कुदरत का करिश्‍मा : अंधे आदमी ने खुद को देखना सिखाया

47 वर्षीय डैनियल किश बचपन से ही पूरी तरह से ब्‍लांइड है, लेकिन उन्‍होंने अविश्‍वसनीय रूप से एक्टिव लाइफ को जीना बंद नहीं किया। उसने साइकिल की सवारी से लेकर पहाड़ों में अकेले लंबी पैदल यात्रा भी की, आइए इस चमत्‍कार के बारे में वि

Pooja Sinha
मेडिकल मिरेकलWritten by: Pooja SinhaPublished at: Dec 18, 2015
कुदरत का करिश्‍मा : अंधे आदमी ने खुद को देखना सिखाया

47 वर्षीय डैनियल किश बचपन से ही पूरी तरह से ब्‍लांइड है, लेकिन उन्‍होंने अविश्‍वसनीय रूप से एक्टिव लाइफ को जीना बंद नहीं किया। उसने साइकिल की सवारी से लेकर पहाड़ों में अकेले लंबी पैदल यात्रा भी की। ऐसा करने के लिए उन्‍होंने इकोलोकेशन का सहारा लिया, वैसी ही व्‍यवस्‍था जो चमगादड़ अंधेरे में देखने के लिए ध्‍वनि का उपयोग करते हैं।

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डैनियल बचपन से ही अंधे है, उसे कैंसर का एक आक्रामक प्रकार यानी इकोलोकेशन था, जो रेटिना पर हमला करता है। और 13 महीनों के अंदर ही डॉक्‍टर ने उसकी जान बचाने के लिए उसकी आंखों को निकाल दिया था। अब उसकी कृत्रिम आंखें हैं। उसने पेड़, कार या दूसरे इंसानों को कभी नहीं देखा है, लेकिन इकोलोकेशन की तकनीक का उपयोग बहुत कम उम्र में कर पूरी तरह से मार्गनिर्देशन कर सकता हैं और यहां तक कि अपने परिवेश का वर्णन विस्‍तार से करने में सक्षम है। असल में डैनियल देखने के लिए ध्वनि का उपयोग करता है। हर तरह के वातावरण और सतह की स्‍वयं की ध्‍वनिक हस्‍ताक्षर होती है और वह उनकी पहचान करने के लिए अपनी जीभ से संक्षिप्त, तेज क्लिक पैदा करता है। जो ध्‍वनि तरंगें वह बनाता है, और वह उसी दर से उसके कान में वापस आती है। इस ध्‍वनि तरंगों के माध्‍यम से वह प्रति सेकंड 1,000 फीट से तेज रफ्तार से यात्रा करता है, अपने चारों ओर से घिरी हर वस्‍तु को दूर उछाल देता है। क्‍योंकि वास्‍तव में उसे पता है क्‍या, कब और कहां स्थित है।


इकोलोकेशन का उपयोग

  • इंटरव्यू में कीश ने कहा कि मैं दो साल की उम्र या शायद उससे भी पहले इकोलोकेशन को उपयोग कर रहा हूं, लेकिन मैं वास्‍तव में इसके बारे में ज्‍यादा नहीं जानता। मुझे लगता है कि बहुत से लोगों को मुझे देखकर लगता है कि मैं कैसे देखता हूं, लेकिन कैसे के बारे में सोचकर माने हार नहीं मानी। और इन सब से जंल्‍द बाहर निकलकर मैंने अपने इकोलोकेशन के कौशल में पूर्णता हासिल की। स्‍पेनिश वैज्ञानिकों के एक दल ने कीश पर अध्‍ययन किया और पाया कि अपनी जीभ की नोक से ऊपर वाले तालु को लगाकर झटककर क्लिक की आवाज करके गूंज पैदा करता है।
  • उन्‍होंने लिखा कि कोई मशीन भी इससे अच्‍छा प्रदर्शन नहीं कर सकती है। डैनियल कहता है कि उसके द्वारा रखे दो नाम इकोलोकेशन और फ्लेशसोनार, इंसानों के लिए बेहतर तरीके से काम करते हैं। पहली हमारे सिर और कान के दोनों ओर की स्थितियां होती है। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी के बुलाने पर हम गलत तरफ मुड़े, क्‍योंकि ध्‍वनि पास वाले कान पर पहले पहुंचती है (1 सेकंड के हजारवें हिस्‍से जितना तेज) इतना समय श्रवण प्रांतस्‍था को संदेश भेजने के लिए काफी होता है। यहीं हमारी सुनने की लाजवाब क्षमता को दूसरा बड़ा कारण है। हम देख पाने से बेहतर सुन सकते हैं, यह सिद्ध भी हो चुका है कि पराबैंगनी या इंफ्रारेड लाइट का पता नहीं लगा सकते, लेकिन जबकि आप 10 ऑक्‍टावेव्‍स तक सुन सकते हैं। हम अपने पीछे की आवाजों को सुन सकते है, चारों कोनों और पूरी तरह से ध्‍वनिरहित कमरों में भी आवाज सुन सकते है। हमारे कान कभी भी आवाज सुनना बंद नहीं करते, यहां तक हमें हमारे आंतरिक अंगों तक की आवाज सुनाई देती है।
  • डेनियल कहता है कि वो वातावरण से टकराकर वापस आने वाली ध्वनि को अपने दिमाग में आस-पास की थ्री-डाइमेंशन इमेज बनाकर देखता है। बीबीसी को डेनियल ने बताया कि वो धातु और लोहे में फर्क बता पाने लायक स्थिति में तो नहीं होता है, लेकिन वह संरचनाओं की व्यवस्था के बीच का अंतर सही-सही बता सकता है। उदाहरण के लिये, लकड़ी के बाड़ की संरचना धातु की बाड़ की तुलना में मोटी होती है, और जब वातारण बेहद शांत होता है, लकड़ी एक गर्म प्रतिबिंबित छोड़ती है और लोहे की तुलना में धातु कम ध्वनी पैदा करती है। लेकिन इकोलोकेशन के एक अनुभवी उपयोगकर्ता के लिए कल्पना की भावना वास्तव में कमाल की हो सकती है, और उसे विवरण का ठीक पता लगाने में मदद करती है, जैसे कि कोई इमारत टूटी-फूटी या फिर खूबसूरत है। वह कहता है कि फ्लेशसोनार की सटीकता के लिये पर्यावरण की स्थिति ठीक होना बेहद जरूरी होता है।   


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Image Source : guim.co.uk & odditycentral.com

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