीर के किसी भी हिस्से में सूजन हो सकती है। इसमें जोड़, स्किन, ब्लड वेसल्स और किडनी शामिल हैं। इसमें मरीजों के चेहरे पर अक्सर तितली के आकार का रैश (Butterfly Rash) दिखाई देता है।
विटिलिगो (सफेद दाग)
यह स्किन से जुड़ा रोग है, जिसमें स्किन का रंग बदलकर सफेद धब्बों में हो जाता है। इस बीमारी में इम्यून सिस्टम मेलानोसाइट्स, जो रंग बनाने वाले टिश्यू होते हैं, को खत्म कर देता है। डॉक्टर इससे जुड़े लक्षणों को मैनेज करने के लिए दवाएं देते हैं।
सीलिएक रोग
जिन लोगों को गेहूं या जौ में पाया जाने वाले ग्लूटेन से एलर्जी होती है, उन्हें सीलिएक रोग होने का रिस्क रहता है। ग्लूटेन गेहूं या जौ में पाया जाने वाला प्रोटीन है, जिसे खाने पर इम्यून सिस्टम छोटी आंत की परत को नुकसान पहुंचा सकता है।
हाशिमोटो थायराइडाइटिस
यह बीमारी ग्रेव्स डिजीज से बिल्कुल उलट होती है। इसमें इम्यून सिस्टम थायराइड ग्लैंड पर हमला करके उसे धीमा कर देता है, जिससे हाइपोथायरायडिज्म की बीमारी हो सकती है। इसमें थायराइड हार्मोन की कमी होने लगती है।
ऑटोइम्यून डिजीज के लक्षण क्या हैं?
Dr. Pooja Pillai कहती हैं, "ऑटोइम्यून बीमारियों के लक्षण अक्सर आते-जाते रहते हैं। कभी मरीज को अच्छा महसूस होता है, तो कभी लक्षण अचानक गंभीर हो जाते हैं। दरअसल, ये लक्षण कई अन्य सामान्य बीमारियों जैसे ही लगते हैं, इसलिए शुरुआत में अक्सर इन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है।”
- ऑटोइम्यून बीमारी में मरीज को थकान बहुत ज्यादा लगती है, जो आराम करने के बाद भी ठीक नहीं होती।
- बिना किसी कारण हल्का बुखार रहना
- जोड़ों में दर्द, मांसपेशियों में खिंचाव और सूजन होना
- स्किन पर रैशेस, लालिमा या पपड़ी जाना
- डाइजेशन की समस्या होना जैसे दस्त, पेट में दर्द या कब्ज होना
- हाथ-पैरों का सुन्न होना
- आंखों या मुंह में बहुत ज्यादा सूखापन महसूस होना
- बाल झड़ना, ग्लैंड में सूजन और मुंह में छाले होना
ऑटोइम्यून डिजीज का चेकअप कैसे होता है?
Cleveland Clinic के मुताबिक, ऑटोइम्यून बीमारी की पहचान डॉक्टर कई तरीकों से कर सकते हैं।
सबसे पहले तो डॉक्टर लक्षणों की पहचान करते हैं। मरीज का फिजिकल चेकअप किया जाता है, जिसमें सूजन या दर्द की जगह चेक की जाती है।
- फैमिली हिस्ट्री के बारे में जाना जाता है, क्योंकि ये बीमारियां अनुवांशिक हो सकती हैं।
- ब्लड टेस्ट के जरिए ऑटोइम्यून बीमारियों के मार्कर्स की पहचान करते हैं।
- एक्स-रे के जरिए जोड़ों या हड्डियों का चेकअप करना
- MRI से नसों और टिश्यू के बारे में विस्तार से जानना
- CT Scan के जरिए ऑर्गन्स के अंदरूनी भागों की गहराई से जांच करना
- अल्ट्रासाउंड से सूजन और नसों के फंक्शन को देखना
ऑटोइम्यून बीमारियों का इलाज क्या है?
Dr. Bhaskar Shukla कहते हैं, "ऑटोइम्यून बीमारियों का कोई परमानेंट इलाज नहीं है, बल्कि इसके लक्षणों को दवाओं के जरिए मैनेज किया जा सकता है। ऑटोइम्यून बीमारियों को दवाओं जैसे एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स जो दर्द और सूजन कम करने में मदद करते हैं, कॉर्टिकोस्टेरॉयड, इम्यूनोसप्रेसेंट्स दी जा सकती हैं ताकि लक्षणों को सही तरीके से मैनेज किया जा सके। इसके अलावा, बायोलॉजिकल थेरेपी से भी लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। पेट की समस्याओं को कम करने के लिए प्रोबायोटिक्स दिए जा सकते हैं। रूमेटाइड आर्थराइटिस और मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी स्थितियों के लिए फिजिकल थेरेपी बहुत महत्वपूर्ण है। अगर मामला गंभीर हो जाता है, तो मरीज की सर्जरी भी की जा सकती है। जैसे रूमेटाइड आर्थराइटिस में जॉइंट रिप्लेसमेंट किया जा सकता है।”
ऑटोइम्यून डिजीज को मैनेज करने के तरीके
Autoimmune Association के अनुसार, ऑटोइम्यून डिजीज को मैनेज करना महत्वपूर्ण है।
- ऑटोइम्यून डिजीज को मैनेज करने के लिए अपने शरीर को सुनें। अगर बहुत ज्यादा थकान महसूस हो, तो आराम करें।
- जब बीमारी का पता चलता है, तो अकेलापन और निराशा महसूस होती है, ऐसे में खुद की भावनाओं को समझना बहुत जरूरी है।
- घर की बनी बैलेंस्ड डाइट लें।
- डॉक्टर से जरूर पूछें कि बीमारी में कौन सी डाइट लेनी चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए।
- ऑटोइम्यून डिजीज स्ट्रेस में ट्रिगर हो सकती है। इसलिए योग, मेडिटेशन, अपनी पसंद की एक्टिविटीज करना जरूरी है।
- रोजाना रेगुलर एक्सरसाइज करें ताकि शरीर सेहतमंद रहे।
- 7-8 घंटे की नींद जरूर पूरी करें।
डॉक्टर से कब मिलें?
Dr. Pooja Pillai कहती हैं, "जब लक्षण गंभीर हों या सुधार ही न हो रहा हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
- थकान, हल्का बुखार या दर्द हफ्तों तक बना रहे
- सांस लेने में तकलीफ होना
- सीने में तेज दर्द होना
- अचानक तेज सिरदर्द होना
- अचानक कमजोरी महसूस होना
- लगातार चक्कर आना
- दर्द इतना ज्यादा होना कि सहन ही न हो
- बिना किसी कारण वजन कम होना या शरीर के किसी हिस्से में बहुत ज्यादा सूजन होना
निष्कर्ष
ऑटोइम्यून बीमारियों का ट्रिगर लाइफस्टाइल और जेनेटिक्स से जुड़ा हो सकता है। इन बीमारियों का कोई परमानेंट इलाज नहीं है, बल्कि इनके लक्षणों को मैनेज किया जाता है। इसलिए जल्द से जल्द लक्षणों की पहचान करके डॉक्टर से इलाज कराना चाहिए। अगर समय पर इसका इलाज न कराया जाए, तो शरीर में कई तरह की जटिलताएं हो सकती हैं। डॉक्टरों का मानना है कि ऑटोइम्यून से पीड़ित मरीजों को डाइट और लाइफस्टाइल में बदलाव करने चाहिए और साथ ही डॉक्टर से रेगुलर चेकअप कराते रहना चाहिए।
FAQ
क्या ऑटोइम्यून बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकती है?
ऑटोइम्यून बीमारियां एक दूसरे को छूने, हवा के जरिए या एक साथ खाने से नहीं फैलती हैं। यह शरीर की अंदरूनी समस्याओं के कारण हो सकती है।अगर मेरे माता-पिता को कोई ऑटोइम्यून बीमारी है, तो क्या मुझे भी यह होगी?
ऑटोइम्यून बीमारियों में जेनेटिक्स की मुख्य भूमिका हो सकती है। हालांकि, यह हर मामले में जरूरी नहीं होता है। कई बार पर्यावरणीय ट्रिगर्स जैसे स्मोकिंग और हार्मोनल कारणों की वजह से भी ऑटोइम्यून बीमारी ट्रिगर हो सकती है।क्या डाइट बदलने से ऑटोइम्यून बीमारी ठीक हो सकती है?
डाइट इसे पूरी तरह ठीक नहीं कर सकती, लेकिन लक्षणों को बहुत हद तक कम कर सकती है। अगर मरीज एंटी-इंफ्लेमेटरी डाइट जैसे हल्दी, ओमेगा-3, ताजी सब्जियां खाते हैं, तो ये सूजन कम करने में मददगार होती हैं।फ्लेयर-अप (Flare-up) क्या होता है?
फ्लेयर-अप वह समय होता है जब बीमारी के लक्षण अचानक बहुत ज्यादा तेजी से बढ़ने लगते हैं। यह तनाव, इंफेक्शन, थकावट या खराब खानपान के कारण ट्रिगर हो सकता है।क्या ऑटोइम्यून बीमारी के मरीज एक्सरसाइज कर सकते हैं?
ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित मरीजों को फिजिकल एक्टिविटी करनी चाहिए, लेकिन भारी कसरत के बजाय 'लो-इम्पैक्ट' एक्सरसाइज जैसे योग, स्विमिंग या पैदल चलना ज्यादा फायदेमंद होता है। इससे जोड़ों की जकड़न कम होती है और थकान दूर होती है।
इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।
How we keep this article up to date:
We work with experts and keep a close eye on the latest in health and wellness. Whenever there is a new research or helpful information, we update our articles with accurate and useful advice.
-
Current Version
Apr 24, 2026 16:58 IST
Modified By : Aneesh Rawat Apr 24, 2026 16:58 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr. Pooja Pillai