
युवा, उत्साह, नौकरी और पैसा, काल सेंटरों के नए बसे संसार को अक्सर इन्हीं चार शब्दों से परिभाषित किया जाता रहा है। लेकिन शहरी युवा की यह दुनिया क्या इतनी ही मोहक है या कहीं पेंच भी है? सरकार कॉल सेंटर कर्मियों के स्वास्थ्य के प्रति चिंतित है। डाक्टर व सेंटर प्रबंधक भी मान रहे हैं कि कुछ तो गड़बड़ है, जो युवाओं को पैसे के साथ तनाव भी मिल रहा है। काम का दबाव और तनाव आजकल हर नौकरी की शर्त बनती जा रही है, लेकिन काल सेंटर इस मर्ज से ज्यादा ग्रस्त हैं। वहां नौकरी करने वाले नौजवान भले ही पैसे के मामले में सुकून महसूस करते हों, लेकिन उन्हें बहुत कम उम्र में बड़ी उम्र वाली बीमारियां होने लगी हैं। यहां की खुशनुमा तस्वीर का दूसरा पक्ष बदरंग है।
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'इंटरनेशनल रिलेशन' संस्था के सर्वे में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। सर्वे के अनुसार कॉल सेंटर में काम करने वाले लड़के-लड़कियां तनाव और डिप्रेशन के आसान शिकार हैं। काल सेंटर के 36 प्रतिशत युवा 'एक्यूट डिजीज' ग्रस्त हैं। ये बीमारियां नींद पूरी न होने से होती हैं। इससे एसिडिटी, पाचन शक्ति कमजोर होना एवं चिड़चिड़ापन आता है। 27 प्रतिशत से अधिक लड़के-लड़कियां 'लाइफ स्टाइल डिजीज' से ग्रस्त हैं। यह बीमारी दिनचर्या में फेरबदल से आती है। ये लोग रात भर काम कर दिन में सोते हैं। तीन प्रतिशत युवाओं को क्रोनिक इंफेक्शन है। 12 प्रतिशत नौजवानों को अन्य बीमारियों ने घेर रखा है। अध्ययन के अनुसार महज 21 प्रतिशत लड़के-लड़कियां ऐसे हैं, जिन्हें कोई बीमारी नहीं।

तनाव की वजह
पार्थ नोवा हास्पिटल के वरिष्ठ चिकित्सक डा. मनोज शर्मा के अनुसार काल सेंटर में काम करने वाले ज्यादातर लड़के-लड़कियों की दिनचर्या शाम करीब पांच बजे से शुरू होकर सुबह सात बजे तक चलती है। जब काम का दबाव बढ़ता है तो कर्मी तनाव, अनिद्रा, बेचैनी, सिरदर्द, डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन एवं बैक पेन के शिकार हो जाते हैं।
समाधान
विशेषज्ञों के अनुसार समाधान तो युवाओं को ही तलाशना होगा। काम के बाद उन्हें एक निश्चित अवधि तक रोज आराम करना चाहिए। शक्तिवर्धक प्रोटीन युक्त भोजन, जिसमें मौसमी फलों के साथ सब्जियों की प्रचुरता हो, लेना चाहिए। नियमित अंतराल के बाद कुछ समय की छुट्टी भी युवाओं में ताजगी वापस लाने में सहायक होगी। जहां तक काल सेंटरों का सवाल है, तो उन्हें अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य के प्रति अधिक जिम्मेदार होना होगा।
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