Lancet में प्रकाशित जर्नल के अनुसार, दुनियाभर में PCOS (Polycystic Ovary Syndrome) का नाम बदलकर अब PMOS (Polyendocrine Metabolic Ovarian Syndrome) रखा गया है। नाम बदलने के पीछे एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे महिलाओं को इस गंभीर बीमारी को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी। दरअसल, PCOS के कारण लोग इसे सिर्फ ओवरी से जुड़ी बीमारी मानते हैं, जबकि यह बीमारी गंभीर हार्मोनल और मेटाबोलिक डिसऑर्डर है, जिसका असर शरीर के कई हिस्सों पर पड़ता है।
PCOS से PMOS करने की वजह?
Lancet की इस जर्नल में बताया गया है कि दुनियाभर में रिप्रोडक्टिव उम्र के दौरान करीब 17 करोड़ महिलाएं PCOS से प्रभावित होती हैं। जब रिसर्च की गई तो एक्सपर्ट्स ने माना कि PCOS नाम की वजह से कई महिलाओं में इस बीमारी की पहचान देर से हुई है और इस बीमारी से महिलाओं को होने वाली मानसिक और हार्मोनल दिक्कतों को इग्नोर कर दिया जाता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि पॉलीसिस्टिक शब्द गलत है, क्योंकि इस कंडीशन में ओवरी पर कोई असामान्य सिस्ट नहीं होते, बल्कि अरेस्टेड फॉलिकल्स होते हैं। इसका मतलब है कि हार्मोनल असंतुलन के कारण अंडे पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाते। इस वजह से PCOS से PMOS रखने के लिए सात महाद्वीपों के एक्सपर्ट्स और मरीजों के बीच 14 साल तक काम किया गया और अब इसे PMOS करने का फैसला लिया गया है।
भारत में एक्सपर्ट्स की राय
Dr. Pooja C Thukral, Obstetrician and Gynaecologist, Cloudnine Group of Hospitals, Faridabad कहती हैं, “PCOS से PMOS करने का उद्देश्य महिलाओं में जागरूकता बढ़ाना है, ताकि वे इसे पीरियड्स की समस्या या ओवरी डिजीज न समझे। अगर इस बीमारी का समय पर इलाज नहीं होता, तो इससे भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट की बीमारियां, इनफर्टिलिटी, स्लीप डिसऑर्डर और मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याओं का रिस्क बढ़ सकता है। महिलाओं को खासतौर पर सोशल मीडिया के ट्रेंड्स के बजाय डॉक्टर्स से सलाह लेनी चाहिए, ताकि मेटाबोलिक डिस्ऑडर का इलाज हो सके।”
वहीं Dr. Ritu Hinduja, Clinical Director & Senior Fertility Specialist - Department of Fertility, Cloudnine Group of Hospitals, Mumbai का कहना है, "महिलाओं की हार्मोनल और मेटाबोलिक सेहत को सही तरीके से देखने की जरूरत है और नाम के बदलाव से इलाज को प्रभावी तरीके से मैनेज करने में मदद मिलेगी। PMOS महिलाओं में ओव्यूलेशन को प्रभावित कर सकता है, जिससे प्रेग्नेंसी में दिक्कत आ सकती है। इसलिए अब लाइफस्टाइल में बदलाव करके और अंडों की क्वालिटी को बेहतर करके महिलाएं सफलतापूर्वक गर्भधारण कर सकती हैं।"

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PMOS का भारत में असर
भारत में PCOS यानी PMOS के मामले में काफी तेजी से बढ़ रहे हैं और मुश्किल यह है कि कई महिलाओं को इस बीमारी के बारे में समय पर पता नहीं चलता। साल 2025 के Reproductive Health में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर की 18 से 25 साल की 1,164 कॉलेज छात्राओं पर PMOS को लेकर अध्ययन किया गया। स्टडी में बताया गया है कि दिल्ली-एनसीआर में PMOS (PCOS) 17.40% महिलाओं में पाया गया। दिलचस्प बात यह है कि 29.70% महिलाओं को PMOS का पता स्टडी के दौरान लगा। स्टडी में यह भी बताया गया कि पश्चिमी देशों और अन्य एशियाई देशों के मुकाबले, भारतीय महिलाओं में PMOS के मामले ज्यादा पाए गए हैं।
PCOS का नाम कब तक पूरी तरह से बदल जाएगा?
Lancet में बताया गया है कि नया नाम PMOS को पूरी तरह से लागू करने में तीन साल का समय लगेगा। इसे साल 2028 के अंतर्राष्ट्रीय अपडेट में पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। इस दौरान मेडिकल से जुड़े एक्सपर्ट्स, सरकारों और रिसर्चर्स के लिए एक शिक्षा अभियान चलाने की तैयारी है।
निष्कर्ष
PCOS का नाम बदलकर PMOS करने से महिलाओं को अब इस बीमारी को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी और इससे जुड़ी जटिलताओं की जल्द से जल्द पहचान होगी, ताकि महिलाओं का समय पर सही इलाज हो सके।
FAQ
क्या नया नाम आने से इलाज बदल जाएगा?
नाम बदलने से इलाज करने की एप्रोच में सुधार होगा। अब डॉक्टर सिर्फ ओवरी के बजाय मरीज के मेटाबॉलिज्म, वजन और मानसिक स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देंगे।क्या PMOS के कारण मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है?
PMOS से जूझ रही महिलाओं को एंग्जायटी और डिप्रेशन का रिस्क ज्यादा हो सकता है।
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May 13, 2026 12:47 IST
Modified By : Aneesh Rawat May 13, 2026 12:47 IST
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Published By : Aneesh Rawat