लिवर हमारे शरीर का खास अंग है। यह खून को फिल्टर करके शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है। लिवर जर्म्स से लड़ने में इम्यून सिस्टम की मदद करता है ताकि आप बीमार न हों। लिवर हमारे ब्लड शुगर लेवल को भी संतुलित रखने में मदद करता है। Centers for Disease Control and Prevention (CDC) के मुताबिक, जब हम भोजन करते हैं, तो इंसुलिन नाम का हार्मोन खून से अतिरिक्त शुगर को बाहर निकाल देता है। यह शुगर भविष्य के इस्तेमाल के लिए लिवर में जमा हो जाती है। भोजन के बीच या रात में लिवर उस शुगर को दोबारा ब्लड में छोड़ देता है ताकि शरीर को शुगर के जरिए एनर्जी मिल सके। आजकल अनहेल्दी लाइफस्टाइल के कारण फैटी लिवर की समस्या कॉमन होती जा रही है और इसका संबंध डायबिटीज के साथ देखा जा रहा है।
2024 में HepatoBiliary Surgery and Nutrition के एक रिव्यू के मुताबिक, नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (MASLD), टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों में बहुत आम है और इसका मुख्य कारण मोटापा और इंसुलिन रेजिस्टेंस को माना गया है। स्टडी के मुताबिक, फैटी लिवर रोग टाइप 1 डायबिटीज में भी हो सकता है। वजन कम करके, हेल्दी डाइट लेकर और एक्सरसाइज से इसे मैनेज किया जा सकता है, लेकिन अगर फैटी लिवर का इलाज न किया जाए, तो यह स्थिति लिवर सिरोसिस में बदल सकती है। इससे आगे चलकर लिवर कैंसर, ह्रदय रोग या गुर्दे की बीमारी का खतरा भी बढ़ सकता है। इस लेख में हम डायबिटीज और फैटी लिवर के बीच का संबंध समझेंगे। इस विषय पर बेहतर जानकारी के लिए हमने Dr. Kapil Sharma, Gastroenterologist At Yatharth Super Speciality Hospital, Faridabad से बात की।
डायबिटीज और फैटी लिवर के बीच क्या संबंध है?

Dr. Kapil Sharma ने बताया कि अगर डायबिटीज है, तो फैटी लिवर की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि डायबिटीज, फैटी लिवर का एक अकेला कारण नहीं है। फिर भी दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक बीमारी का इलाज करने के लिए दूसरे से निपटना जरूरी है। Mayo Clinic के मुताबिक, डायबिटीज के कारण नॉन-एल्कोहलिक फैटी लिवर रोग का खतरा बढ़ जाता है। यानी अगर आप बहुत कम या बिल्कुल भी अल्कोहल न भी पीते हों, तो भी लिवर में फैट जमा हो सकता है। अगर आपको फैटी लिवर के साथ टाइप 2 डायबिटीज भी है और शुगर लेवल कंट्रोल में नहीं है, तो फैटी लिवर रोग गंभीर हो सकता है।
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डायबिटीज में फैटी लिवर की समस्या हो सकती है?
डायबिटीज में सेहत का ख्याल न रखने की स्थिति में फैटी लिवर की समस्या हो सकती है। जिन लोगों को इंसुलिन रेजिस्टेंस होता है, उनके ब्लड में शुगर और इंसुलिन दोनों बढ़ जाते हैं जिससे लिवर में ज्यादा फैट जमा हो सकता है। जब इंसुलिन ठीक ढंग से काम नहीं करता, तो लिवर में ग्लूकोज का मेटाबॉलिज्म बिगड़ सकता है और धीरे-धीरे फैटी लिवर की स्थिति बन सकती है। लंबे समय तक शुगर लेवल ज्यादा रहने के कारण लिवर में फैट जमा होने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। डायबिटीज के साथ मोटापा, हाई कोलेस्ट्रॉल और हाई ट्राइग्लिसराइड्स जैसे कारण फैटी लिवर का कारण बन सकते हैं।
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इन लक्षणों पर गौर करें
Centers for Disease Control and Prevention (CDC) के मुताबिक, MASLD और MASH में अक्सर लक्षण कई सालों तक बिना पता चले बढ़ सकते हैं, हालांकि कुछ लोगों को शुरुआत की स्टेज में ये कॉमन लक्षण महसूस हो सकते हैं-
- भूख न लगना।
- थकान।
- त्वचा और आंखों का पीला पड़ना।
- पेट के दाईं ओर दर्द।
- बिना किसी वजह के वजन कम होना।
ज्यादातर लोगों को लिवर की बीमारी के शुरुआती चरणों में कोई बदलाव नजर नहीं आता। इसी वजह से, स्क्रीनिंग और शुरुआती जांच बहुत जरूरी है। डॉक्टर लिवर एंजाइम (जो लिवर के काम करने की क्षमता का पैमाना है) की जांच के लिए ब्लड टेस्ट कर सकते हैं। टेस्ट के नतीजों और आपकी उम्र के आधार पर, आपके लिवर को होने वाले नुकसान के जोखिम का अनुमान लगाया जाता है।
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फैटी लिवर में डायबिटीज का खतरा कितना और कैसे है?
फैटी लिवर में डायबिटीज का जोखिम दो से पांच गुना तक बढ़ जाता है। जिन लोगों को फैटी लिवर के साथ मोटापे की समस्या है, उनमें यह खतरा और ज्यादा हो सकता है। World Journal Of Gastroenterology में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक, फैटी लिवर वाले मरीजों में डायबिटीज का जोखिम 2.19 गुना ज्यादा होता है।
टाइप 2 डायबिटीज में कितने प्रतिशत लोगों में फैटी लिवर हो सकता है?
टाइप 2 डायबिटीज से पीड़ित लोगों में फैटी लिवर (Non-Alcoholic Fatty Liver Disease) विकसित होने की संभावना काफी अधिक होती है। कुछ स्टडीज के अनुसार लगभग 50 से 60 प्रतिशत टाइप 2 डायबिटीज मरीजों में फैटी लिवर पाया जाता है। डायबिटीज में इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा, हाई ट्राइग्लिसराइड्स और खराब लाइफस्टाइल, इस रिस्क को और बढ़ाते हैं।
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डायबिटीज में फैटी लिवर की जांच कैसे होती है?
- डायबिटीज में इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण फैट जल्दी जमा होता है इसलिए डॉक्टर नियमित जांच की सलाह देते हैं।
- फैटी लिवर की जांच के लिए एलएफटी, एसजीपीपी, एलटी, लिपिड प्रोफाइल जैसी जांच होती है।
- डायबिटीज के मरीजों में लिवर की स्टिफनेस या कठोरता देखने के लिए फाइब्रोस्कैन टेस्ट किया जाता है। यह फैट की मात्रा का भी पता लगाने में मदद करता है। फाइब्रोस्कैन से पता चलता है कि लिवर में जमा फैट कितना नुकसानदेह है?
- जिन लोगों को लंबे समय से डायबिटीज के साथ फैटी लिवर की समस्या है, उन्हें डॉक्टर अल्ट्रासाउंड, एमआरआई कराने की सलाह दे सकते हैं।
टाइप 1 डायबिटीज में भी फैटी लिवर की समस्या हो सकती है?
The Journal of Clinical Endocrinology and Metabolism की एक स्टडी के मुताबिक, टाइप 1 डायबिटीज में फैटी लिवर की संभावना 19.3 प्रतिशत पाई गई। पहले फैटी लिवर की समस्या टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों में देखी जाती थी, लेकिन इस स्टडी से पता चलता है कि टाइप 1 में भी फैटी लिवर की समस्या हो सकती है। टाइप 1 डायबिटीज के कुछ मामलों में फैटी लिवर का कारण इंसुलिन रेजिस्टेस पाया गया है।
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डायबिटीज में फैटी लिवर से बचने के लिए डाइट की भूमिका
अगर आपको डायबिटीज है, तो फैटी लिवर रोग से बचने के लिए सबसे पहले शुगर लेवल को कंट्रोल करना जरूरी है। शुगर लेवल को कंट्रोल करने के लिए डाइट और एक्सरसाइज अहम भूमिका निभाएंगे। अपने आहार में बदलाव करके आप वजन कम कर सकते हैं और फैटी लिवर से बच सकते हैं। Dr. Kapil Sharma ने बताया कि, ‘’मीठा सोडा, जूस, मिठाई, फ्रुक्टोज युक्त आहार से परहेज करें। सफेद चावल, सफेद ब्रेड जैसे हाई कार्ब फूड्स का सेवन भी कम करें। ट्रांस फैट से बचें और आहार में सब्जियां, फल और घर का बना ताजा खाना शामिल करें।’’
डायबिटीज में फैटी लिवर से कैसे बचें?
फैटी लिवर रोग से बचने के लिए Mayo Clinic ने कुछ तरीके सुझाए हैं-
- अगर डायबिटीज है, तो डॉक्टर शुगर लेवल कंट्रोल करने की सलाह दे सकते हैं।
- फैटी लिवर और डायबिटीज से बचने के लिए वजन को कंट्रोल करें।
- हाई बीपी की स्थिति से भी बचना चाहिए।
- बैड कोलेस्ट्रॉल या एलडीएल को भी कंट्रोल करें।
- अल्कोहल से बचें।
Mayo Clinic के मुताबिक, डायबिटीज के मरीजों में जब असामान्य लक्षण नजर आते हैं, तो डॉक्टर उन्हें लिवर का अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दे सकते हैं। लिवर फंक्शन की जांच करने के लिए डॉक्टर ब्लड टेस्ट कराने की सलाह भी दे सकते हैं।
डॉक्टर से संपर्क कब करें?
Dr. Kapil Sharma ने बताया कि अगर दवाओं या डाइट के बावजूद शुगर लेवल ज्यादा है, तो लिवर पर इसका बुरा असर हो सकता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सलाह लें। अल्ट्रासाउंड या अन्य जांच में फैटी लिवर का पता चलने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लें, खासकर अगर व्यक्ति डायबिटीज का शिकार है, तो चिकित्सा सलाह में देरी न करें।
निष्कर्ष:
Gastroenterologist Dr. Kapil Sharma से बातचीत के आधार पर हमें पता चला कि डायबिटीज में ब्लड शुगर लेवल ठीक से मैनेज नहीं हो पाता है और फैटी लिवर एक ऐसी स्थिति है जिसमें लिवर की कोशिकाओं में फैट जमा हो जाता है। Mayo Clinic और अन्य स्टडीज के आधार पर हमें पता चलता है कि डायबिटीज और फैटी लिवर में संबंध हो सकता है। शुगर लेवल असंतुलित होने के कारण फैटी लिवर का खतरा बढ़ सकता है।
FAQ
डायबिटीज और फैटी लिवर में क्या खाएं?
डायबिटीज और फैटी लिवर में मीठी चीजों, सोडा, प्रोसेस्ड फूड्स, हाई कार्ब फूड्स से बचना चाहिए। डैश डाइट का सेवन फायदेमंद हो सकता है।क्या टाइप 2 डायबिटीज में फैटी लिवर की संभावना ज्यादा होती है?
टाइप 2 डायबिटीज से पीड़ित हर व्यक्ति को फैटी लिवर की समस्या हो, यह जरूरी नहीं है। हालांकि टाइप 2 डायबिटीज में शुगर लेवल असंतुलित होने से फैटी लिवर का खतरा बढ़ सकता है।किन लोगों को फैटी लिवर का खतरा ज्यादा होता है?
डायबिटीज, मोटापा, हाई कोलेस्ट्रॉल, हाई बीपी वगैरह मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकती हैं और इनसे फैटी लिवर का खतरा बढ़ सकता है।फैटी लिवर और डायबिटीज की जांच कैसे होती है?
फैटी लिवर की जांच के लिए डॉक्टर ब्लड टेस्ट, लिवर फंक्शन टेस्ट और अल्ट्रासाउंड जैसे टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं। डायबिटीज की जांच के लिए डॉक्टर अक्सर फॉस्टिंग ब्लड शुगर या एचबीए1सी टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं।
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Apr 02, 2026 19:49 IST
Modified By : Yashaswi Mathur Apr 02, 2026 19:49 IST
Modified By : Yashaswi MathurApr 02, 2026 19:49 IST
Published By : Yashaswi Mathur
Reviewed By : Dr Kapil Sharma