IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) उन महिलाओं के लिए फायदेमंद होता है, जो प्राकृतिक तरीके से प्रेग्नेंट नहीं हो पाती। आमतौर पर लोग IVF के प्रोसेस को समझने में यह भूल करते हैं कि पूरी प्रेग्नेंसी ही IVF है, जबकि IVF के जरिए सिर्फ एम्ब्रियो को महिला के यूटरस में ट्रांसफर किया जाता है। इसके बाद महिला की प्रेग्नेंसी सामान्य प्रेग्नेंसी की तरह ही होती है। IVF को लेकर ऐसे मिथकों के चलते कपल्स के मन में यह सवाल भी अक्सर आता है कि क्या IVF प्रेग्नेंसी में मिसकैरेज यानी गर्भपात का खतरा ज्यादा होता है? इस बारे में जानने के लिए हमने Dr. Hrishikesh Pai, Consultant Gynaecologist & IVF Specialist, Lilavati Hospital Mumbai and Fortis Hospitals Delhi & Chandigarh से बात की। उन्होंने बताया कि IVF के जरिए हुई प्रेग्नेंसी में थोड़ा रिस्क होता है, लेकिन खुद IVF तकनीक मिसकैरेज का कारण नहीं बनती। गर्भपात होने के कई दूसरे कारण हो सकते हैं।
क्या IVF में गर्भपात का खतरा ज्यादा होता है?
Dr. Hrishikesh Pai कहते हैं, “अगर महिला की उम्र कम है, भ्रूण स्वस्थ है और कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या नहीं है, तो IVF से हुई प्रेग्नेंसी में मिसकैरेज का खतरा नेचुरल प्रेग्नेंसी के बराबर हो सकता है। दरअसल, IVF कराने वाले कई कपल्स पहले से ही ऐसी समस्याओं से जूझ रहे होते हैं, जो उनकी प्रेग्नेंसी को मुश्किल बनाती हैं। इसमें बढ़ती उम्र, PMOS, एंडोमेट्रियोसिस, बार-बार मिसकैरेज की हिस्ट्री या अन्य समस्याएं शामिल हो सकती हैं। इस कारण IVF से हुई प्रेग्नेंसी के कुछ मामलों में गर्भपात का रिस्क ज्यादा दिखाई देता है। गर्भपात होने का कारण महिला की कंडीशन हो सकती है, लेकिन इसका IVF प्रोसेस से कोई कनेक्शन नहीं होता।”
मिसकैरेज होने का रिस्क किन कारणों से बढ़ता है?
IVF के बाद शुरुआती गर्भपात से जुड़े कारणों के की पहचान करने के लिए Peking University People’s Hospital ने 2017 और 2018 के बीच 2591 क्लिनिकल प्रेग्नेंसी साइकिल के सैंपल लिए थे। इस रिसर्च पेपर को Gynecology and Obstetrics Clinical Medicine में प्रकाशित हुआ था। इस रिसर्च में बताया गया कि जिन महिलाओं की उम्र 35 साल से कम थी, उनमें शुरुआती गर्भपात का रिस्क 1.35 गुना ज्यादा था और 40 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं में 35 साल से कम उम्र की महिलाओं के मुकाबले गर्भपात का खतरा 3.88 गुना ज्यादा था। इसके अलावा, जिन महिलाओं में फ्रेश एम्ब्रियो ट्रांसफर किया गया उसकी तुलना में फ्रोजन भ्रूण ट्रांसफर में शुरुआती गर्भपात का रिस्क 1.48 गुना अधिक देखा गया।
Dr. Hrishikesh Pai के अनुसार, IVF के जरिए प्रेग्नेंट महिलाओं में मिसकैरेज होने के ये कारण हो सकते हैं।

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बढ़ती उम्र
महिला की उम्र IVF की सफलता और प्रेग्नेंसी दोनों में अहम होती है। 35 साल के बाद एग्स की क्वालिटी धीरे-धीरे कम होने लगती है। इससे भ्रूण में क्रोमोसम से जुड़ी समस्याएं होने का रिस्क बढ़ सकता है, जो शुरुआती गर्भपात का सबसे बड़ा कारण माना जाता है।
एम्ब्रियो की क्वालिटी
Dr. Hrishikesh Pai कहते हैं, “IVF के दौरान बनने वाले सभी एम्ब्रियो की क्वालिटी एक जैसी नहीं होती है। अगर भ्रूण में जेनेटिक समस्याएं हो या उसकी ग्रोथ सही तरीके से न हो रही हो, तो गर्भाशय में प्रत्यारोपण के बाद भी प्रेग्नेंसी आगे नहीं बढ़ पाती। कई मामलों में शरीर ऐसे भ्रूण को शुरुआती स्टेज पर ही अस्वीकार कर देता है और महिला को मिसकैरेज से गुजरना पड़ता है।”
गर्भाशय की समस्याएं
अगर महिला के यूटरस में फाइब्रॉइड, पॉलीप, जेनेटिक समस्याएं, इंफेक्शन या एंडोमेट्रियम की परत मजबूत नहीं है, तो भ्रूण का सही तरीके से प्रत्यारोपण प्रभावित हो सकता है। ऐसे मामलों में डॉक्टर IVF से पहले इन समस्याओं का इलाज करने की सलाह देते हैं।
PMOS और एंडोमेट्रियोसिस
Dr. Hrishikesh Pai ने कहा, “जो महिलाएं PMOS या एंडोमेट्रियोसिस जैसी समस्याओं से गुजर रही हैं। उनकी प्रेग्नेंसी पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, थायराइड, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और ऑटोइम्यून बीमारियां भी गर्भपात का रिस्क बढ़ा सकती हैं। इसलिए IVF करने से पहले डॉक्टर सभी बीमारियों को कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं।”
लाइफस्टाइल में बदलाव
अगर महिला स्मोकिंग, शराब पीना, मोटापा, फिजिकल एक्टिविटी न करना, स्ट्रेस, नींद की कमी और बैलेंस्ड डाइट जैसी आदतों को सही नहीं करती, तो इसका असर प्रेग्नेंसी पर पड़ता है। IVF के दौरान डॉक्टर महिलाओं को अपने लाइफस्टाइल और डाइट को बेहतर करने की सलाह देते हैं।
पहले से मिसकैरेज की हिस्ट्री
Dr. Hrishikesh Pai के मुताबिक, “अगर किसी महिला को पहले एक या एक से ज्यादा बार मिसकैरेज हो चुका है, तो उस महिला को ज्यादा मॉनिटर किया जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि अगली बार भी गर्भपात होगा, लेकिन कारणों की जांच करना जरूरी होता है।”
IVF प्रेग्नेंसी में मिसकैरेज से बचाव के लिए किन लक्षणों पर ध्यान रखना चाहिए?
Dr. Hrishikesh Pai ने बताया कि हर मिसकैरेज को रोकना तो मुश्किल है, लेकिन सही देखभाल और डॉक्टर की सलाह मानने से इस रिस्क को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके साथ अगर महिला अपने लक्षणों की पहचान समय रहते कर ले, तो डॉक्टर इलाज जल्द शुरू कर सकते हैं।
- योनि से बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होना
- पेट या कमर में तेज दर्द या ऐंठन
- पानी जैसा लगातार लीकेज होना
- तेज बुखार या ठंड लगना
- चक्कर आना या बेहोशी महसूस होना
- लगातार उल्टियां होना और शरीर में पानी की कमी होना
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निष्कर्ष
Dr. Hrishikesh Pai कहते हैं कि कपल्स को समझना होगा कि IVF से प्रेग्नेंसी होने पर महिलाएं सफलतापूर्वक डिलीवरी करती है, लेकिन महिलाओ को समय पर डॉक्टर को दिखाना, रेगुलर फॉलो-अप, दवाएं और हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना चाहिए। इसके साथ यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि IVF प्रेग्नेंसी में मिसकैरेज का खतरा केवल IVF की वजह से नहीं बढ़ता। इसके पीछे महिला की उम्र, एग, एम्ब्रियो की क्वालिटी और हार्मोनल समस्याएं जैसे कई रिस्क फैक्टर होते हैं। इसलिए महिलाओं को इंटरनेट से जानकारी लेने के बजाय फर्टिलिटी एक्सपर्ट से सलाह लेना ज्यादा बेहतर रहता है।
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FAQ
मिसकैरेज से बचाने में ब्लड थिनर दवाएं कैसे मदद करती हैं?
जिन महिलाओं में खून का थक्का जमने या ऑटोइम्यून समस्याएं होती हैं, उन्हें डॉक्टर एस्पिरिन या हेपरिन जैसे ब्लड थिनर देते हैं। ये दवाएं गर्भाशय और प्लेसेंटा तक खून के बहाव को सुचारू रखती हैं, जिससे मिसकैरेज का खतरा काफी कम हो जाता है।क्या एक बार IVF में मिसकैरेज होने के बाद दोबारा आईवीएफ सफल हो सकता है?
एक बार मिसकैरेज होने का मतलब यह नहीं है कि दोबारा प्रेगनेंसी नहीं रुक सकती। मिसकैरेज के कारणों का पता लगाकर और अगली बार सही इलाज योजना बनाकर दोबारा सफल प्रेग्नेंसी की जा सकती है।
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Jul 23, 2026 16:02 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Hrishikesh D Pai