गर्भावस्था की शुरुआत यानी पहला ट्राइमेस्टर मां और बच्चे, दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान होने वाली जांचों का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं है कि गर्भ में भ्रूण ठीक तरह से विकसित हो रहा है या नहीं, बल्कि मां की सेहत, गर्भावस्था की सही अवधि और कुछ संभावित जोखिमों की समय रहते पहचान करना भी है। हालांकि, हर गर्भवती महिला के लिए सभी जांचें एक जैसी नहीं होतीं। उम्र, पिछली गर्भावस्था, मेडिकल हिस्ट्री और डॉक्टर के आकलन के आधार पर टेस्ट अलग हो सकते हैं।
वृंदावन स्थित Mumma's Blessing IVF और Birthing Paradise की मेडिकल डायरेक्टर, गायनेकोलॉजिस्ट और IVF स्पेशलिस्ट डॉ. शोभा गुप्ता के अनुसार, "पहली तिमाही में जांचों को लेकर सबसे जरूरी बात यह है कि महिला बिना जरूरत टेस्ट की लंबी सूची के पीछे न भागे। शुरुआती जांच का मकसद प्रेग्नेंसी को सही तरह से जांचना, मां की सामान्य स्वास्थ्य स्थिति देखना और ऐसे जोखिमों की पहचान करना है, जिन पर समय रहते कदम उठाया जा सकता है।"
6-8 सप्ताह के आसपास पहला अल्ट्रासाउंड
blood tests and genetic scans 01 (1)
गर्भावस्था की पुष्टि के बाद डॉक्टर जरूरत के अनुसार शुरुआती अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दे सकते हैं। इससे यह देखा जाता है कि गर्भ गर्भाशय के भीतर है या नहीं, भ्रूण की मौजूदगी और उसकी धड़कन कैसी है तथा गर्भावस्था की अवधि कितनी है? पहली तिमाही में अल्ट्रासाउंड से गर्भ की उम्र निर्धारित करना काफी सटीक माना जाता है। Ultrasonography के अनुसार, पहली तिमाही में अल्ट्रासाउंड करना बहुत जरूरी होता है।
जिन महिलाओं को पेट में दर्द या रक्तस्राव जैसी समस्या हो या जिनकी प्रेग्नेंसी में बहुत ज्यादा जोखिम हो, उनमें डॉक्टर इससे पहले भी जांच की सलाह दे सकते हैं।
शुरुआती ब्लड टेस्ट क्यों जरूरी?
Cleveland Clinic के अनुसार, शुरुआती ब्लड टेस्ट बहुत जरूरी है। इससे शिशु और मां की सेहत की सटीक जानकारी मिलती है। पहली एन टी नेटल जांच में आमतौर पर मां की सामान्य स्वास्थ्य स्थिति जानने के लिए कई ब्लड टेस्ट्स किए जाते हैं। इनमें हीमोग्लोबिन/CBC, ब्लड ग्रुप और Rh factor, ब्लड शुगर, HIV, हेपेटाइटिस बी और सिफलिस जैसी संक्रमण संबंधी जांचें शामिल हो सकती हैं। महिला की मेडिकल हिस्ट्री के अनुसार यूरिन एग्जामिनेशन तथा अन्य जांचें भी जोड़ी जा सकती हैं।
थायरॉयड की जांच भी महत्वपूर्ण है। The Journal of Obstetrics and Gynecology of India के अनुसार, पहली एन टी नेटल विजिट पर गर्भवती महिलाओं में TSH की जांच की जानी चाहिए।
भारत में हेमोग्लोबिनोपैथीज, खासकर थैलेसीमिया कैरियर (Thalassemia Carrier) स्टेटस की पहचान के लिए Hb HPLC जैसी जांच भी शुरुआती प्रेग्नेंसी में महत्वपूर्ण हो सकती है।
11-13+6 सप्ताह: NT स्कैन
पहली तिमाही की सबसे महत्वपूर्ण जांचों में NT यानी नुचल ट्रांस्लूसेंसी (Nuchal Translucency) स्कैन शामिल है। इसमें भ्रूण की गर्दन के पीछे मौजूद तरल की मोटाई मापी जाती है। यह जांच क्रोमोसोमल अब्नोर्मलिटीज (chromosomal abnormalities) जैसे डाउन सिंड्रोम के जोखिम का आकलन करने में मदद करती है। हालांकि, NT scan कोई अंतिम डायग्नोसिस नहीं है। इसी समय प्रेग्नेंसी की तारीख, भ्रूण का विकास और कुछ शुरुआती स्ट्रक्चरल असामान्यताएं भी देखी जा सकती हैं।
डबल मार्कर या NIPT- क्या दोनों जरूरी हैं?
पहली तिमाही में क्रोमोसोमल असामान्यताओं की जांच के लिए NT स्कैन के साथ ब्लड-बेस्ड स्क्रीनिंग, जैसे Double Marker, एक विकल्प हो सकता है। इसमें कुछ biochemical markers के आधार पर जोखिम का अनुमान लगाया जाता है। भारतीय गाइडलाइन्स में पहली तिमाही में NT स्कैन और डबल-मार्कर को डाउन सिंड्रोम स्क्रीनिंग के विकल्प के रूप में बताया गया है।
वहीं, NIPT/cfDNA मां के खून से भ्रूण में कुछ कॉमन क्रोमोसोमल असामान्यताएं के जोखिम की स्क्रीनिंग व जांच करता है। मौजूदा American College of Obstetricians and Gynecologists गाइडेंस के अनुसार cfDNA trisomy 21, 18 और 13 के लिए सबसे संवेदनशील और विशिष्ट स्क्रीनिंग टेस्ट्स में से एक है, लेकिन यह डायग्नोस्टिक टेस्ट नहीं है।
इसलिए हर महिला को डबल मार्कर और NIPT दोनों कराने की जरूरत नहीं होती। डॉक्टर उम्र, प्रेग्नेंसी हिस्ट्री , अल्ट्रासाउंड फाइंडिंग्स (Ultrasound Findings) और व्यक्तिगत जोखिम को देखते हुए उपयुक्त जांचे विकल्प चुनने में मदद करते हैं।
क्या हर महिला को सभी टेस्ट कराने चाहिए?
डॉ. शोभा गुप्ता कहती हैं, "प्रेग्नेंसी में ज्यादा टेस्ट करवाना हमेशा बेहतर देखभाल का संकेत नहीं है। सही समय पर सही जांच ज्यादा महत्वपूर्ण है। कोई स्क्रीनिंग टेस्ट एब्नार्मल आने पर घबराने के बजाय उसका अर्थ डॉक्टर से समझना चाहिए, क्योंकि स्क्रीनिंग केवल जोखिम बताती है, बीमारी की पुष्टि नहीं करती।"
अगर Screening में किसी क्रोमोसोमल अब्नोर्मलिटी का जोखिम अधिक आता है, तो जेनेटिक काउंसलिंग और जरूरत पड़ने पर डायग्नोस्टिक टेस्ट्स जैसे सी वी एस की सलाह दी जा सकती है। ऐसे इनवेसिव टेस्ट्स हर गर्भवती महिला के लिए Routine Tests नहीं हैं!
पहली तिमाही में की गई जांचें आगे की प्रेग्नेंसी केयर की दिशा तय करने में मदद करती हैं। लेकिन सामान्य रिपोर्ट आने का मतलब यह नहीं है कि आगे की जांचों की जरूरत खत्म हो गई। दूसरी तिमाही में डिटेल्ड अनोमली स्कैन भी जरूरी होता है, जो आमतौर पर 18-22 सप्ताह के बीच किया जाता है।
डॉक्टर की सलाह
डॉ. शोभा गुप्ता का कहना है, "पहली तिमाही को केवल जी मिचलाना, मतली या उल्टी और हार्मोनल बदलाव का दौर समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नियमित एंटीनेटल कंसल्टेशन (Antenatal Consultation) , बैलेंस्ड डाइट, बताए गए सप्लीमेंट्स और समय पर जांचें स्वस्थ प्रेग्नेंसी की नींव तैयार करती हैं।"
निष्कर्ष
प्रेग्नेंसी के दौरान जो जांचें आवश्यक होती हैं, उन्हें नियमित रूप से करवाते रहना चाहिए। हालांकि, हर महिला का शरीर अलग होता है, मेडिकल हिस्ट्री अलग होती है और प्रेग्नेंसी से जुड़ी जटिलताएं भी अलग-अलग होती हैं। इसी आधार पर महिलाओं को जांच की सलाह दी जाती है। अगर महिला पूरी तरह स्वस्थ है, गर्भवस्थ शिशु का सही तरह से विकास हो रहा है, तो अनावश्यक जांच नहीं करवाई जाती है। सामान्यतः गर्भवती महिला को कौन से जांच करने हैं, इस बारे में सटीक जानकारी डॉक्टर दे सकते हैं।
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FAQ
पहली तिमाही के दौरान फॉलिक एसिड सप्लीमेंट क्यों आवश्यक माना जाता है?
फॉलिक एसिड लेने से शिशु में न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट्स (मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी जन्मजात जन्म दोष) के जोखिम को 70 फीसदी तक कम किया जा सकता है।क्या पहली तिमाही में ब्लड टेस्ट के दौरान खाली पेट रहना जरूरी होता है?
अगर फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट करना है, तो 8 से 10 घंटे की फास्टिंग जरूरी होती है। हालांकि, CBC, ब्लड ग्रुपिंग और वायरल मार्कर्स के लिए भूखे पेट रहने की आवश्यकता नहीं होती।
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Aug 28, 2026 17:57 IST
Published By : Meera Tagore
Reviewed By : Dr Shobha Gupta
