पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर है गंभीर मानसिक रोग, जानें लक्षण और उपचार

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jun 13, 2018
Comment

Subscribe for daily wellness inspiration

Like onlymyhealth on Facebook!

Quick Bites

  • एंग्ज़ायटी डिसॉर्डर या डिप्रेशन के लक्षण पहले से मौज़ूद होते हैं
  • अगर अचानक उनके जीवन में कोई अप्रिय घटना घटित हो जाती है
  • ऐसी मनोदशा को पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर कहा जाता है

अगर अपने रोज़मर्रा के अनुभवों पर गौर करें तो आपने भी यह महसूस किया होगा कि दुर्घटना, आर्थिक नुकसान या किसी करीबी व्यक्ति के निधन जैसे बुरे अनुभवों का सामना कभी न कभी हर व्यक्ति को करना पड़ता है। चाहे कितनी ही दुखद घटना हो, आमतौर पर कुछ ही दिनों के बाद व्यक्ति अपने दैनिक क्रिया-कलाप में सक्रिय हो जाता है लेकिन पीटीएसडी यानी पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर की अवस्था में व्यक्ति महीनों तक गहरी उदासी में डूबा रहता है और उसके लिए सदमे से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। इस समस्या के कारणों एवं उपचार के बारे में बता रही हैं क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. दीपाली बत्रा।

प्रमुख लक्षण

  • दुर्घटना के दृश्य बार-बार याद आना और अकसर उसी के बारे में बातें करना
  • नींद से चौंक कर उठ जाना
  • सपने में रोना
  • दुर्घटना के अनुभवों को बार-बार ऐसे महसूस करना, जैसे अभी की ही बात हो
  • भूख, प्यास और नींद की कमी
  • व्यवहार में चिड़चिड़ापन
  • रोज़मर्रा के कार्यों से दिलचस्पी खत्म होना

मरीज़ के मन में इस बात की आशंका बनी रहती है कि कहीं दोबारा वैसी दुर्घटना न हो जाए। ऐसी नकारात्मक मनोदशा को एंटीसिपेट्री एंग्ज़ायटी कहा जाता है। ऐसे में व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को लेकर हमेशा चिंतित रहता है। अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि युद्ध या दंगों से प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले यादातर लोग इस मनोवैज्ञानिक समस्या के शिकार होते हैं।

क्या है वजह   

अकसर यह देखा गया है कि जिन लोगों में एंग्ज़ायटी डिसॉर्डर या डिप्रेशन के कुछ लक्षण पहले से मौज़ूद होते हैं, अगर अचानक उनके जीवन में कोई अप्रिय घटना घटित हो जाती है तो उनका मन बुरी तरह विचलित हो जाता है। शोध के आधार पर यह तथ्य भी समाने आया है कि मानव मस्तिष्क का खास हिस्सा हिप्पोकैंपस भावनाओं को नियंत्रित करने का काम करता है। अगर इसका आकार बहुत छोटा हो तब भी पीटीएसडी की आशंका होती है। हिंसक माहौल में पलने या बचपन में यौन दुर्व्‍यहार झेलने वाले बच्चों के साथ भी ऐसी समस्या हो सकती है।

उपचार एवं बचाव

पीटीएसडी से ग्रस्त लोगों में नींद और भूख की कमी जैसे शारीरिक लक्षण भी नज़र आते हैं। इसलिए साइकोथेरेपी के साथ उन्हें कुछ दवाएं देने की भी ज़रूरत होती है।   
सपोर्टिव टॉक थेरेपी यानी सकारात्मक बातचीत के ज़रिये मरीज़ का मनोबल बढ़ाया जाता है।  
कुछ खास रिलैक्सेशन एक्सरसाइज़ द्वारा पीडि़त व्यक्ति को मेंटल ट्रॉमा से बाहर निकालने की कोशिश की जाती है।
उपचार और काउंसलिंग के छह महीने बाद मरीज़ के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव नज़र आने लगता है।

परिवार की भूमिका

  • अगर दुर्घटना के एक महीने बाद भी कोई व्यक्ति खाना-पीना छोड़कर हमेशा अकेले उदास बैठा रहता है तो उसे काउंसलिंग के लिए किसी मनोचिकित्सक के पास ले जाएं।
  • पीडि़त व्यक्ति को अकेला न छोड़ें क्योंकि क्योंकि ऐसी स्थिति में कुछ लोगों के मन में आत्महत्या का भी खयाल आता है।
  • उसे किसी भी कार्य में व्यस्त रखने की कोशिश करें ताकि नकारात्मक चिंतन की ओर उसका ध्यान न जाए।
  • परिवार के माहौल को सकारात्मक बनाएं और अपना मन शांत रखें, इससे मरीज़ को शीघ्र स्वस्थ होने में मदद मिलेगी।

ऐसे अन्य स्टोरीज के लिए डाउनलोड करें: ओनलीमायहेल्थ ऐप

Read More Articles On Mental Health In Hindi

Loading...
Write Comment Read ReviewDisclaimer
Is it Helpful Article?YES187 Views 0 Comment
संबंधित जानकारी
  • सभी
  • लेख
  • स्लाइडशो
  • वीडियो
  • प्रश्नोत्तर