Thu Sep 17, 2026 | 09:36 PM IST

अस्थमा

अस्थमा फेफड़ों की क्रोनिक बीमारी है, जो बच्चों और वयस्कों दोनों को प्रभावित कर सकती है। फेफड़ों की सांस लेने वाली छोटी नलियों में सूजन या उनके सिकुड़ने के कारण अस्थमा की समस्या होती है। अगर किसी को सीढ़ियां चढ़ते ही सांस फूलना, रात में बार-बार खांसी आना या सांस लेते समय सीने से सीटी जैसी आवाज आना जैसी समस्याएं होती हैं, खासतौर पर रात में, सुबह के समय, एक्ससाइज के दौरान या धूल-धुएं के संपर्क में आने के बाद, तो इसका कारण अस्थमा हो सकता है। अस्थमा की पूरी जानकारी के लिए हमने Dr. Deepak Prajapat, Senior Consultant, Pulmonology, Critical Care, and Sleep Medicine, Metro Group of Hospitals, Noida से बात की।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, साल 2023 में 36.3 करोड़ लोग अस्थमा से प्रभावित थे और इसके कारण चार लाख 42 हजार मौतें हुई थीं।

अस्थमा क्या है?

Dr. Deepak Prajapat कहते हैं, “अस्थमा में सांस की नलियां सिकुड़ने लगती हैं, सूजन आने लगती है और बहुत ज्यादा बलगम भी बनने लगता है। इसके कारण सांस लेना मुश्किल हो जाता है और जब खांसी उठती है, तो सांस फूलने की समस्या हो सकती है। कुछ लोग इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन कई बार यह बीमारी रोजाना के कामों को बाधित कर सकती है। कई बार मरीज को सांस लेने में इतनी ज्यादा तकलीफ हो जाती है कि अस्थमा अटैक का कारण बन सकती है।”

अस्थमा के लक्षण

WHO के मुताबिक, अस्थमा के लक्षण अलग-अलग मरीजों में अलग हो सकते हैं। ये लक्षण रात के समय या एक्सरसाइज करते समय ज्यादा गंभीर हो सकते हैं।

  • मरीज को रात के समय या सुबह उठते ही सूखी या बलगम वाली खांसी होना।
  • सांस लेते या छोड़ते समय सीटी जैसी आवाज आना।
  • कभी-कभी सांस लेते समय घरघराहट जैसी आवाज आना।
  • सांस लेने में तकलीफ होना।
  • आराम करते समय सांस फूलना।
  • छाती में भारीपन, दबाव या खिंचाव महसूस होना।
  • अगर व्यक्ति को गहरी सांस लेते समय मुश्किल हो, तो ये अस्थमा के लक्षण हो सकते हैं।

Dr. Deepak Prajapat का कहना, “इन सभी लक्षणों के ट्रिगर होने का कारण धूल-मिट्टी, धुआं, गैस, घास, पेड़ों के परागकण, पालतू जानवरों के बाल और पंख, तेज गंध वाले साबुन, परफ्यूम, पेंट और इत्र हो सकता है। इसलिए अगर बार-बार ये लक्षण दिखाई दे रहे हों, तो डॉक्टर को जरूर दिखाना चाहिए। सबसे जरूरी है कि हर दिन के लक्षण एक जैसे नहीं रहते। किसी दिन व्यक्ति को बिल्कुल ठीक महसूस हो सकता है, तो वहीं किसी दिन ट्रिगर के कारण सांस लेने में परेशानी शुरू हो सकती है।”

अस्थमा होने के कारण

National Heart, Lung, and Blood Institute (NHLBI) के मुताबिक, अस्थमा होने के सटीक कारण नहीं पता, लेकिन आमतौर पर अस्थमा बचपन में ही शुरू हो सकता है, जब शरीर का इम्यून सिस्टम बन रहा होता है। हालांकि, कुछ लोगों में इसके लक्षण वयस्क होने के बाद दिखाई दे सकते हैं। अस्थमा होने के कई कारण हो सकते हैं।

  • पर्यावरण से होने वाली एलर्जी
  • वायरल इंफेक्शन
  • फैमिली हिस्ट्री, खासतौर पर मां को अस्थमा होना
  • ज्यादा वजन या मोटापे के कारण अस्थमा का रिस्क ज्यादा होना
  • बचपन में लड़कियों के मुकाबले लड़कों को अस्थमा का रिस्क ज्यादा होना
  • वर्कप्लेस पर केमिकल्स,धूल या धुएं के संपर्क में आना
  • वायु प्रदूषण और मौसम में बदलाव होना

अस्थमा कितने तरह का होता है?

Dr. Deepak Prajapat कहते हैं कि अस्थमा कई तरह का हो सकता है।

  • एलर्जिक अस्थमा - इसमें धूल-मिट्टी, परागकण, पालतू जानवरों के बाल या दूसरे एलर्जिक चीजों के संपर्क में आने के बाद लक्षण बढ़ सकते हैं।
  • नॉन-एलर्जिक अस्थमा - इसमें लक्षण किसी खास एलर्जी से नहीं होते, बल्कि स्मोक, वायु प्रदूषण, इंफेक्शन या दूसरे ट्रिगर्स इसके कारण बन सकते हैं।
  • एक्सरसाइज से जुड़ा अस्थमा - कुछ लोगों को एक्सरसाइज के दौरान या उसके बाद खांसी, घरघराहट या सांस फूलने की समस्या बढ़ सकती है।
  • वर्कप्लेस अस्थमा - काम की जगह पर धूल, केमिकल्स या धुएं के लगातार संपर्क में आने से अस्थमा होने का रिस्क हो सकता है। वहीं जिन लोगों को पहले से अस्थमा है, उनमें इसके लक्षण गंभीर हो सकते हैं।
  • बच्चों में अस्थमा - बच्चों में बार-बार घरघराहट, खांसी या खेलते समय सांस फूलने जैसी समस्याएं अस्थमा से जुड़ी हो सकती हैं। हालांकि, बच्चों में सांस लेते समय घरघराहट को अस्थमा मान लेना सही नहीं है, इसलिए सही तरीके से चेकअप कराना जरूरी है।
  • एडल्ट-ऑनसेट अस्थमा - कुछ लोग सोचते हैं कि अस्थमा की शुरुआत बचपन से ही होती है। हालांकि, हर मामले में यह जरूरी नहीं है। कुछ लोगों में वयस्क होने के बाद इसके लक्षण सामने आ सकते हैं। इसे एडल्ट-ऑनसेट अस्थमा कहा जाता है।

बच्चों में अस्थमा की समस्या

Dr. Deepak Prajapat कहते हैं कि बच्चों में अस्थमा पहचानना कभी-कभी आसान नहीं होता, क्योंकि बच्चे लक्षणों को स्पष्ट तरीके से बता नहीं पाते। इसलिए अगर बच्चे में ये लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से जांच जरूर कराएं। इसे जुकाम या खांसी के लक्षण समझकर इग्नोर न करें।

  • बार-बार रात में खांसी होना
  • खेलते समय जल्दी थकना
  • दौड़ने के बाद सांस फूलना
  • सांस लेते समय सीटी की आवाज आना
  • बार-बार छाती से घरघराहट की आवाज आना
  • जुकाम होने के बाद लंबे समय तक खांसी रहना

प्रेग्नेंसी में अस्थमा होने पर दिक्कत

American Lung Association के मुताबिक, प्रेग्नेंसी के दौरान अस्थमा से पीड़ित महिलाओं में दवाओं का शिशु पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता बनी रहती है। अगर प्रेग्नेंसी में अस्थमा अनियंत्रित हो जाए, तो मां और शिशु दोनों के लिए खतरा बन सकता है।

  • समय से पहले जन्म होना
  • जन्म के समय वजन कम होना
  • शिशु को सांस लेने में तकलीफ होना
  • सेरेब्रल पाल्सी
  • मां को प्री-एक्लेम्पसिया का खतरा या सिजेरियन डिलीवरी होने की संभावना बढ़ना

अस्थमा अटैक कब हो सकता है?

Dr. Deepak Prajapat ने कहा, “जब अस्थमा के लक्षण बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं, तो इसे अस्थमा अटैक कहते हैं। इस दौरान सांस फूलना, लगातार खांसी, सीने में जकड़न और घरघराहट बढ़ सकती है। कुछ लोगों में लक्षण इतने ज्यादा बढ़ जाते हैं कि डॉक्टर की तुरंत जरूरत पड़ सकती है।”

  • अस्थमा अटैक होने पर इन बातों का ध्यान रखें।
  • सबसे पहले मरीज को शांत रखें और उसे उस ट्रिगर से दूर करें, जिससे लक्षण गंभीर हुए हैं।
  • अगर डॉक्टर ने पहले से अस्थमा अटैक से जुड़ी दवाएं दी हैं, तो उसी के अनुसार दवा दें।
  • अगर सांस की परेशानी तेजी से बढ़ रही है, बोलने में दिक्कत हो और दवाओं से राहत न मिल रही हो, तो तुरंत डॉक्टर के पास लेकर जाएं।

अस्थमा की जांच कैसे होती है?

Dr. Deepak Prajapat ने कहा कि अस्थमा की जांच सिर्फ लक्षणों के आधार पर नहीं की जा सकती। डॉक्टर पहले मरीज की मेडिकल हिस्ट्री और लक्षणों की जानकारी लेते हैं। इसके बाद जरूरत पड़ने पर लक्षणों के आधार पर लंग फंक्शन टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं।

  • स्पिरोमेट्री - यह एक पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट है, जिसमें पता चलता है कि व्यक्ति कितनी मात्रा में हवा अंदर लेता है और कितनी तेजी से हवा बाहर निकालता है। यह फेफड़ों की कार्यक्षमता मापने के काम आता है।
  • ब्रोन्कोडाइलेटर रिस्पांस टेस्ट (Bronchodilator Response Test) - ब्रोंकोडाइलेटर एक प्रकार की दवा है जो सांस की नलियों के आस-पास की मांसपेशियों को आराम देने में मदद करती है। ऐसे में इस टेस्ट के जरिए इनहेल्ड ब्रोंकोडाइलेटर देने से पहले और बाद में लंग फंक्शन की तुलना की जाती है। इससे एयरफ्लो में बदलाव का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
  • पीक एक्सपिरेटरी फ्लो (Peak Expiratory Flow) - जिन मामलों में स्पिरोमेट्री उपलब्ध न हो, तो PEF किया जा सकता है। यह फेफड़ों से पूरी ताकत के साथ हवा बाहर छोड़ने की अधिकतम गति को मापने का एक सरल तरीका है।
  • FeNO - कुछ मामलों में Fractional Exhaled Nitric Oxide यानी FeNO या Blood Eosinophils जैसे टेस्ट के जरिए अस्थमा की जांच करने में मदद मिल सकती है।

Asthma का इलाज कैसे होता है?

WHO के अनुसार, अस्थमा को पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसे दवाओं और देखभाल के जरिए बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सकता है। इसके इलाज में इनहेलर का इस्तेमाल करके दवा को फेफड़ों तक पहुंचाया जा सकता है।

इनहेलर के प्रकार

कार्य और लाभ

ब्रोंकोडायलेटर्स रिलीवर 

ये सांस की नलियों को तुरंत खोलता है और सांस फूलने जैसे लक्षणों से तुरंत राहत देता है। 

स्टेरॉयड इनहेलर्स 

ये सांस की नलियों में सूजन को कम करते हैं, जिससे गंभीर अस्थमा अटैक के रिस्क को रोका जा सकता है।

कॉम्बिनेशन इनहेलर्स

इनमें ब्रोंकोडायलेटर और स्टेरॉयड दोनों दवाएं एक साथ मौजूद होती हैं।

अस्थमा के इलाज में इनहेलर कैसे काम करता है?

Dr. Deepak Prajapat ने कहा, “इनहेलर के जरिए दवा सीधे फेफड़ों में पहुंच जाती है, लेकिन कई लोग इसे लेते समय गलतियां करते हैं। इसलिए इनहेलर इस्तेमाल करने की तकनीक समझना भी जरूरी है। इनहेलर के साथ हमेशा स्पेसर का इस्तेमाल करने से दवा बेहतर तरीके से फेफड़ों तक पहुंच सकती है। यह दवा को अपने अंदर रोककर रखता है, जिससे सांस के साथ दवा खींचना काफी आसान होता है।"

इनहेलर इस्तेमाल करने का तरीका

  • इनहेलर का कैप हटाकर माउथपीस को साफ और सही पोजीशन में रखें।
  • स्पेसर के इनहेलर वाले सिरे में सही तरीके से फिट करें।
  • इनहेलर और स्पेसर को 10 सेकेंड तक अच्छे तरीके से हिलाएं।
  • सिर को सीधा रखें और पहले पूरी सांस को बाहर छोड़ दें।
  • स्पेसर के माउथपीस को अपने मुंह में रखें और होठों से अच्छी तरह सील लें।
  • इनहेलर को एक बार दबाएं।
  • तुरंत एक लंबी और गहरी सांस लें। सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज नहीं आनी चाहिए।

क्या इनहेलर की आदत पड़ जाती है?

Dr. Deepak Prajapat कहते हैं, “आमतौर पर अस्थमा के मरीज शिकायत करते हैं कि इनहेलर लेने की आदत पड़ सकती है, लेकिन यह एक मिथक है। इनहेलर अस्थमा को कंट्रोल करने के लिए दिया जाने वाला मेडिसिन डिलीवरी डिवाइस है। इसे लेने से कोई लत नहीं लगती, लेकिन इनलेहर कौन सा लेना है और कितनी बार लेना है, यह बिना डॉक्टर की सलाह के तय न करें। कई लोग लक्षण कम होते ही इनहेलर लेना खुद ही बंद कर देते हैं, लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए।”

अस्थमा से बचने के उपाय

NHLBI के अनुसार, अस्थमा को मैनेज करने के लिए लोगों को कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए।

  • दवाओं को समय पर लें।
  • डॉक्टर की सलाह पर पीक फ्लो मीटर से अपने फेफड़ों के एयर-फ्लो को नियमित रूप से ट्रैक करें।
  • धूल-मिट्टी और फफूदी को घर में जमा न होने दें।
  • पालतू जानवरों के बालों से एलर्जी होने पर उन्हें सोने के कमरे से बाहर रखें।
  • जब बाहर की हवा प्रदूषित हो, तो खिड़कियां बंद रखें और बाहर हैवी वर्कआउट करने से बचें।
  • सिगरेट के धुएं, ई-सिगरेट और पैसिव स्मोकिंग से पूरी तरह बचें।
  • रसोई और हीटिंग उपकरणों का वेंटिलेशन सही रखें ताकि घर में धुआं न फैले।
  • नियमित रूप से हाथ धोएं।
  • वजन कंट्रोल करें ताकि सांस लेने में आसानी हो।
  • डाइट में ताजे फल और सब्जियां लें।
  • डॉक्टर की सलाह पर वर्कआउट करें।
  • मेडिटेशन या योग अस्थमा रोगियों को मैनेज करने में मदद कर सकते हैं।
  • बिना डॉक्टर की सलाह के किसी भी तरह की दवा न लें।

डॉक्टर से कब मिलें?

Dr. Deepak Prajapat ने कहा कि अस्थमा के मरीज को ये लक्षण दिखने पर डॉक्टर से तुरंत मिलें। कई बार हॉस्टिपल में भर्ती कराने की जरूरत तक पड़ सकती है।

  • अगर सांस लेने में बहुत ज्यादा परेशानी हो रही हो।
  • व्यक्ति ठीक से बोल नहीं पा रहा हो।
  • लक्षण तेजी से बिगड़ रहे हो।
  • बहुत ज्यादा कमजोरी या कंफ्यूजन हो रहा हो।
  • डॉक्टर के बताए रिलीवर से राहत नहीं मिल रही हो।

निष्कर्ष
Dr. Deepak Prajapat का कहना है कि हर व्यक्ति में अस्थमा को पूरी तरह से रोकना संभव नहीं है, क्योंकि इसके साथ जेनेटिक, एलर्जी और पर्यावरण से जुड़े फैक्टर्स जुड़े हो सकते हैं। कई बार लोगों को ट्रिगर्स की समझ आ जाती है, तो वे उनसे बच सकते हैं। सबसे जरूरी बीमारी का सही समय पर डायग्नोज होना है। इसलिए बार-बार खांसी, घरघराहट, सीने में जकड़न या सांस फूलने को सिर्फ मौसम या कमजोरी मानकर लंबे समय तक टालना ठीक नहीं है। जरूरत पड़ने पर लंग फंक्शन टेस्ट कराएं और सही इलाज के जरिए अस्थमा मैनेज करें।

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