न्यूरोलॉजिकल डिजीज हैं पैरों में कंपन होना, पार्किंसंस में बदलने से पहले ऐसे करें बचाव

अक्सर उम्रदराज लोगों के पैर में कंपन और पिंडियों में हल्की जलन महसूस की जाती है। हालांकि यह अनुभव किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है। जब हमारे साथ ऐसा होता है तो हम समझते हैं कि हमने ज्यादा काम कर लिया था या कमजोरी की वजह से यह हो रहा है। कई बा

Rashmi Upadhyay
Written by: Rashmi UpadhyayUpdated at: Mar 01, 2019 11:52 IST
न्यूरोलॉजिकल डिजीज हैं पैरों में कंपन होना, पार्किंसंस में बदलने से पहले ऐसे करें बचाव

अक्सर उम्रदराज लोगों के पैर में कंपन और पिंडियों में हल्की जलन महसूस की जाती है। हालांकि यह अनुभव किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है। जब हमारे साथ ऐसा होता है तो हम समझते हैं कि हमने ज्यादा काम कर लिया था या कमजोरी की वजह से यह हो रहा है। कई बार लोग इसे आर्थराइटिस या ऑस्टियोपोरोसिसअगर के लक्षण समझकर बिना डॉक्टर की सलाह के कैल्शियम की दवा लेना शुरू कर देते हैं। अगर आप भी यही समझते हैं तो अपनी इस गलतफहमी को आज ही दूर कर लें। आपको यह बता दें कि पैरों में कंपन, खिंचाव या दर्द की शिकायत न्यूरोलॉजिकल डिज़ीज़ के लक्षण होते हैं। डॉक्टर्स का कहना है कि जब शरीर में आयरन और विटामिन बी-12 की कमी हो जाती है तो यह समस्या होने लगती है। सही समय पर उपचार न होने के कारण या उम्र बढ़ने के बाद यही समस्या पार्किंसंस में तब्दील हो सकती है। इसलिए इसके लक्षणों को पहचान कर सही समय पर उपचार बेहद ज़रूरी है।

क्या है वजह 

सामान्य अवस्था में पैरों की मांसपेशियों और जोड़ों को सक्रिय बनाए रखने के लिए ब्रेन से न्यूरोट्रांस्मीटर्स के ज़रिये विद्युत तरंगों का प्रवाह होता है। बैठने या लेटने की स्थिति में स्वाभाविक रूप से यह प्रवाह अपने आप रुक जाता है लेकिन जब ब्रेन से विद्युत तरंगें लगातार प्रवाहित हो रही होती हैं तो लेटने या बैठने पर भी पैरों में कंपन जारी रहता है। दरअसल ब्रेन से निकलने वाला हॉर्मोन डोपामाइन इन तरंगों के प्रवाह को नियंत्रित करता है और इसकी कमी से लगातार इन तरंगों का प्रवाह उसी ढंग से हो रहा होता है, जैसे नल को ठीक से बंद न करने पर उससे लगातार पानी की बूंदें टपकती रहती हैं।

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इसके अलावा डायबिटीज़ और किडनी के मरीज़ों को भी ऐसी समस्या हो सकती है। प्रेग्नेंसी के दौरान भी कुछ स्त्रियों को ऐसी दिक्कत होती है, जो डिलिवरी के बाद अपने आप दूर हो जाती है। शरीर में हॉर्मोन संबंधी असंतुलन की वजह से भी उन्हें ऐसी समस्या होती है। हाई ब्लडप्रेशर के मरीज़ों में भी कई बार ऐसे लक्षण देखने को मिलते हैं। कई बार आनुवंशिक कारण भी इस समस्या के लिए जि़म्मेदार होते हैं। आयरन और विटमिन बी-12 की कमी भी इसकी प्रमुख वजह है।

क्या हैं इसके लक्षण

वैसे तो यह समस्या किसी को भी हो सकती है लेकिन आमतौर पर चालीस वर्ष की आयु के बाद ही इसके लक्षण नज़र आते हैं। आथ्र्राइटिस की तरह इसमें भी पैरों में दर्द होता है लेकिन रेस्टलेस लेग सिंड्रोम होने पर दर्द के साथ कंपन, झनझनाहट और बेचैनी महसूस होती है। इससे नींद भी बाधित होती है। व्यक्ति को ऐसा लगता है कि उसके पैरों के भीतर कुछ रेंग रहा है और उन्हें हिलाने से उसे थोड़ा आराम मिलता है। इसलिए ऐसे मरीज़ अनजाने में ही अपने पैर हिला रहे होते हैं। सोने या बैठने पर तकलीफ और ज्य़ादा बढ़ जाती है लेकिन उठकर चलने पर थोड़ी राहत महसूस होती है। जबकि आथ्र्राइटिस की स्थिति में सुबह सोकर उठने के बाद व्यक्ति के पैरों में तेज़ दर्द होता है और रात को लेटने पर आराम मिलता है।

उपचार एवं बचाव

  • अपने भोजन में हरी पत्तेदार सब्जि़यों, अंडा, चिकेन और मिल्क प्रोडक्ट्स को प्रमुखता से शामिल करें। 
  • एल्कोहॉल एवं सिगरेट से दूर रहें क्योंकि इनके अत्यधिक सेवन से डोपामाइन की कमी हो जाती है, जिससे रेस्टलेस लेग सिंड्रोम की समस्या हो सकती है। 
  • दर्द होने पर तात्कालिक राहत के लिए पैरों की मालिश भी कारगर साबित होती है पर यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। 
  • इससे संबंधित कोई भी लक्षण दिखाई दे तो बिना देर किए डॉक्टर से सलाह लें और उसके सभी निर्देशों का पालन करें। आमतौर पर डोपामाइन हॉर्मोन का स्तर बढ़ाने वाली दवाओं के नियमित सेवन से यह बीमारी दूर हो जाती है।

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