कोविड से रिकवरी में क्यों फायदेमंद है चेस्ट फीजियोथेरेपी? डॉक्टर से जानें कारण और सही तरीका

कोरोना होने के बाद फेफडो़ं पर असर पड़ता है। फेफड़े बुरी तरह डैमेज हो जाते हैं, लेकिन चेस्ट फीजियोथेरेपी से इन्हें ठीक कर सकते हैं।

Meena Prajapati
Written by: Meena PrajapatiPublished at: May 19, 2021
कोविड से रिकवरी में क्यों फायदेमंद है चेस्ट फीजियोथेरेपी? डॉक्टर से जानें कारण और सही तरीका

कोरोना होने पर सबसे ज्यादा असर फेफड़ों पर पड़ता है। ऐसे में मरीज कोरोना से तो ठीक हो जाता है लेकिन कोरोना से मरीज के जो फेफड़े कमजोर होते हैं उनकी रिकवरी जल्दी नहीं हो पाती। राजकीय हृदय रोग संस्थान, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, कानपुर में कार्यरत वरिष्ठ प्रोफेसर ऑफ कार्डियोलॉजी डॉ. अवधेश शर्मा (Cardiologist Dr. Awadhesh sharma, Kanpur) का कहना है कि पोस्ट कोविड के बाद फेफड़ों में आई कमजोरी की वजह से फेफडों के काम करने की क्षमता पर असर पड़ता है। जिससे उन्हें सांस लेने में दिक्कत होती है। डॉक्टर का कहना है कि फेफड़ों की इस परेशानी से बचने के लिए चेस्ट फीजियोथेरेपी (post covid chest physiotherapy exercises) जरूरी है। कोविड के दौरान जितना जरूरी इलाज है उतनी ही जरूरी पोस्ट कोविड चेस्ट फीजियोथेरेपी है। 

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कोविड फेफड़ों पर कैसे असर डालता है?

कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर अवधेश शर्मा का कहना है कि कोविड में फेफड़े खराब हो जाते हैं। जब रिकवरी का टाइम आता है तब फेफड़े धीरे-धीरे ठीक होते हैं। इसी फेज में फेफड़ों में सिकुड़न आ जाती है। फेफड़े एक स्पंजी स्ट्रक्चर होता है। स्पंज में कई सारे छेद होते हैं उससे फेफड़े ऑक्सीजन को अंदर लेते हैं और कार्बनडाइऑक्साइड को बाहर छोड़ते हैं। वायरस का प्रकोप जब फेफड़ों पर पड़ता है, तब यह स्पंजी फेफड़े ठोस हो जाते हैं। जैसे आटे की लुगदी। इससे सांस लेने और छोड़ने के एल्वलाइ (Alveoli) बंद हो जाते हैं। 

निमोनिया में फेफड़ों का स्पंजी स्ट्रक्चर सॉलिड स्ट्रक्चर हो जाता है। लेकिन जब रिकवरी का समय आता है तब यह स्पंजी स्ट्रक्चर न होकर फेफड़ों में जगह-जगह फाइबर जमा हो जाते हैं। उन फाइबर में खिंचाव पैदा होता है जिससे फेफड़े सिकुड़ जाते हैं। फिजोयोथेरेपी में फेफड़े खराब होने से पहले जैसे स्वस्थ थे वापस उसी अवस्था में लाना होता है। 

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कैसे करते हैं चेस्ट फीजियोथेरेपी?

चेस्ट फीजियोथेरेपी के लिए अलग-अलग मेथेड हैं। डॉक्टर अवधेश शर्मा ने निम्न तरीके बताए हैं। 

चेस्ट स्पाइरोमेट्री 

डॉक्टर बताते हैं कि जब पेशेंट बीमार होता है तब उसकी पीठ पर हाथ से थपथपी देते हैं। पेट, साइड में और छाती पर दबाव डाला जाता है। फेफड़ों को बाहर की तरफ से अंदर लाते हैं। इससे फेफड़ों में जमी बलगम बाहर निकलती है। इसे चेस्ट कैटिंग कहते हैं। एक इंस्ट्रूमेंट आता है जिससे मरीज को सांस अंदर लेने को कहा जाता है। धीरे-धीरे यह प्रक्रिया बढ़ती है। इसे चेस्ट स्पाइरोमेट्री (chest spirometry) कहते हैं। चेस्ट स्पाइरोमेट्री मशीन से फेफड़ों की एक्सरसाइज होती है। इस मशीन से जब पेशेंट तीनों बॉल्स को ऊपर उठाने लगेगा तो उससे पता चलता है कि अब पेशेंट के फेफडों की क्षमता अच्छी हो गई है। 

दूसरी स्पाइरोमेट्री मशीन में मार्कर लगे होते हैं। 2ml, 2000ml, 3000ml जैसे मार्कर लगे होते हैं। इसमें पेशेंट को अंदर की तरफ सांस खींचने को बोलते हैं और देखते हैं कि पेशेंट स्टंट को कहा तक उठा पाया है। शुरू के दिनों में पेशेंट इसे धीरे-धीरे उठा पाता है फिर बाद में बढ़ जाता है। डॉक्टर का कहना है कि हमारा टारगेट होता है कि मरीज 1500ml से ऊपर पिकअप कर ले। 

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फेफड़ों को कैसे मदद करती है चेस्ट स्पाइरोमेट्री

डॉक्टर का कहना है कि चेस्ट स्पाइरोमेट्री से पेशेंट को दिन में तीन या चार बार करने को कहा जाता है। जब पेशेंट अंदर की तरफ लंबी सांस खींचता है तब फेफड़ों के एल्वलाइ ऑक्सीजन अंदर जाने की वजह से फूलते हैं। निमोनिया की वजह से सिकुड़े हुए एल्वलाइ फूल जाते हैं। जिससे फेफड़ों में सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया सामान्य हो जाती है। 

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इंस्पाइरेटरी मसल्स के लिए एक्सरसाइज

फेफड़ों में दो तरह की मसल्स होती हैं। एक सांस अंदर लेने के लिए होती हैं, जिन्हें इंस्पाइरेटरी (inspiratory muscles) कहते हैं। दूसरी सांस छोड़ने वाली मांसपेशियां होती हैं जिन्हें एक्सपाइरेटरी मांसपेशियां (expiratory muscles) कहते हैं। ये मांसपेशियां सांस को बाहर छोड़ती हैं। सांस अंदर लेने की प्रक्रिया ज्यादा कठिन होती है। सांस अंदर लेने में ज्यादा ताकत लगानी पड़ती है। इसलिए इंस्पाइरेटरी मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए स्पाइरोमेट्री मशीन से एक्सरसाइज की जाती है।

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डीप ब्रिदिंग एक्सरसाइज

फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए डीप ब्रिदिंग की भी एक्सरसाइज की जाती है। डॉक्टर का कहना है कि  जब पेशेंट थोड़ा ठीक हो जाता है तब उसे डीप ब्रिदिंग एक्सरसाइज करने को कहा जाता है। ये भी इंस्परेटरी मसल्स के लिए होती हैं। 

एक्सपाइरेटरी मांसपेशियों के लिए एक्सरसाइज

गुब्बारों से एक्सरसाइज 

एक्सपाइरेटरी मसल्स (expiratory muscles) के लिए एक तो स्पाइरोमेट्री मशीन से एक्सरसाइज की जाती है। दूसरा गुब्बारों से होती है। पेशेंट को गुब्बारों में हवा भरने को कहा जाता है। इसे तीन से चार बार गुब्बारे फुलाने को कहा जाता है। जब व्यक्ति गुब्बारों में हवा भरेगा तो उसकी एक्सपाइरेटरी मसल मजबूत होंगी।

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मोमबत्ती के साथ एक्सरसाइज

मरीज को मोमबत्ती से एक डिस्टेंस मेंटेन करना होता है और बिना झुके मोमबत्ती में फूंक मारनी है और उसे बुझाना होता है। जब पेशेंट तेजी से मोमबत्ती में फूंक मारता है तो उसकी एक्सपाइरेटरी मसल की एक्सरसाइज हो जाती है। मोमबत्ती से अच्छी एक्सरसाइज होती है।

प्लेन पेपर के साथ एक्सरसाइज

सीधा प्लेन पेपर को पेशेंट के सामने कोई लेकर खड़ा हो जाता है और फिर पेशेंट को उस पर फूंक मारने को कहा जाता है। पेशेंट को कहा जाता है कि इतनी तेज फूंक मारें कि पेपर सीधा खड़ा होने की बजाए टेढ़ा हो जाए। जब पेशेंट पेपर पर फूंक मारेगा तो पेपर आगे की तरफ भागेगा। इस प्रक्रिया से एक्सपाइरेटरी (Expiratory) मांसपेशियां मजबूत होती हैं।

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क्यों जरूरी है चेस्ट फीजियोथेरेपी

  • डॉक्टर का कहना है कि अगर पेशेंट कोविड से रिकवरी के दौरान चेस्ट फिजियोथेरेपी नहीं करता है तो उसकी फेफडो़ं की क्षमता नहीं बढ़ेगी। 
  • पेशेंट को सांस फूलने की शिकायत हो जाएगी। पेशेंट के फेफडे सिकुड़ जाते हैं, और फेफड़े कमजोर हो जाते हैं। एक्सरसाइज करने से फेफड़ों में सिकुड़न नहीं होगी।

ध्यान रखने वाली बातें

  • चेस्ट फीजियोथेरेपी के लिए मोटीवेशन बहुत जरूरी है। कोविड के बाद चेस्ट फीजियोथेरेपी के लिए खुद को मोटिवेट करते रहें। 
  • इलाज के बाद अच्छी डाइट लें। ऐसी डाइट लें जो प्रोटीन रिच हो। 
  • सामान्य व्यक्ति को भी चेस्ट फिजियोथेरेपी करनी चाहिए। ऐसे व्यक्ति योगा और प्राणायाम कर सकते हैं। 

कोरोना होने के बाद फेफडो़ं पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है। फेफड़े बुरी तरह डैमेज हो जाते हैं, लेकिन चेस्ट फीजियोथेरेपी से इन्हें वापस ठीक किया जा सकता है। इसलिए चेस्ट फीजियोथेरेपी जरूरी है। 

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