Fri Sep 11, 2026 | 07:30 PM IST

Medically Reviewed by Dr Rajeev Chowdry , General Physician & Internal Medicine Specialist, Yatharth Super Speciality Hospital, Faridabad | 23 Years of Clinical Experience

बार-बार बीमारी का कारण कहीं स्‍ट्रेस तो नहीं? डॉक्‍टर से जानें तनाव से कैसे प्रभावित होती है इम्यूनिटी

स्‍ट्रेस को हल्‍के में न लें। यह केवल एक सामान्‍य मानस‍िक समस्‍या नहीं है। इससे शरीर का इम्‍यून स‍िस्‍टम प्रभाव‍ित होता है और बीमार‍ियां, इंफेक्‍शन का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्‍टर से जानें स्‍ट्रेस, इम्‍यून‍िटी पर कैसे हमला करता है?

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कभी-कभी हमारी तबीयत जरूरत से ज्‍यादा खराब हो जाती है। हम बार-बार बीमारी और इंफेक्‍शन की चपेट में आ जाते हैं। अक्‍सर लोगों की ब्‍लड र‍िपोर्ट भी नॉर्मल आती है और इसके बावजूद भी वे बार-बार बीमार पड़ते हैं। क्‍या आपने गौर क‍िया क‍ि ऐसा स्‍ट्रेस के कारण हो सकता है? एक्‍सपर्ट्स मानते हैं क‍ि जो व्‍यक्‍त‍ि स्‍ट्रेस में होता है वो जल्‍दी बीमार पड़ता है क्‍योंक‍ि स्‍ट्रेस का असर इम्‍यून‍िटी पर पड़ता है ज‍िसके कारण शरीर के बाहरी वायरस और इंफेक्‍शन से लड़ने की क्षमता कमजोर हो जाती है। डॉक्‍टर से जानते हैं आख‍िर स्‍ट्रेस इम्‍यून‍िटी को कैसे प्रभाव‍ित करता है? बेहतर जानकारी के ल‍िए हमने Dr. Rajeev Chowdry, Internal Medicine Specialist At Yatharth Super Speciality Hospital, Faridabad से बात की।

क्रॉन‍िक स्‍ट्रेस से इम्‍यून‍िटी प्रभाव‍ित हो सकती है

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Internal Medicine Specialist Dr. Rajeev Chowdry ने बताया क‍ि कभी-कभी स्‍ट्रेस में आना च‍िंता की बात नहीं है, लेक‍िन जब व्‍यक्‍त‍ि लंबे समय तक स्‍ट्रेस में रहता है, तो उसे क्रॉन‍िक स्‍ट्रेस कहा जाता है। क्रॉन‍िक स्‍ट्रेस शरीर में लिम्फोसाइट्स की संख्‍या को कम कर देता है। ये कोश‍िकाएं वायरस से लड़ने में मदद करती है, ले‍क‍िन जब इनकी मात्रा कम हो जाती है, तो शरीर आसानी से बीमार पड़ता है। यही नहीं, बल्‍क‍ि स्‍ट्रेस इम्‍यून‍ स‍िस्‍टम को सूजन पैदा करने के ल‍िए प्रेर‍ित करता है। शरीर में लगातार बढ़ने वाली सूजन हार्ट और अन्‍य अंगों को बीमार कर सकती है।

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क्रॉन‍िक स्‍ट्रेस से बढ़ सकता है इंफेक्‍शन का खतरा

साल 2024 में Journal Of Clinical Medicine में प्रकाश‍ित एक स्‍टडी के मुताब‍िक, जब व्‍यक्‍त‍ि स्‍ट्रेस में होता है, तो शरीर में हाइपोथैलेमिक-पिट्यूटरी-एड्रीनल (HPA) एक्सिस और सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम एक्‍ट‍िव हो जाते हैं। इससे स्‍ट्रेस से जुड़े हार्मोन जैसे कोर्टि‍सोल और अन्‍य केमि‍कल्‍स र‍िलीज होते हैं। जब व्‍यक्‍त‍ि क्रॉन‍िक स्‍ट्रेस का श‍िकार होता है, तो इम्‍यून कोश‍िकाओं का संतुलन प्रभाव‍ित हो सकता है ज‍िससे वायरल और बैक्‍टीर‍िया से लड़ने के ल‍िए शरीर की इम्‍यून‍िटी कमजोर हो सकती है ज‍िसके कारण इंफेक्‍शन का खतरा बढ़ जाता है।

कमजोर इम्‍यून‍िटी से मेटाबॉल‍िक समस्‍याएं बढ़ सकती हैं

Dr. Rajeev Chowdry ने बताया क‍ि अगर लंबे समय तक व्‍यक्‍त‍ि स्‍ट्रेस में है, तो उसके पाचन पर इसका बुरा असर होता है खासकर ज‍िनकी इम्‍यून‍िटी कमजोर है। व्‍यक्‍त‍ि को स्‍ट्रेस से पेट दर्द, पेट फूलने जैसे लक्षण महसूस होते हैं। ये लक्षण आप अक्‍सर तब महसूस करेंगे, जब आपको कहीं बाहर जाना हो या आप नर्वस हों।

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स्‍ट्रेस और कमजोर इम्‍यून‍िटी से बीमार‍ियों का खतरा बढ़ता है

  • स्‍ट्रेस के कारण अगर इम्‍यून‍िटी कमजोर होगी, तो हर समय थकान और कमजोरी महसूस होगी।
  • ज्‍यादा स्‍ट्रेस के कारण अन‍िद्रा की समस्‍या होती है और स‍िर दर्द हो सकता है।
  • लंबे समय तक शरीर में रहने वाला स्‍ट्रेस इम्‍यून‍िटी को कमजोर कर देता है ज‍िससे अस्‍थमा इंफेक्‍शन का खतरा भी बढ़ सकता है।
  • स्‍ट्रेस और कमजोर इम्‍यून‍िटी के कारण व्‍यक्‍त‍ि में ईट‍िंग ड‍िसऑर्डर की संभावना बढ़ सकती है जो मोटापा, डायब‍िटीज या हाई बीपी का सीधा कारण बन सकता है।
  • इससे मह‍िलाओं में अन‍ियम‍ित पीर‍ियड्स और मेनोपॉज के लक्षण ट्र‍िगर हो सकते हैं।

लाइफस्‍टाइल मैनेजमेंट से म‍िलेगी मदद

साल 2025 में Molecular Biology Reports में प्रकाश‍ित एक स्‍टडी के मुताब‍िक, स्‍ट्रेस हार्मोनल बदलाव जैसे कोर्टि‍सोल के बढ़ने और इम्‍यून प्रत‍िक्र‍िया के बीच संबंध बनाता है ज‍िससे शरीर की इम्‍यूनि‍टी प्रभाव‍ित होती है। स्‍टडी में बताया गया है क‍ि स्‍ट्रेस से बचने के ल‍िए नींद, शारीर‍िक गत‍िव‍िध‍ि, हेल्‍दी डाइट और स्‍ट्रेस मैनेजमेंट के उपाय अपनाने से मदद म‍िलती है।

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क‍िन लोगों की इम्‍यून‍िटी जल्‍दी कमजोर हो सकती है?

  • क्रॉन‍िक स्‍ट्रेस के मरीज।
  • जो पर्याप्त नींद नहीं लेते हैं।
  • ज‍िनके शरीर में प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स की कमी है।
  • डायब‍िटीज के मरीज।
  • कैंसर, किडनी रोग, लिवर रोग या ऑटोइम्यून बीमारियों वाले लोगों में इम्यूनिटी प्रभावित हो सकती है।
  • धूम्रपान और ज्‍यादा अल्‍कोहल पीने वाले लोग।
  • बच्‍चे, बुजुर्ग और गर्भवती मह‍िलाएं।

डॉक्‍टर से संपर्क कब करें?

  • बार-बार सर्दी-जुकाम या अन्य इंफेक्शन होना।
  • इंफेक्‍शन का लंबे समय तक बने रहना। ऐसा डायब‍िट‍िक मरीजों में हो सकता है।
  • लगातार थकान और कमजोरी महसूस होना।
  • बार-बार बुखार आना।
  • वजन तेजी से कम होना।
  • लगातार पाचन समस्याएं होना।

जरूरत पड़ने पर ब्लड टेस्ट जैसे सीबीसी, ब्‍लड शुगर टेस्‍ट, विटामिन और अन्य टेस्‍ट करवाकर इम्यूनिटी और इंफेक्‍शन के कारणों की जांच कर सकते हैं।

न‍िष्‍कर्ष:

क्रॉन‍िक स्‍ट्रेस शरीर में लिम्फोसाइट्स की संख्‍या को कम कर देता है। इस वजह से शरीर आसानी से बीमार‍ियों की चपेट में आ सकता है। स्‍ट्रेस, इम्‍यून‍ स‍िस्‍टम को सूजन पैदा करने के ल‍िए भी प्रेर‍ित करता है ज‍िससे हार्ट और मेटाबॉल‍िक बीमार‍ियों का खतरा बढ़ सकता है। कमजोर इम्‍यूनि‍टी के कारण व्‍यक्‍त‍ि जल्‍दी-जल्‍दी बीमार‍ियों की चपेट में आ सकता है। इससे अस्‍थमा, मोटापा, अन‍ियम‍ित पीर‍ियड्स जैसी समस्‍याएं भी हो सकती हैं। क्रॉन‍िक स्‍ट्रेस, नींद न पूरी करने वाले लोग, डायब‍िटीज के मरीज, पोषक तत्‍वों का सेवन न करने वाले लोग, कैंसर या क‍िडनी रोग के मरीज, धूम्रपान या ज्‍यादा अल्‍कोहल पीने वाले लोग, बच्‍चे, बुजुर्ग या मह‍िलाओं में इम्‍यून‍िटी कमजोर होने का खतरा ज्‍यादा हो सकता है। जरूरत पड़ने पर सीबीसी, ब्‍लड शुगर टेस्‍ट कराएं।

FAQ

  • क्या धूम्रपान और अल्‍कोहल इम्यूनिटी को नुकसान पहुंचाता है?

    हां, धूम्रपान और अल्‍कोहल का सेवन करने से इम्यून कोशिकाओं की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और इंफेक्‍शन का खतरा बढ़ा सकता है।
  • क्या बार-बार एंटीबायोटिक लेने से इम्यूनिटी कमजोर होती है?

    जरूरत से ज्यादा या गलत तरीके से एंटीबायोटिक लेने से आंतों में गुड बैक्‍टीरिया की संख्‍या कम हो सकती है ज‍िससे इम्‍यून‍िटी कमजोर हो सकती है।  

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Disclaimer

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Yashaswi Mathur

Yashaswi Mathur

Senior Sub Editor

यशस्वी माथुर पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिनमें से करीब 8 साल उन्होंने हेल्थ जर्नलिज्म को दिए हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं। यहां वह स्वास्थ्य, महिला स्वास्थ्य, पोषण और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। यशस्वी की खासियत है जटिल मेडिकल विषयों और रिसर्च को आसान भाषा में समझाना, ताकि आम पाठक भी उन्हें आसानी से समझ सके। लेख तैयार करते समय वह विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय, मेडिकल रिसर्च और भरोसेमंद स्रोतों का ध्यान रखती हैं। जिन विषयों में मेडिकल वैरिफिकेशन जरूरी होता है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्तान अखबार से की थी। उस दौरान स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी एक खोजी रिपोर्ट के बाद लखनऊ के KGMU स्थित क्वीन मेरी अस्पताल के गायनेकोलॉजी विभाग में व्यवस्थाओं को लेकर स्वास्थ्य विभाग को सुधारात्मक कदम उठाने पड़े। Editorial Policy: यशस्वी द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Aug 07, 2026 20:38 IST

    Published By : Yashaswi Mathur
    Reviewed By : Dr Rajeev Chowdry

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