प्रेग्नेंसी के आखिरी महीनों में प्रेग्नेंट महिलाओं के मन में कई तरह के सवाल रहते हैं कि बच्चे का जन्म कब होगा और लेबर पेन में कितना दर्द होगा या डिलीवरी में कितना समय लगेगा? ऐसे में महिलाओं को लगता है कि बच्चे का जन्म नॉर्मल डिलीवरी से होगा या सिजेरियन से? उनका अक्सर डॉक्टर से डिलीवरी को लेकर सवाल रहता है। इसलिए हमने Dr. Neha Khandelwal, Obstetrician and Gynaecologist, Cloudnine Group of Hospitals, Delhi से बात की। उन्होंने बताया कि घरों में कोई नॉर्मल डिलीवरी को बेहतर मानता है, तो कोई सर्जरी को ठीक कहता है। ऐसे में पहली बार मां बनने वाली महिलाएं अक्सर उलझन में पड़ जाती हैं। दरअसल, महिलाओं के लिए दोनों ही तरीके सही हैं, लेकिन किस महिला के लिए कौन-सा तरीका सुरक्षित रहेगा, यह उसकी सेहत, गर्भ में बच्चे की स्थिति और प्रसव के दौरान होने वाले बदलावों पर निर्भर करता है। इसलिए किसी एक तरीके को बेहतर या खराब मानना सही नहीं है।
नॉर्मल और सिजेरियन डिलीवरी में क्या फर्क है?
Dr. Neha Khandelwal ने दोनों सर्जरी के अंतर को कुछ ऐसे समझाया है।
नॉर्मल डिलीवरी |
सिजेरियन डिलीवरी |
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प्रक्रिया |
बच्चा योनि मार्ग से प्राकृतिक रूप से जन्म लेता है। |
पेट और गर्भाशय में सर्जिकल चीरा लगाकर बच्चे को बाहर निकाला जाता है। |
रिकवरी का समय |
रिकवरी आमतौर पर तेज होती है। |
सर्जरी होने के कारण पूरी तरह ठीक होने में 4 से 6 हफ्ते लग सकते हैं। |
अस्पताल में रुकने का समय |
आमतौर पर 24 से 48 घंटे |
आमतौर पर 3 से 4 दिन |
रिस्क |
योनि या पेरिनियम में खिंचाव या कट और टांकों की जरूरत पड़ सकती है। |
सर्जिकल घाव में इंफेक्शन, बहुत ज्यादा ब्लीडिंग और एनेस्थीसिया से जुड़े रिस्क हो सकते हैं। |
शुरुआत |
प्रसव पीड़ा प्राकृतिक रूप से या दवाओं से शुरु हो सकती है। |
पहले से प्लान या इमरजेंसी में तुरंत की जा सकती है। |
नॉर्मल डिलीवरी क्या होती है?
Dr. Neha Khandelwal ने बताया कि नॉर्मल डिलीवरी को मेडिकल भाषा में वजाइनल डिलीवरी (Vaginal Delivery) कहा जाता है। इसमें बच्चा मां की योनि के रास्ते जन्म लेता है। नॉर्मल डिलीवरी के दौरान गर्भाशय में संकुचन शुरू होने लगते हैं और इस संकुचनों की वजह से सर्विक्स धीरे-धीरे खुलने लगता है और फिर शिशु सर्विक्स की नली के जरिए बाहर आ जाता है। आमतौर पर लेबर पेन अपने-आप शुरू हो जाते हैं। वहीं, कुछ कंडीशन में डॉक्टर दवाओं के जरिए पेन शुरू कर सकते हैं।
वजाइनल डिलीवरी का प्रोसेस कैसे होता है?
Cleveland Clinic के अनुसार, नॉर्मल डिलीवरी को तीन स्टेज में बांटा जा सकता है।
- शुरुआत में गर्भाशय के संकुचन होते हैं और यह तब तक होते हैं , जब तक सर्विक्स पूरी तरह से 10 सेमी खुल जाता है। इसमें करीब 12 से 19 घंटे तक का समय लग सकता है।
- दूसरे स्टेज में सर्विक्स के 10 सेमी खुलने के बाद शुरू होता है। इसमें संकुचन बहुत तेज होने लगते हैं और महिला नीचे की ओर जोर लगाना शुरू करती है। इसके बाद शिशु योनि मार्ग से बाहर आता है। इस स्टेज में 4 घंटे तक का समय लग सकता है।
- तीसरे स्टेज में शिशु प्लेसेंटा योनि मार्ग से बाहर निकल जाता है। इसमें करीब 30 मिनट तक का समय लग सकता है।
नॉर्मल डिलीवरी के बाद रिकवरी कैसी होती है?
Dr. Neha Khandelwal ने कहा, “सामान्य तौर पर बिना किसी जटिलता वाली वजाइनल डिलीवरी में रिकवरी तेजी से होती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि नॉर्मल डिलीवरी में कोई परेशानी नहीं होती। कुछ महिलाओं को योनि और उसके आसपास के हिस्से में दर्द, सूजन या टांकों की जरूरत पड़ सकती है। कभी-कभी डिलीवरी लंबी भी चल सकती है या ज्यादा ब्लीडिंग हो सकती है। इसलिए नॉर्मल डिलीवरी पूरी तरह रिस्क-फ्री नहीं होती है।”
normal delievery or C section
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सिजेरियन डिलीवरी क्या होती है?
Dr. Neha Khandelwal के मुताबिक, सिजेरियन डिलीवरी या सी-सेक्शन में डॉक्टर महिला के पेट और गर्भाशय में चीरा लगाकर बच्चे को बाहर निकालते हैं। कुछ मामलों में सिजेरियन की जरूरत प्रेग्नेंसी के दौरान ही पता चल जाती है। ऐसे में डॉक्टर पहले से डिलीवरी की प्लान बना सकते हैं। वहीं, कई बार लेबर पेन शुरू होने के बाद ऐसी स्थिति बन जाती है, जिसमें मां या बच्चे को बचाने के लिए सिजेरियन करना पड़ सकता है।
सिजेरियन डिलीवरी का क्या प्रोसेस है?
Cleveland Clinic के मुताबिक, सामान्य सर्जरी को 45 से 1.5 घंटे का समय लग सकता है, लेकिन अगर इमरजेंसी होती है, तो शिशु को 10 से 15 मिनट के भीतर बाहर निकाल लिया जाता है। आमतौर पर सी-सेक्शन में ये स्टेज होते हैं।
- सबसे पहले महिला को एपिड्यूरल या स्पाइनल एनेस्थीसिया दिया जाता है, जिससे केवल कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न होता है। इसमें महिला होश में रहती है।
- फिर पेट के हिस्से को एंटीसेप्टिक घोल से साफ किया जाता है।
- इसके बाद पेट की दीवार में चीरा लगाया जाता है।
- इसके बाद गर्भाशय में करीब 3-4 इंच का चीरा लगाया जाता है।
- डॉक्टर इससे बाहर निकालते हैं और इसके बाद गर्भनाल काटी जाती है।
- फिर प्लेसेंटा को निकालकर टांके लगा दिए जाते हैं।
सिजेरियन डिलीवरी के बाद रिकवरी कैसे होती है?
Dr. Neha Khandelwal ने कहा, “सर्जरी के बाद पेट में दर्द, घाव को ठीक होने में ज्यादा समय लग सकता है। इसके साथ इंफेक्शन, ब्लीडिंग और गर्भाशय के निशान से जुड़े रिस्क भी हो सकते हैं। हालांकि, जब मेडिकल जरूरत हो, तो सिजेरियन डिलीवरी मां और बच्चे के लिए सबसे बेहतर हो सकती है।”
सिजेरियन डिलीवरी की सलाह किन 5 स्थितियों में दी जा सकती है?
Dr. Neha Khandelwal का कहना है कि कुछ कंडीशन में वजाइनल डिलीवरी करना सुरक्षित नहीं माना जाता। ऐसे में कुछ मामलों में महिला को सर्जरी कराने की सलाह दी जा सकती है। हैं।
- डिलीवरी के समय शिशु का सिर नीचे की तरफ होना चाहिए, लेकिन कुछ बच्चों की पोजीशन अलग होती है। जैसे शिशु के सिर की जगह पैर नीचे हो सकते हैं। ऐसे में वजाइनल डिलीवरी करना मुश्किल हो सकता है।
- कभी-कभी महिला को रेगुलर संकुचन हो रहे होते हैं, लेकिन सर्विक्स नहीं खुलता। ऐसे में शिशु आगे ही नहीं खिसक पाता। ऐसे मामलों में प्रसव रुक सकता है, तो डॉक्टर सिजेरियन की सलाह दे सकते हैं।
- डिलीवरी के दौरान डॉक्टर शिशु की हार्ट बीट पर लगातार नजर रखते हैं। अगर शिशु की धड़कन में बदलाव नजर आते हैं, तो जल्दी जन्म कराना जरूरी हो जाता है। ऐसे केस में सिजेरियन की जरूरत पड़ सकती है।
- प्रेग्नेंसी के दौरान प्लेसेंटा शिशु तक ऑक्सीजन और न्यूट्रिशन पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कुछ महिलाओं में प्लेसेंटा गर्भाशय के निचले हिस्से में होता है और सर्विक्स को ढक सकता है। इस स्थिति को प्लेसेंटा प्रीविया कहते हैं। अगर प्लेसेंटा सर्विक्स को पूरी तरह से ढक दे, तो गंभीर ब्लीडिंग होने का रिस्क बढ़ सकता है।
- अगर किसी महिला का पहले सिजेरियन हुआ है या गर्भाशय की कुछ सर्जरी हुई है, तो अगली डिलीवरी का प्लान करते हुए सावधानी बरतनी पड़ सकती है। हालांकि, ऐसे मामलों में भी सिजेरियन के बाद भी वजाइनल डिलीवरी हो सकती है। VBAC कहा जाता है।
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क्या नॉर्मल डिलीवरी और सिजेरियन में से कोई एक तरीका पहले से चुन सकते हैं?
Dr. Neha Khandelwal का कहना है, “कई बार प्रेग्नेंसी के दौरान जांच से यह अंदाजा लग सकता है कि डिलीवरी किस तरीके से होगी, लेकिन जब लेबर पेन शुरू होता है, तो कई बार कंडीशन बदल जाती है। ऐसे मामलों में आमतौर पर डॉक्टर महिलाओं को लेबर के दौरान होने वाली परेशानियों के बारे में बताते हैं। मैं महिलाओं को सलाह दूंगी कि सिर्फ नॉर्मल डिलीवरी में दर्द के डर से या फिर किसी के कहने पर सिजेरियन नहीं किया जा सकता है। प्रेग्नेंट महिलाओं को दोनों ही तरीकों के बारे में डॉक्टर से समझना चाहिए और जो उनके लिए बेहतर है, वह फैसला लेना चाहिए।”
निष्कर्ष
डिलीवरी के दौरान नॉर्मल या सर्जरी करना, यह कई बार लेबर के दौरान ही पता चलता है। महिलाओं का शरीर कैसे रिएक्ट कर रहा है, शिशु की मेडिकल कंडीशन क्या है और महिला की उम्र व मेडिकल हिस्ट्री को देखते हुए नॉर्मल डिलीवरी या सिजेरियन का फैसला लिया जाता है।
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FAQ
क्या सिजेरियन डिलीवरी से जन्मे बच्चों में सांस से जुड़ी समस्याएं अधिक होती हैं?
नॉर्मल डिलीवरी के दौरान जब बच्चा बर्थ कैनाल से गुजरता है, तो दबाव के कारण उसके फेफड़ों में भरा एमनियोटिक तरल प्राकृतिक रूप से बाहर निकल जाता है। सी-सेक्शन में यह दबाव न मिलने से शिशु में ट्रांजिएंट टैकिप्निया यानी जन्म के तुरंत बाद तेजी से सांस लेने की समस्या का रिस्क थोड़ा बढ़ सकता है।नॉर्मल डिलीवरी में दिया जाने वाला एपिसीओटॉमी यानी कट या चीरा क्या होता है और यह क्यों जरूरी है?
एपिसीओटॉमी योनि के मुहाने और गुदा के बीच की त्वचा पर लगाया जाने वाला एक छोटा सर्जिकल कट है। यह बच्चे का सिर बड़ा होने या गंभीर रूप से फंसने पर दिया जाता है, ताकि त्वचा अनियंत्रित रूप से न फटे। इसके टांके घुलने वाले होते हैं और आमतौर पर 2 से 3 हफ्तों में ठीक हो जाते हैं।
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Oct 27, 2026 17:06 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Neha Khandelwal
