Positive Parenting: बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए ये हैं 5 पॉजिटिव पेरेंटिंग टिप्स

बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए आपको पॉजिटिव पेरेंटिंग के बारे में जरूर जानना चाहिए ताकि बच्चे और आपके बीच अच्छे संबंध बनें। 

Dipti Kumari
Written by: Dipti KumariPublished at: Apr 12, 2022Updated at: Apr 12, 2022
Positive Parenting: बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए ये हैं 5 पॉजिटिव पेरेंटिंग टिप्स

कई बार आपने सुना होगा कि कपल बच्चे के साथ कैसा व्यवहार करें। इसे बात को लेकर काफी परेशान रहते हैं क्योंकि आप जैसा व्यवहार अपने बच्चे के साथ करते हैं। बच्चा वही सब चीजें अपने भविष्य के लिए दिमाग में बैठा लेता है कि ये चीजें इस तरह से ही काम करती है। लेकिन सकारात्मक पेरेंटिंग सिद्धांत की मदद से आप अपने बच्चे की सही पेरेंटिंग कर सकते हैं और उनके व्यवहार, उनकी बात और उन्हें किसी काम को करने के लिए भी उत्साहित कर सकते हैं। आप पॉजिटिव पेरेंटिंग की मदद से भी बच्चे को अनुशासन सिखा सकते हैं। इसके अलावा बच्चे को गलती करने पर सजा देने की जगह ये समझने की कोशिश भी कर सकते हैं कि उन्होंने ये गलती आखिर क्यों की। गलती होने पर भी आपको अपने बच्चे को प्यार से समझना चाहिए और सजा दें भी तो कोई क्रिएटिव काम करने को कहें। यह बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर कई तरीके फायदेमंद होता है। साथ ही वह इससे बच्चा अपनी मन की सारी बातें आपको बता पाता है और आपकी बातें समझता भी है। आइए इसके फायदे और तरीके के बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं। 

पॉजिटिव पेरेंटिंग के फायदे

1. व्यवहार समस्या

पॉजिटिव पेरेंटिंग की मदद से बच्चों के व्यवहार संबंधित समस्याओं को दूर किया जा सकता है कि कई बार बच्चे स्कूल में दोस्तों के साथ हुई लड़ाई या भाई-बहनों के साथ हुए झगड़े को लेकर परेशान रहते हैं और इस समय शायद वो आपकी बात भी अनसुनी कर दें लेकिन अगर इसके बदले आप भी बच्चे को डांटने या पीटने लगते हैं। इससे उनके मन में गुस्से और नफरत की भावना आने लगती है। इसकी बजाय आप बच्चों से बात करें और उनके व्यवहार पर नजर बनाए रखें ताकि किसी भी प्रकार की दिक्कत या मानसिक परेशानी होने पर आप उनकी मदद कर सकें। 

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2. पेरेंट्स और बच्चों के संबंधों में विकास 

पॉजिटिव पेरेंटिंग की मदद से बच्चे और पेरेंट्स के बीच एक अच्छा रिश्ता बनाता है। जब बच्चे पर अपनी बात थोपने की जगह उनकी बात भी सुनने लगेंगे और उन्हें उनकी समस्याओं में उनके दोस्त बनकर सलाह देंगे या परेशानी दूर करें, तो वे दिल से आपकी बातों को समझेंगे और किसी भी तरह की परेशानी होने पर कोई गलत कदम या चुप रहने की जगह आपसे बात करेंगे। साथ ही इससे एक अच्छा पारिवारिक संबंध भी बनता है। 

3. बेहतर आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य 

जब बच्चे खुलकर अपनी बात पेरेंट्स के सामने रख पाते हैं, तो उनके मन में किसी प्रकार का डर नहीं होता है क्योंकि उन्हें पता होता है कि उनके पेरेंट्स उनके साथ होते हैं। इससे उनके मन में आत्मविश्वास बढ़ता है और विपरीत परिस्थितियों में भी निखार कर बाहर निकलते हैं। वे मानसिक रूप से अधिक लचीले और माता-पिता की बातों को समझने का प्रयास करते हैं। 

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4. स्कूल में भी अच्छा करते हैं

ये स्वाभाविक सी बात है कि जब आपका बच्चा मानसिक रूप से खुश होगा, तो वह अपनी पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों पर अधिक ध्यान देगा। जब आप उन्हें अपना मन का काम करने की आजादी देते हैं, तो वे और बेहतर करके दिखाते हैं और आपको गौरवान्वित भी महसूस करवाते है। पॉजिटिव पेरेंटिंग के कारण आपके बच्चे दूसरों के साथ भी अच्छा व्यवहार करते हैं और समाज में एक बेहतर इंसान बनकर उभरते हैं।

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5. बेहतर सामाजिक क्षमता 

कई बार बच्चों को बड़े और अपने से छोटे के साथ व्यवहार करना नहीं आता है या वह अच्छी तरह से किसी की बातों का जबाव नहीं दे पाते हैं। ऐसे में वे लोगों के साथ किसी तरीके से बात करनी या उनकी बातों को सुनने का तरीका उन्हें या तो नहीं आता है या वे बदमाशी में नहीं करना चाहते हैं लेकिन पॉजिटिव पेरेंटिंग में पले बढ़े बच्चे इन चीजों का तरीका अच्छे से सीखते है। 

इन तरीकों से करें पॉजिटिव पेरेंटिंग 

1. बच्चों के गलत व्यवहार पर ध्यान दें कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। उन्हें मारने या डांटने की बजाय उनसे बात करें। 

2. बच्चों की बातों, उनके व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर उनके प्रति बहुत ज्यादा सख्ती न बरतें और बच्चे को अनुशासन में रखने के लिए सरल और लचीला तरीका अपनाएं। 

3. बच्चों के साथ आयु के अनुसार व्यवहार करें। कई बार माता-पिता अपने बच्चे को अंग्रेजी या बहुत कुछ सिखाने के चक्कर में उनके साथ छोटी उम्र से ही सख्ती बरतने लगते हैं। ऐसे में आपको ये समझना चाहिए कि अगर आपका बच्चा बहुत छोटा है, तो उसके साथ बेहद प्यार और सब्र का साथ व्यवहार करें। 

4. बच्चों के साथ कुछ खुशी के पल जरूर बिताएं। इस दौरान आप उनके साथ खेल सकते हैं या कोई कहानी भी सुना सकते हैं। 

5. बच्चों को हमेशा ज्यादा सुनने की कोशिश करें न कि उन्हें अपनी बात सिर्फ सुनाने के लिए तत्पर रहें। 

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