कोरोना मरीजों को रिकवरी के बाद भी आ रही हैं कुछ समस्याएं, महीनों तक सांस में तकलीफ और जबरदस्त थकान है कॉमन

कोरोना वायरस से ठीक होने के 3-4 महीने बाद भी बहुत सारे मरीजों में सांस में तकलीफ, थकान और हाथ-पैरों में झुनझुनाहट जैसी समस्याएं रिपोर्ट की जा रही हैं।

Anurag Anubhav
Written by: Anurag AnubhavPublished at: Sep 14, 2020
कोरोना मरीजों को रिकवरी के बाद भी आ रही हैं कुछ समस्याएं, महीनों तक सांस में तकलीफ और जबरदस्त थकान है कॉमन

कोरोना वायरस का संक्रमण भी फैलता जा रहा है और लगभग उसी दर से लोग ठीक भी हो रहे हैं। इसका कारण यह है कि कोरोना वायरस के ज्यादातर मरीजों को गंभीर समस्याएं नहीं हो रही हैं, बल्कि सामान्य समस्याएं जैसे- बुखार, गले में तकलीफ, खांसी, जुकाम, शरीर में दर्द आदि समस्याएं हो रही हैं। ऐसे में संक्रमित होने के बाद मरीज या तो चिकित्सकीय देखरेख में अपने घर पर ही या फिर अस्पताल में 10-15 दिन में ठीक हो जाते हैं। इसी सब के बीच वैज्ञानिकों का एक खास अध्ययन आपको चौंका देगा। एक नई स्टडी के मुताबिक कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज के पूरी तरह ठीक हो जाने के कई महीनों बाद भी उनका शरीर पूरी तरह नॉर्मल नहीं होता है और उन्हें कुछ छोटी-मोटी समस्याएं होती रहती हैं।

coronavirus after recovery

ठीक होने के 4-5 महीने बाद तक कई समस्याएं

नए अध्ययन के मुताबिक कोरोना वायरस के बहुत सारे मरीजों को बीमारी से ठीक होने के 4-5 महीने बाद तक सांस लेने में तकलीफ, हाथ और तलवों में झुनझुनाहट, तेज हार्ट बीट और दिनभर थकान जैसे कई लक्षण परेशान कर रहे हैं। आमतौर पर ये समस्या उन मरीजों में ज्यादा देखने को मिल रही है, जिनका संक्रमण गंभीर स्थिति तक पहुंच गया था।

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लक्षण कितने दिन रहते हैं, इस पर फिर से करना पड़ेगा विचार

आमतौर पर शुरुआती अध्ययनों में बताया गया कि कोरोना वायरस के लक्षण शरीर में 7 से 21 दिन तक बने रहते हैं। ज्यादातर लोग 14 दिन बाद निगेटिव हो जाते हैं। लेकिन कोविड मरीजों में रिकवरी के बाद भी समस्याओं के लगातार आते मामले इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि इलाज के बाद 14 से 21 दिन में भले ही कोरोना वायरस शरीर में निष्क्रिय हो जाए और मरीज की रिपोर्ट निगेटिव आ जाए, लेकिन उसके शरीर पर इस वायरस का प्रभाव लंबे समय तक भी रह सकता है। ऐसे मरीजों को वैज्ञानिक "long haulers" कह रहे हैं।

हॉस्पिटल रिलीज के 12 सप्ताह बाद भी कुछ लक्षण बने हैं

अध्ययन के मुताबिक कोरोना वायरस के कारण हॉस्पिटल में भर्ती होने वाले तीन चौथाई मरीज "long haulers" हो जा रहे हैं। इसका मतलब है कि आधे से भी ज्यादा मरीजों में रिकवरी के बाद ये समस्याएं देखी जा रही हैं। अध्ययन के मुताबिक हॉस्पिटल से ठीक होकर लौटने के 12 सप्ताह बाद भी 74% मरीजों को सांस लेने में तकलीफ, बहुत ज्यादा थकान जैसी समस्याएं हो रही थीं। इनमें से 12% मरीजों के सीने की एक्स-रे रिपोर्ट भी सामान्य नहीं थी और 10% मरीज ऐसे भी थे जिनमें स्पायरोमेट्री टेस्ट के दौरान फेफड़े ठीक से काम करते नहीं मिले।

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long term effects of coronavirus

ऑटोमैटिक बॉडी फंक्शन में आ रही हैं समस्याएं

कोरोना वायरस संक्रमण हार्ट और फेफड़ों पर तो असर डालता ही है, साथ ही ये व्यक्ति में कई न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी पैदा कर देता है। यही कारण है कि रिपोर्ट निगेटिव होने के बाद मरीज कोरोना वायरस से तो मुक्त हो जाता है लेकिन शरीर में इस वायरस के द्वारा किए गए न्यूरोलॉजिकल नुकसान को शरीर तुरंत नहीं भर पाता है। इसीलिए कोरोना वायरस से ठीक हो चुके "long haulers" मरीजों को होने वाली इस परेशानी को डॉक्टर्स डिसऑटोनोमिया (dysautonomia) कह रहे हैं। इस समस्या के कारण शरीर में ऑटोमैटिक होने वाले फंक्शन जैसे- सांस लेना, नींद, डाइजेशन आदि प्रभावत होते हैं। अलग-अलग मरीजों में अलग-अलग लक्षण दिखते हैं।

कुल मिलाकर कोरोना वायरस के बारे में अभी भी बहुत कुछ है, जो हमें नहीं पता है क्योंकि ये वायरस अभी नया नया है। वैज्ञानिक लगातार इस वायरस के बारे में खोजबीन कर रहे हैं और बीतते वक्त के साथ नई-नई जानकारियां सामने आती जा रही हैं। इसलिए कोरोना वायरस को गंभीरता से लेना बहुत जरूरी है क्योंकि लंबे समय में इसके प्रभाव के बारे में हम नहीं जानते हैं।

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