Fri Oct 16, 2026 | 05:36 PM IST

Medically Reviewed by Dr Arun Goel , Chairman & Surgical Oncologist Andromeda Cancer Hospital, Haryana

प्लास्टिक की बोतल और डिब्बे से कैंसर होने का डर कितना सही है? डॉक्टर से जानें सच

इंटरनेट पर कई ऐसे वीड‍ियो मौजूद हैं ज‍िनमें प्‍लास्‍ट‍िक की बाेतल में पानी पीने और प्‍लास्‍ट‍िक कंटेनर में भोजन करने की आदत को कैंसरकारी बताया गया है। क्‍या यह वाकई सच है? एक्‍सपर्ट से जानें सही जवाब।
प्लास्टिक की बोतल और डिब्बे से कैंसर होने का डर कितना सही है? डॉक्टर से जानें सचप्लास्टिक की बोतल और डिब्बे से कैंसर होने का डर कितना सही है? डॉक्टर से जानें सच

प्लास्टिक आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है। इसका इस्तेमाल कई कारणों से किया जाता है। यह आसानी से अलग-अलग आकार में ढाला जा सकता है, मजबूत होता है और वजन में हल्का होता है। प्लास्टिक की बोतलों में हम पानी पीते हैं और प्‍लास्‍ट‍िक के ड‍िब्‍बों को खाना पैक करने या रखने के ल‍ि‍ए भी इस्‍तेमाल क‍िया जाता है। प्लास्टिक सेहत के साथ-साथ पर्यावरण में प्रदूषण का एक बड़ा कारण माना जाता है। कुछ लोग ऐसा मानते हैं क‍ि प्‍लास्‍ट‍िक की बाेतल में पानी पीने से कैंसर होता है। क्‍या यह वाकई सच है? इस सवाल का जवाब आगे जानते हैं। बेहतर जानकारी के ल‍िए हमने Dr. Arun Goel, Surgical Oncologist & Chairman At Andromeda Cancer Hospital, Haryana से बात की।

American Cancer Society के मुताब‍िक, कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक DNA को नुकसान पहुंचा सकते हैं, अंगों की अंदरूनी परत को चोट पहुंचा सकते हैं, शरीर में सूजन पैदा कर सकते हैं और आंतों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। हालांक‍ि, इनका कैंसर से सीधे संबंध पर सीम‍ित अध्‍ययन हुए हैं ज‍िनमें प्‍लास्‍ट‍िक से कैंसर होने का प्रमाण नहीं द‍िया गया है।

प्‍लास्‍ट‍िक बोतलों और ड‍िब्‍बों से कैंसर फैलने का दावा प्रमाण‍ित नहीं है

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कुछ लोगों को चिंता होती है कि प्लास्टिक की बोतलों और डिब्बों में मौजूद केमिकल खाने-पीने की चीजों में मिल सकते हैं। दरअसल प्‍लास्‍ट‍िक बोतलों या ड‍िब्‍बों में मौजूद एक केम‍िकल को लेकर लोगों के मन में च‍िंता रहती है। बिस्फेनॉल ए (BPA) एक केमिकल है, जिसका इस्तेमाल कुछ तरह के प्लास्टिक बनाने में किया जाता है। यह खाने के डिब्बों, प्‍लास्‍ट‍िक बोतलों और खाने-पीने के सामान के टिन या कैन की अंदरूनी परत में इस्‍तेमाल होता है। हालांकि, खाने-पीने की चीजों में पहुंचने वाले BPA की मात्रा इतनी कम होती है कि इससे नुकसान होने की आशंका नहीं मानी जाती। हमारा शरीर थोड़े समय में ही ज्यादातर BPA को तोड़कर पेशाब के जरिए बाहर निकाल सकता है।

रिसर्च क्या कहती है?

Cancer Research, UK के मुताब‍िक, प्लास्टिक की पैकेजिंग से थोड़ी मात्रा में केमिकल खाने-पीने की चीजों में मिल सकते हैं, लेकिन इनकी मात्रा इतनी कम होती है कि इन्हें सेहत के लिए नुकसानदायक नहीं माना जा सकता। इंसानों पर किए गए अध्ययनों में इस बात का कोई पुख्‍ता सबूत नहीं मिला है कि प्लास्टिक में रखे खाने या पीने की चीजों से कैंसर होता है।

माइक्रोवेव, प्लास्टिक और कैंसर के बीच क्या संबंध है?

प्लास्टिक को गर्म करने पर उसमें मौजूद कुछ केमिकल खाने में मिल सकते हैं। ऐसा माइक्रोवेव में खाना गर्म करने के दौरान भी हो सकता है। हालांकि, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इससे कैंसर होता है। माइक्रोवेव में खाना गर्म करने से पहले यह जरूर जांच लें कि डिब्बे पर 'माइक्रोवेव सेफ' लिखा हो। इसका मतलब है कि उस डिब्बे को माइक्रोवेव में इस्तेमाल करने के लिए उपयुक्त बताया गया है। कुछ आम गलत धारणाओं के विपरीत, माइक्रोवेव ओवन में खाना गर्म करने से वह रेडियोधर्मी नहीं बनता। माइक्रोवेव चालू होने पर उसके सामने खड़े रहना भी सुरक्षित है। माइक्रोवेव ओवन रेडियो तरंगों का इस्तेमाल करते हैं। ये एक तरह की ऊर्जा तरंगें हैं, जिनमें DNA को नुकसान पहुंचाकर कैंसर पैदा करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं होती।

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कैंसर के कौन से कारण रिसर्च से साबित हो चुके हैं?

रिसर्च से कैंसर के कई कारणों की पुष्टि हुई है। जैसे-

  • तंबाकू का सेवन
  • मोटापा
  • यूवी किरणें
  • अल्‍कोहल का सेवन
  • प्रोसेस्ड मीट का सेवन
  • ह्यूमन पैपिलोमावायरस इंफेक्‍शन (HPV)

प्लास्टिक में खाना गर्म करने से बचें

  • गर्म खाना या पेय पदार्थ प्लास्टिक के बर्तनों में रखने से बचें।
  • ठंडे खाने को दोबारा गर्म करते समय भी प्लास्टिक के बजाय कांच या माइक्रोवेव के लिए सुरक्षित दूसरे विकल्प चुनें।
  • अधिक तापमान पर प्लास्टिक से खाने में माइक्रोप्लास्टिक के कण पहुंचने की संभावना बढ़ सकती है।

प्लास्टिक के खतरों से बचने के लिए सुरक्षित विकल्प

प्लास्टिक के बर्तनों की जगह आप इन विकल्पों का इस्तेमाल कर सकते हैं-

  • रोजाना पानी पीने के लिए स्टेनलेस स्टील की बोतल एक अच्छा विकल्प है। इसे नियमित रूप से साफ करना भी जरूरी है।
  • खाना पकाने, फ्रिज में रखने और टिफिन में ले जाने के लिए स्टील के बर्तन इस्‍तेमाल करें।
  • खाना परोसने और रखने के लिए सिरेमिक के बर्तनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • खाना रखने और दोबारा गर्म करने के लिए हीट-रेसिस्टेंट कांच के बर्तन इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
  • खाना पकाने और परोसने के लिए बिना हानिकारक केमिकल वाली खाद्य-सुरक्षित मिट्टी के बर्तन इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

डॉक्टरों की सलाह: प्लास्टिक के उपयोग में सावधानी कैसे बरतें?

  • एक बार इस्तेमाल होने वाले डिब्बों को दोबारा गर्म न करें।
  • पानी की बोतलों को गर्म गाड़ी में या सीधे धूप में लंबे समय तक न छोड़ें। बोतल पर दिए गए निर्देशों का पालन करें।
  • जिन बर्तनों में दरारें हों, वे टूट रहे हों या उनका आकार बदल गया हो, उन्‍हें इस्‍तेमाल करने से बचें।
  • बोतलों और डिब्बों को साफ करते समय बहुत तेज केमिकल वाले क्लीनर या ब्लीच का इस्तेमाल न करें।
  • गर्म खाना रखने या माइक्रोवेव में गर्म करने के लिए सामान्य प्लास्टिक के डिब्बों के बजाय कांच या माइक्रोवेव-सेफ बर्तन का इस्तेमाल करें।

न‍िष्‍कर्ष:

प्‍लास्‍ट‍िक बोतलों में पानी पीने से और प्‍लास्‍ट‍िक ड‍िब्‍बों में खाने से कैंसर होने का दावा पूरी तरह से सच नहीं है। ज‍िन स्‍टडीज का अध्‍ययन क‍िया गया है उनमें प्‍लास्‍ट‍िक से कैंसर होने का दावा प्रमाण‍ित नहीं हो पाया है। हालांक‍ि, प्‍लास्‍ट‍िक पर्यावरण और सेहत के ल‍िए नुकसानदायक माना जाता है इसल‍िए उसे भोजन में इस्‍तेमाल नहीं करना चाह‍िए। ड‍िस्‍पोजेबल बोतलों और ड‍िब्‍बों को इस्‍तेमाल के बाद तुरंत हटा दें। प्‍लास्‍ट‍िक में खाना गर्म करने से भी बचना चाह‍िए। अध‍िक तापमान में प्‍लास्‍ट‍िक को गर्म करने से उसके कण भोजन में म‍िल सकते हैं। हालांक‍ि, इससे भी कैंसर होने का पुख्‍ता प्रमाण नहीं म‍िला है।

image credit: magnific

FAQ

  • क्या प्लास्टिक के कप में गर्म चाय या कॉफी पीने से कैंसर होता है?

    प्लास्टिक के कप में गर्म चाय या कॉफी पीने से कैंसर होने का सीधा प्रमाण नहीं म‍िला है। हालांकि, गर्म पेय के संपर्क में आने पर कुछ कपों से केम‍िकल या प्लास्टिक के छोटे कण निकल सकते हैं।
  • माइक्रोप्लास्टिक क्या है?

    माइक्रोप्लास्टिक, प्लास्टिक के बहुत छोटे कण होते हैं, जिनका आकार आमतौर पर 5 मिलीमीटर से कम होता है। ये भोजन, पानी और हवा के जरिए शरीर में पहुंच सकते हैं। 

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    Oct 16, 2026 16:45 IST

    Published By : Yashaswi Mathur
    Reviewed By : Dr Arun Goel