Fri Sep 11, 2026 | 06:53 PM IST

Medically Reviewed by Dr Shobha Gupta , Medical Director and IVF Consultant

शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग होना कब सामान्य है कब नहीं? जानें डॉक्टर के पास जाने का सही समय

शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग होना कुछ मामलों में सामान्य हो सकता है, तो कुछ मामलों में यह चिंता का विषय भी है। यहां हम आपको इन दोनों स्थितियों को गहराई से समझा रहे हैं। यह भी जानें कि डॉक्टर के पास जाने का सही समय क्या है?

प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही में स्पॉटिंग के बारे में सोचते ही ज्यादातर महिलाएं परेशान हो जाती हैं, क्योंकि इसे मिसकैरेज से जोड़कर देखा जाता है। जबकि, हमेशा ऐसा सोचा जाना सही नहीं है। हकीकत बात यह है कि शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग होना बेहद आम बात है। ऐसी महिलाओं की संख्या काफी ज्यादा है, जिन्हें शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग हुई है। कभी-कभी ऐसा इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग के कारण होता है, जो कि पूरी तरह नॉर्मल है। आइए, इस लेख में वृंदावन स्थित Mumma's Blessing IVF और Birthing Paradise की मेडिकल डायरेक्टर, गायनेकोलॉजिस्ट और IVF स्पेशलिस्ट डॉ. शोभा गुप्ता से जानते हैं कि शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग होना कब नॉर्मल है और कब नहीं?

शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग कब नॉर्मल होती है?

When Is Spotting Normal In Early Pregnancy 01 (1)

Acta Obstetricia Et Gynecologica Scandinavica के अनुसार, कई महिलाएं शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग का सामना करती हैं, लेकिन इसका मिसकैरिज से ही संबंध हो, यह जरूरी नहीं है। कई ऐसे फैक्टर्स हैं, जिनकी वजह से शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग हो सकती है, जो कि सामान्य भी हैं, जैसे-

इम्प्लांटेशन ब्लीडिंगः NHS के अनुसार प्रेग्नेंसी की शुरुआत में इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग हो सकती है। दरअसल, जब फर्टिलाइज्ड एग गर्भाशय की दीवार यानी यूट्रस लाइनिंग से जुड़ता है, तो हल्की स्पॉटिंग हो सकती है। सामान्यतः ऐसा कंसीव करने के 10 से 14 दिनों के भीतर होता है। आमतौर पर पीरियड्स की संभावित तारीख के आसपास ऐसा देखने को मिलता है। इन दिनों होने वाली स्पॉटिंग अलग होती है। इसका रंग हल्का गुलाबी या भूरा होता है और स्पॉटिंग 1-2 दिनों में अपने आप बंद हो जाती है।

हार्मोनल बदलावः कंसीव करने के बाद से ही महिला के शरीर में तरह-तरह के हार्मोनल बदलाव होने शुरू हो जाते हैं। इसका एक कारण यह है कि प्रेग्नेंसी की शुरुआत में शरीर में प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन का स्तर बहुत तेजी से बदलता है, जिससे हल्की स्पॉटिंग होने लगती है और यह पूरी तरह सामान्य है। इसे लेकर महिलाओं को चिंतित होने की जरूरत नहीं है।

सेंसिटिव सर्विक्सः डाॅ. शोभा गुप्ता कहती हैं, "प्रेग्नेंसी के शुरुआत में सर्विक्स बहुत ज्यादा सेंसिटिव हो जाता है और इन्हीं दिनों महिला के शरीर में ब्लड फ्लो बढ़ जाता है। ऐसे में कुछ महिलाओं में स्पॉटिंग देखी जाती है। ऐसा होना कॉमन है। कुछ मामलों में महिलाओं को हल्की ब्लीडिंग भी हो सकता है। विशेषकर, यौन संबंध बनाने या या पेल्विक/अल्ट्रासाउंड जांच के बाद हल्का गुलाबी या भूरा डिस्चार्ज होना सामान्य है।"

डेसिड्यूअल रिएक्शनः गर्भावस्था के शुरुआत में ही हार्मोनल बदलाव के कारण गर्भाशय की अंदरूनी परत मोटी और पोषक तत्वों से भर जाती है, ताकि शिशु के विकास को पूरा सपोर्ट मिल सके। इसी प्रक्रिया को डेसिड्यूअल रिएक्शन कहा जाता है। डाॅ. शोभा गुप्ता बताती हैं, "कभी-कभी, जब भ्रूण गर्भाशय की दीवार से जुड़ता है या शुरुआती हफ्तों में हार्मोनल उतार-चढ़ाव के कारण महिला को स्पॉटिंग या हल्की ब्लीडिंग हो सकती है।"

इसे भी पढ़ें: प्रेग्नेंसी के शुरुआती दिनों में कौन से लक्षण सामान्य होते हैं और कौन से नहीं? बता रही हैं डॉक्टर

प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग कब नॉर्मल नहीं है?

सामान्यतः शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग होना नॉर्मल होता है, लेकिन कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिसकी अनदेखी करना सही नहीं है, क्योंकि यह अंदरूनी जटिलताओं का संकेत हो सकता है, जैसे-

  • गर्भपात का खतराः आपको जानकर हैरानी होगी कि गर्भपात का सबसे ज्यादा खतरा प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही में ही होता है। गर्भपात होने पर पहली तिमाही में महिला को स्पॉटिंग या हैवी ब्लीडिंग होने लगती है। यह खून गाढ़ा होता है और पेट या कमर के निचले हिस्से में तेज ऐंठन और मरोड़ होने लगती है।
  • एक्टोपिक प्रेग्नेंसीः जब भ्रूण गर्भाशय में न ठहर कर बाहर जैसे फैलोपियन ट्यूब में इम्प्लांट हो जाता है, तो इस स्थिति को एक्टोपिक प्रेग्नेंसी कहा जाता है। यह एक जानलेवा स्थिति होती है। इस तरह की प्रेग्नेंसी होने पर पेट के एक तरफ तेज दर्द, चक्कर आना, कंधे में दर्द और ब्लीडिंग होती है। American College of Obstetricians & Gynecologists के अनुसार, एक्टोपिक प्रेग्नेंसी के कारण शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग हो सकती है।
  • मोलर प्रेग्नेंसीः यह एक दुर्लभ कंडीशन है, जिसमें गर्भाशय के अंदर एक स्वस्थ प्लेसेंटा और भ्रूण बनने के बजाय मांस का असामान्य गुच्छा बनने और बढ़ने लगता है, जो कि अंगूर के आकार का होता है। यह प्रेग्नेंसी लगती है, लेकिन होती नहीं है। इस स्थिति में भी महिला को शुरुआती हफ्तो में ब्लीडिंग होने लगती है।
  • संक्रमणः अगर किसी को महिला को कंसीव करने के बाद सर्विक्स या वजाइना से जुड़ा किसी प्रकार का बैक्टीरियल या यूरिनरी इंफेक्शन हो जाए, तो भी उन्हें ब्लीडिंग हो सकती है। हालांकि, इसके साथ-साथ उन्हें बदबूदार डिस्चार्ज और जलन भी हो सकती है।

इसे भी पढ़ें: प्रेग्नेंसी में सेक्स के बाद स्पॉटिंग हो तो क्या करें? डॉक्टर की इस सलाह को न करें नजरअंदाज

डॉक्टर के पास कब जाएं?

कंसीव करने के बाद आपको स्पॉटिंग हल्के में लेने के बजाय शरीर में दिख रहे सभी लक्षणों पर गौर करें। यहां हम उन्हीं लक्षणों के बारे में बता रहे हैं, इन्हें जानकर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं-

  • कंसीव करने के बाद हैवी ब्लीडिंग होना।
  • एक घंटे में दो या इससे अधिक पैड का उपयोग करना।
  • पेट के एक हिस्से में तीव्र दर्द महसूस होना।
  • स्पॉटिंग के साथ-साथ चक्कर आना और असहज महसूस करना।
  • बुखार और कंपकंपी छूटना।
  • योनि से रक्त के थक्के बाहर निकलना।

निष्कर्ष

प्रेग्नेंसी बहुत ही संवेदनशील दौर होता है। इस समय महिला के शरीर में जरा सा भी बदलाव उन्हें डरा सकता है। विशेषक, ब्लीडिंग होना या स्पॉटिंग होना उनके लिए चिंता का विषय हो जाता है। हालांकि, महिलाओं को इससे डरना नहीं चाहिए। उन्हें यह पता होना चाहिए कि प्रेग्नेंसी के शुरुआती दिनों में तरह-तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं, जो स्पॉटिंग हो सकती है। हां, अगर ब्लीडिंग हैवी है, तो इसे इग्नोर न करें और तुंरत डॉक्टर के पास जाएं।

All Image Credit: Magnific

FAQ

  • क्या शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग होने पर महिला को बेड रेस्ट करना चाहिए?

    यह महिला के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। अगर डॉक्टर ने उन्हें रेस्ट करने के लिए कहा हो, तो उन्हें आराम करना चाहिए।
  • शुरुआती प्रेग्नेंसी में स्पॉटिंग और नॉर्मल पीरियड की ब्लीडिंग के बीच अंतर कैसे पहचानें?

    स्पॉटिंग होने पर सिर्फ कुछ बूंदें, हल्का गुलाबी या भूरा डिस्चार्ज नजर आता है। यह 1-2 दिनों में रुक जाता है। इसके विपरीत, पीरियड्स में लाल रंग का गाढ़ा ब्लड फ्लो होता है, जो 3 से 7 दिनों तक चलता है।

Read Next

प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही में कौन-से टेस्ट और स्कैन करने जरूरी होते हैं? जानें डॉक्टर से

Disclaimer

इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

Meera Tagore

Meera Tagore

Senior Sub Editor

मीरा टैगोर 2009 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और पिछले 5 वर्षों से विशेष रूप से हेल्थ जर्नलिज्म पर काम कर रही हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealthमें सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं। वह महिला स्वास्थ्य और यौन स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषयों पर लिखती हैं और इनसे जुड़ी जानकारी को प्रमाणित स्रोतों और रिसर्च के आधार पर सटीक और सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश करती हैं। जिन विषयों में मेडिकल पुष्टि जरूरी होती है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की थी और OnlyMyHealth से पहले Image Reflection Centre, Haribhoomi और MyUpchar के साथ काम कर चुकी हैं।

Read More..

How we keep this article up to date:

We work with experts and keep a close eye on the latest in health and wellness. Whenever there is a new research or helpful information, we update our articles with accurate and useful advice.

  • Current Version

    Sep 03, 2026 17:57 IST

    Published By : Meera Tagore
    Reviewed By : Dr Shobha Gupta

Medically reviewed content
200+ medical reviewers in network
17 Years of Trusted Health Content
Medically reviewed content
200+ medical reviewers in network
17 Years of Trusted Health Content
Medically reviewed content
200+ medical reviewers in network
17 Years of Trusted Health Content