Fri Sep 11, 2026 | 06:54 PM IST

Medically Reviewed by Dr Shobha Gupta , Medical Director and IVF Consultant

PCOS में फोन-लैपटॉप पर ज्यादा Screen Time के नुकसान, डॉक्टर से जानें

अगर आपको PCOS की समस्या है और आप देर रात तक मोबाइल देखती हैं या फिर आपका स्क्रीन टाइम बहुत ज्यादा है, तो नींद और स्क्रीन टाइम आपके हार्मोनल हेल्थ को बिगाड़ सकता है। इससे PCOS की समस्या और ज्यादा बढ़ सकती है। इस लेख में डॉक्टर ने विस्तार से इसके कारणों को बताया है।

इस पेज पर:-


आजकल के भागदौड़ भरे जीवन में महिलाओं का काफी समय मोबाइल या कंप्यूटर की स्क्रीन पर बीतता है। ऐसे में जिन महिलाओं को पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) की समस्या होती है, उनके लिए ज्यादा स्क्रीन टाइम इस्तेमाल करना गंभीर साबित हो सकता है। मोबाइल और स्क्रीन टाइम का ज्यादा इस्तेमाल करते समय महिलाएं लंबे समय तक बैठी रहती हैं। जब लंबे समय तक फिजिकल एक्टिविटी नहीं होती, तो PCOS के लक्षण ज्यादा गंभीर हो जाते हैं। WHO के अनुसार, दुनियाभर में PCOS के कारण इनफर्टिलिटी की समस्या हो सकती है और इस बीमारी से महिलाओं को मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप 2 डायबिटीज होने का रिस्क रहता है। PCOS में स्क्रीन टाइम का ज्यादा इस्तेमाल करने के क्या नुकसान हो सकते हैं? जानने के लिए हमने Mumma's Blessing IVF और वृंदावन स्थित Birthing Paradise की Medical Director, गायनेकोलॉजिस्ट and IVF Specialist डॉ. शोभा गुप्ता से बात की।

PCOS में मोबाइल स्क्रीन टाइम का ज्यादा इस्तेमाल करने के नुकसान

डॉ. शोभा गुप्ता कहती हैं, “स्क्रीन टाइम की वजह से फिजिकल एक्टिविटी कम होने लगती है, जो PCOS के रिस्क को बढ़ा देती है। अगर महिलाएं ज्यादा समय तक लैपटॉप, मोबाइल और टैब पर स्क्रीन टाइम बिताती हैं, तो उनमें मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस और हार्मोनल असंतुलन का रिस्क बढ़ सकता है।”

मोबाइल से निकलने वाली ब्लू लाइट का असर

Frontiers in Microbiology स्टडी 2020 में चूहों पर की गई, जिसमें चूहों को लगातार ब्लू लाइट में रखा गया। इस स्टडी में वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि लगातार रोशनी में रखने से फीमेल चूहों पर क्या असर पड़ता है। इस स्टडी में पाया गया कि फीमेल चूहों में PCOS जैसे लक्षण देखे गए। फीमेल चूहों के ओव्यूलेशन में कमी आई और फीमेल चूहों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया है। लाइट के कारण बिगड़ा हुआ गट फ्लोरा ही PCOS और ग्लूकोज की समस्याओं का मुख्य कारण हो सकता है।

इस बारे में डॉ. शोभा गुप्ता कहती हैं, “जिन महिलाओं को PCOS की समस्या है, अगर वे रात को सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल करती हैं, तो उससे निकलने वाली ब्लू लाइट के कारण नींद पर असर पड़ता है। नींद खराब होने पर मेंटल हेल्थ पर असर पड़ सकता है और मेंटल हेल्थ के कारण हार्मोन पर असर पड़ता है। असंतुलित हार्मोन के कारण PCOS के लक्षण और ज्यादा गंभीर हो सकते हैं।”

pcos screen time in hindi by shobha gupta

यह भी पढ़ें- क्या PCOS के साथ दूसरी प्रेग्नेंसी में आती है मुश्किल? जानें डॉक्टर से

देर रात सोने से इंसुलिन रेजिस्टेंस होना

BMJ Journals ने बच्चों पर स्क्रीन टाइम और इंसुलिन रेजिस्टेंस को लेकर स्टडी की। इस स्टडी के अनुसार, जो बच्चे तीन घंटे से ज्यादा स्क्रीन के सामने बिताते हैं, उनमें इंसुलिन रेजिस्टेंस 10.5% ज्यादा पाया गया है। इस वजह से आगे चलकर डायबिटीज होने का रिस्क बढ़ सकता है। डॉ. शोभा गुप्ता कहती हैं, "अगर इस स्टडी को देखा जाए, तो PCOS से ग्रसित महिलाओं पर भी यह लागू हो सकता है। PCOS की समस्या से जूझ रही महिलाएं देर तक स्क्रीन पर समय बिताती हैं, उनमें इंसुलिन रेजिस्टेंस काफी ज्यादा बढ़ सकता है, क्योंकि PCOS में पहले से ही महिलाओं में इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या होती है। ऐसे में टाइप 2 डायबिटीज और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं। इसके अलावा PCOS के लक्षणों में भी जटिलता आ सकती है।”

पीरियड्स का अनियमित होना

Central India Journal of Medical Research की स्टडी के अनुसार, जो महिलाएं स्क्रीन पर बहुत ज्यादा समय बिताती हैं, उनके पीरियड्स में समस्या हो सकती है। दरअसल, स्क्रीन पर सारा दिन बिताने से स्ट्रेस बढ़ता है, फिजिकल एक्टिविटी कम हो जाती है और नींद पूरी न होने से हार्मोनल बैलेंस पर बुरा असर पड़ता है। इस वजह से पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं। PCOS में पहले से ही महिलाओं के पीरियड्स रेगुलर नहीं होते, ऐसे में लगातार स्क्रीन टाइम के चलते एंड्रोजन हार्मोन बढ़ने लगता है और पीरियड्स में समस्याएं आने लगती हैं।

डिजिटल एंग्जायटी से PCOS का गंभीर होना

Medicina स्टडी के अनुसार, PCOS से पीड़ित महिलाओं में डिप्रेशन और एंग्जायटी का लेवल काफी ज्यादा पाया गया है। इस स्टडी में पाया गया है कि 30 साल से ज्यादा उम्र की PCOS ग्रसित महिलाओं में मोटापे के कारण डिप्रेशन का स्तर काफी ज्यादा रहता है। PCOS बांझपन की चिंता को बढ़ा सकता है। ऐसे में जो महिलाएं अपना समय स्क्रीन पर बिताती हैं, उनमें एंग्जायटी का स्तर और ज्यादा बढ़ जाता है। इससे कई बार मोटापा तेजी से बढ़ सकता है और मेंटल हेल्थ पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए डॉक्टर खासतौर पर PCOS की समस्या से परेशान महिलाओं को स्क्रीन टाइम कम करने की सलाह देते हैं।

यह भी पढ़ें- PCOS का पता चलने में देरी क्यों होती है? जानें डॉक्टर से कारण

फिजिकल एक्टिव न होने से हार्मोन में बदलाव

जब महिलाएं लैपटॉप पर बैठकर अपना काम करती है या मोबाइल स्क्रॉल करती हैं, तो वे कई घंटों तक एक ही पोजीशन में बैठी रहती हैं। इससे महिलाओं में फिजिकल एक्टिविटी कम होती है, जो मोटापे को बढ़ाती है। मोटापा बढ़ने से हार्मोनल बदलाव होते हैं, जो महिलाओं के PCOS को और ज्यादा गंभीर कर देते हैं। इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ जाता है और महिलाओं को डायबिटीज से लेकर हाई बीपी की समस्या आने लगती है। इसलिए महिलाओं को फिजिकली एक्टिव रहने की सलाह दी जाती है। शाम के समय मोबाइल या लैपटॉप पर काम करने की बजाय वॉक करना बेहतर रहता है। इससे मेंटल स्ट्रेस भी कम होता है और हार्मोन भी स्थिर रहते हैं।

बिंज-ईटिंग के कारण मोटापा बढ़ना

The New York Academy of Sciences की स्टडी के अनुसार, जो लोग कम समय में बहुत ज्यादा खाना खा लेते हैं, उसे बिंज-ईटिंग कहते हैं। जो लोग बिंज-ईटिंग करते हैं, वे मोटापे से ग्रस्त होते हैं। उनमें वजन बढ़ने से लेकर डायबिटीज का रिस्क बढ़ सकता है। इसके अलावा, एंजाइटी और डिप्रेशन भी देखा जा सकता है। डॉ. शोभा गुप्ता कहती हैं कि ऐसे में जो महिलाएं PCOS से पीड़ित हैं और वे मोबाइल या टीवी देखते हुए बिंज-ईटिंग करती हैं, उनमें PCOS कॉम्प्लिकेशन होने का रिस्क बहुत ज्यादा बढ़ सकता है। आमतौर पर बिंज-ईटिंग में फ्राइड और पैकेज्ड फूड ही खाया जाता है, जो PCOS ग्रसित महिलाओं के लिए बहुत ज्यादा नुकसानदायक है।

PCOS से पीड़ित महिलाएं स्क्रीन टाइम कैसे कम करें?

जिन महिलाओं को PCOS की समस्या है, उन्हें स्क्रीन टाइम को कम-से-कम करना चाहिए। Cureus 2024 में प्रकाशित स्टडी में पाया गया है कि डिजिटल डिटॉक्स करना उतना मुश्किल नहीं है, जितना महसूस होता है। हालांकि, शुरुआत में कुछ चुनौतियां आती हैं, लेकिन अक्सर लोग सोशल मीडिया की जगह पर ऑफलाइन गेम्स खेलने लगते हैं। इससे लोगों के व्यवहार में काफी बदलाव देखे गए हैं। PCOS से ग्रस्त महिलाएं डिजिटल डिटॉक्स कुछ ऐसे कर सकती हैं।

  1. दिन की शुुरुआत फोन देखने की बजाय धूप में बैठकर करनी चाहिए। Sleep Foundation के अनुसार, जैसे ही सुबह होती है, तो रोशनी का प्रभाव शरीर पर बढ़ता है, जिससे दिमाग में मेलाटोनिन का प्रोडेक्शन बंद हो जाता है। इससे मूड में सुधार होता है और सेरोटोनिन हार्मोन बढ़ता है। खुशी का यह हार्मोन PCOS जैसी समस्याओं में हार्मोन को स्टेबल रखने में मदद करता है।
  2. सोने से एक से दो घंटे सभी डिजिटल डिवाइस को पूरी तरह से दूर कर देना चाहिए। इससे ब्लू लाइट के दुष्प्रभावों से भी बचा जा सकता है।
  3. मोबाइल के इस्तेमाल पर समय की पाबंदी लगाना। इससे मोबाइल पर बिना वजह सोशल मीडिया स्क्रोल करना बंद हो सकता है और खासतौर पर रात को नींद रेगुलर हो सकती है।
  4. मोबाइल देखने की बजाय टहलना, योग या कसरत करने को प्रेफरेंस देनी चाहिए।
  5. महिलाओं को अपना समय नेचर में बिताना चाहिए ताकि मेंटल हेल्थ सही रहे।
  6. ई-बुक्स की बजाय फिजिकल किताबें खरीदकर पढ़ें, इससे मोबाइल या टैब नहीं देखना पड़ेगा।
  7. खाना खाते समय मोबाइल को डिनर टेबल से दूर रखें। इससे माइंडफुल ईटिंग होगी, जो हार्मोन संतुलन के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

treatment of pcos in hindi by dr chetna

यह भी पढ़ें- PCOS क्यों होता है? जानें इसके पीछे का साइंस और डॉक्टर की राय

डॉक्टर को कब दिखाएं?

अगर महिलाएं मोबाइल या स्क्रीन पर बहुत ज्यादा समय बिताती हैं और उन्हें हार्मोनल असंतुलन, अनियमित पीरियड्स और मूड स्विंग्स की समस्या हो रही हो या फिर PCOS के ये लक्षण काफी ज्यादा गंभीर महसूस हो रहे हैं, तो महिलाओं को डॉक्टर से जरूर सलाह लेनी चाहिए।

निष्कर्ष

विभिन्न स्टडी और डॉक्टर्स की एक ही सलाह है कि PCOS से ग्रस्त महिलाओं को मोबाइल स्क्रीन और लैपटॉप पर कम समय बिताना चाहिए। अगर काम के सिलसिले में ज्यादा समय रहना पड़ता है, तो बीच-बीच में ब्रेक लें ताकि लगातार एक ही पोश्चर में न बैठे रहें। मोबाइल या स्क्रीन टाइम ज्यादा होने से PCOS से जूझ रही महिलाओं के लक्षण ज्यादा गंभीर हो सकते हैं, इसलिए डॉक्टर से सलाह लेकर डिजिटल डिटॉक्स जरूर करें।

FAQ

  • क्या पीसीओएस त्वचा को काला कर सकता है?

    PCOS में इंसुलिन का लेवल बढ़ने पर ब्लड शुगर पर असर पड़ सकता है और इससे ओवरी में टेस्टोस्टेरोन बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। इस वजह से स्किन का रंग काला पड़ सकता है।
  • अगर मेरा काम ही लैपटॉप पर 8-9 घंटे का है, तो मैं क्या करूं?

    अगर आप लैपटॉप पर काम करते हैं, तो 20-20-20 का नियम जरूर अपनाएं। इसमें हर 20 मिनट में 20 फीट दूर 20 सेकंड के लिए देखें। हर एक घंटे में 5 मिनट के लिए ब्रेक लें और काम के दौरान ब्लू लाइट चश्मा पहनें।
  • क्या डिजिटल एंग्जायटी PCOS पर असर डाल सकती है?

    सोशल मीडिया पर दूसरों की परफेक्ट लाइफ या बॉडी देखना PCOS महिलाओं में शरीर से जुड़ी दिक्कतें पैदा कर सकती है। तनाव बढ़ने से कॉर्टिसोल बढ़ता है और ये एंड्रोजन हार्मोन बढ़ने लगता है, जिससे चेहरे पर बाल और मुंहासे बढ़ सकते हैं।
  • क्या स्क्रीन टाइम कम करने से मेरे पीरियड्स रेगुलर हो सकते हैं?

    जब स्क्रीन टाइम कम होता है, तो नींद की क्वालिटी अच्छी होती है और इससे कोर्टिसोल हार्मोन कम होते हैं। बेहतर नींद शरीर में नेचुरल हार्मोन के चक्र को संतुलित करती है। इससे पीरियड्स का साइकिल रेगुलर हो सकता है। जिन महिलाओं के पीरियड्स रेगुलर नहीं हैं, उन्हें डॉक्टर से जरूर सलाह लेनी चाहिए।
  • क्या सिर्फ मोबाइल चलाने से PCOS हो सकता है?

    ऐसा नहीं होता। PCOS का सीधा संबंध मोबाइल से नहीं है, लेकिन नींद की कमी, स्क्रीन टाइम ज्यादा होना, हार्मोन असंतुलन, स्ट्रेस और फिजिकल एक्टिविटी न करना PCOS के लक्षणों को बढ़ा सकते हैं।

Read Next

PCOS में वजन बढ़ने से कैसे बचें? अपनाएं ये आसान और असरदार तरीके

Disclaimer

इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

Aneesh Rawat

Aneesh Rawat

Chief Sub Editor

अनीश रावत को हेल्थ और लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 16+ साल का अनुभव है। फिलहाल जागरण न्यू मीडिया के Onlymyhealth में चीफ सब एडिटर हैं। महिला स्वास्थ्य, बच्चों की सेहत, कैंसर, मेडिटेशन और योग पर Research based, doctor verified और SEO फ्रेंडली लेख लिखने में विशेषज्ञ हैं। न्यूज 24, ऑल इंडिया रेडियो और ThinkRight मेडिटेशन ऐप जैसे भरोसेमंद platforms पर काम कर चुकी हैं। Editorial Policy: अनीश द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

Read More..

How we keep this article up to date:

We work with experts and keep a close eye on the latest in health and wellness. Whenever there is a new research or helpful information, we update our articles with accurate and useful advice.

  • Current Version

    Apr 09, 2026 18:31 IST

    Modified By : Aneesh Rawat
  • Apr 09, 2026 18:31 IST

    Modified By : Aneesh Rawat
  • Apr 09, 2026 18:31 IST

    Published By : Aneesh Rawat
    Reviewed By : Dr Shobha Gupta

Medically reviewed content
200+ medical reviewers in network
17 Years of Trusted Health Content
Medically reviewed content
200+ medical reviewers in network
17 Years of Trusted Health Content
Medically reviewed content
200+ medical reviewers in network
17 Years of Trusted Health Content