माइग्रेन एक किस्म का सिरदर्द है, जो न्यूरोलॉजिक समस्याओं से संबंध रखता है। आमतौर पर माइग्रेन सिर के एक हिस्से में होता है। यह दर्द काफी तीव्र और चुभन जैसा महसूस होता है। कुछ लोगों में माइग्रेन होने पर मतली, उल्टी और रोशनी तथा ध्वनि के प्रति अत्यधिक सेंसिटिविटी जैसी परेशानियां बढ़ जाती हैं। माइग्रेन का दर्द कुछ घंटों से लेकर कई दिनों तक बना रह सकता है। कुछ मामलों में तो यह दर्द इतना तीव्र और असहनीय हो जाता है कि व्यक्ति रोजमर्रा के कामकाज भी नहीं कर पाता है। सामान्यतः हमें यही लगता है कि माइग्रेन जैसा दर्द सिर्फ वयस्कों को होता है, जबकि ऐसा नहीं है। असल बात यह है कि बच्चे भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। इस लेख में हम यही जानेंगे कि बच्चों को माइग्रेन पेन क्यों होता है, इसका निदान क्या है और इसका इलाज क्या हो सकता है? इस लेख को ग्रेटर नोएडा स्थित सर्वोदय अस्पताल में Director-Neurology डॉ. अभिनव गुप्ता ने रिव्यू किया है।
बच्चों में माइग्रेन पेन क्यों होता है?
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बच्चों में माइग्रेन पेन होने के पीछे कई तरह के कारण जिम्मेदार हैं, जैसे-
तनाव
Headache: The Journal of Head and Face Pain के अनुसार तनाव हर तरह की शारीरिक-मानसिक समस्याओं की जड़ है। यह न सिर्फ वयस्कों को अपनी चपेट में लेता है, बल्कि बच्चों को भी प्रभावित करता है। ऐसा ही माइग्रेन होने की कंडीशन में भी है। बढ़ते तनाव के कारण मांसपेशियों में खिंचाव और माइग्रेन शुरू हो जाता है। डॉक्टरों के अनुसार, तनाव की वजह से शरीर में कोर्टिसोल रिलीज होता है। यह स्ट्रेस हार्मोन है, जिससे सिरदर्द ट्रिगर होता है।
नींद पूरी न होना
Journal of Clinical Medicine की मानें मौजूदा समय में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बढ़ गई है, जो देर रात तक जगते हैं और पर्याप्त नींद नहीं लेते हैं। ऐसा ही बच्चे भी कर रहे हैं। पूरी-पूरी रात मोबाइल स्क्रॉल करते हैं। नींद पूरी न होने की वजह से भी माइग्रेन का खतरा बढ़ जाता है। दरअसल, नींद की कमी सिरदर्द को कंट्रोल करने वाले केमिकल्स जैसे सेरोटोनिन के संतुलन को बिगाड़ देती है।
खराब खान-पान
बच्चों में खानपान की खराब आदतें भी माइग्रेन को ट्रिगर कर सकती हैं। डॉ. अभिनव गुप्ता कहते हैं, “जब बच्चा भोजन छोड़ देता है, कैफीन अधिक लेता है, अजीनोमोटो (MSG) का सेवन अधिक मात्रा में करता है या आर्टिफिशियल शुगर का सेवन ज्यादा करता है, तो इसकी वजह से माइग्रेन ट्रिगर हो सकता है।”
डिहाइड्रेशन
Nutrients Journal के अनुसार, डिहाइड्रेशन भी माइग्रेन का एक कारक है। दरअसल, डिहाइड्रेशन से ब्लड वॉल्यूम कम हो सकता है, जिससे सिरदर्द ट्रिगर होने की संभावना बढ़ जाती है।”
फिजिकल एक्टिविटी
डॉ. अभिनव गुप्ता बताते हैं, “वयस्कों की तरह बच्चों में भी अत्यधिक शारीरिक गतिविधि, थकान, यात्रा या तेज रोशनी के संपर्क में रहने से भी माइग्रेन ट्रिगर हो सकता है। अगर किसी को पहले से ही माइग्रेन की समस्या है, तो दर्द तीव्र और असहनीय हो सकता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि जब बच्चे लंबे समय तक खेलते या बिना ब्रेक के पढ़ाई करते हैं, तो इसकी वजह से उनका शरीर थकान से भर जाता है और तेज रोशनी सीधे ऑप्टिक नर्व पर दबाव डालती है।”
हार्मोनल बदलाव
Seminars in Pediatric Neurology में प्रकाशित स्टडी के अनुसार हार्मोनल बदलाव भी बच्चों में माइग्रेन का एक कारण है। खासकर, किशोर युवतियों में मासिक धर्म की शुरुआत होते ही उनमें हार्मोनल चेंजेस होने लगते हैं। रिपोर्ट की मानें, तो एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर में गिरावट आने से पीरियड्स के दौरान या उससे पहले माइग्रेन का दर्द हो सकता है। हालांकि, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्यूबर्टी से पहले बच्चों को माइग्रेन होने का खतरा कम होता है।
अन्य कारक
मौसम में बदलाव, गर्मी का बढ़ना, अनुवांशिक, बहुत ज्यादा शोर के आसपास रहना, अपने रेगुलर रूटीन में बदलाव करना भी माइग्रेन को बढ़ा सकता है।
बच्चों में माइग्रेन के लक्षण

बच्चों में माइग्रेन होने पर सिर्फ सिरदर्द नहीं होता है। इसके साथ-साथ कई अन्य परेशानियां भी हो सकती हैं। यहां हम आपको बता रहे हैं बच्चों में नजर आने वाले माइग्रेन के अन्य लक्षणों के बारे में-
- सिर के दोनों हिस्सों में दर्दः Italian Journal of Pediatrics की मानें तो वयस्कों में देखा जाता है कि माइग्रेन होने के पर सिर के एक हिस्से में दर्द होता है। वहीं, बच्चों की बात करें, तो उनके सिर के दोनों हिस्सों में दर्द होता है। यह दर्द चुभता हुआ असहनीय महसूस हो सकता है।
- गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल डिस्ट्रेसः Dove Press Taylor And Francis Journal के अनुसार कई लोगों को हैरानी हो सकती है, लेकिन यह सच है कि गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल डिस्ट्रेस यानी पाचन से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। इसमें मतली, उल्टी, पेट दर्द आदि शामिल हैं। माइग्रेन के कॉमन लक्षणों में हैं।
- संवेदनशीलता का बढ़नाः माइग्रेन होने की वजह से बच्चों में प्रकाश, आवाज और कुछ विशेष किस्म की गंध के प्रति संवेदनशीलता इतनी बढ़ जाती है कि वे उन्हें सिरदर्द ट्रिगर हो जाता है। हमेशा ऐसा हो यह जरूरी नहीं है, लेकिन कुछ मामलों में ऐसा देखने को मिलता है।
- शारीरिक थकानः माइग्रेन में दर्द होने के साथ-साथ रोजमर्रा के कामकाज करना भी काफी मुश्किल हो जाता है। ऐसी कंडीशन में बच्चों के चेहरे पर थकान, कमजोरी, चिड़चिड़ापन, चक्कर आना और सिर भारी होने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
बच्चों में माइग्रेन कितना कॉमन है?
Cleveland Clinic के अनुसार, माइग्रेन हर उम्र के लोगों को प्रभावित करता है। छोटे बच्चों में भी माइग्रेन हो सकता है, शिशुओं में इसकी पहचान करना कठिन होता है। 7 साल से कम उम्र के लगभग 2.5 फीसदी और 10 साल की उम्र तक, लगभग 5 फीसदी बच्चों को माइग्रेन हो चुका है। बचपन में माइग्रेन का दर्द लगातार फैलता भी रहता है। बहरहाल, 5 से 15 साल के उम्र के बच्चों की बात करें, उनमें लगभग 10 फीसदी बच्चों को माइग्रेन होता है, और 28 फीसदी किशोरों को कभी न कभी माइग्रेन की स्थिति से गुजरना पड़ता है।
माइग्रेन के स्टेजेज
डॉ. अभिनव गुप्ता कहते हैं, आमतौर पर माइग्रेन को चार स्टेजेज में बांटा गया है, जैसे-
- प्रोड्रोमः यह माइग्रेन का पहला चरण है और यह एक तरह का वॉर्निंग साइन भी है। इस स्थिति में दर्द कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक हो सकता है। इसमें थकान, चिड़चिड़ापन और गर्दन में स्टिफनेस जैसे संकेत नजर आ सकते हैं।
- ऑराः यह सिरदर्द के दौरान या सिरदर्द होने के ठीक पहले की स्थिति होती है, जो कि 5 से 60 मिनट तक चल सकती है। इस चरण में बच्चों के आंखों के सामने रोशनी चमक उठती है और टेढ़ी-मेढ़ी लहरें भी दिखाई दे सकती हैं। इसके अन्य लक्षणों की बात करें, तो इसमें चक्कर आना, झुनझुनाहट या सुन्नता महसूस होना शामिल हैं।
- सिरदर्द होनाः माइग्रेन का यह तीसरा चरण है और इसे सबसे कठिन समय भी माना जाता है। इसमें बच्चों को तीव्र और असहनीय सिरदर्द होता है। दर्द सिर के दोनों तरफ होता है, जबकि वयस्कों में यह दर्द एक तरफ होता है। दर्द के साथ-साथ बच्चे में पेट में दर्द, मतली, उल्टी और चेहरा पीला पड़ना जैसे लक्षण नजर आ सकते हैं। यह चरण कुछ घंटों से लेकर तीन दिनों तक चल सकता है।
- पोस्टड्रोम: इसे माइग्रेन हैंगओवर या रिकवरी फेज भी कहा जाता है। यह दर्द खत्म होने के बाद का समय है। इसमें दर्द कम होने लगता है पर फिर भी बच्चा थका हुआ और चिड़चिड़ापन महसूस करता है। पोस्टड्रोम में बच्चे की एनर्जी का स्तर भी काफी कम होता है।
बच्चों में माइग्रेन का निदान

बच्चों में माइग्रेन ट्रीटमेंट शुरू करने से पहले डॉक्टर यह सुनिश्चित करते हैं कि सिरदर्द का असली कारण क्या है। इसे कंफर्म करने के लिए वे कई फिजिकल और न्यूरोलॉजिकल टेस्ट की सलाह दे सकते हैं। इससे अन्य गंभीर बीमारी के होने की जानकारी भी मिलती है। हालांकि, किसी भी तरह के टेस्ट से पहले डॉक्टर बच्चे की मेडिकल हिस्ट्री निकालते हैं और परिवार में माइग्रेन का इतिहास है या नहीं, इसकी सूचना लेते हैं। इसके साथ-साथ दर्द के पैटर्न के बारे में भी पूछते हैं। इसके अलावा, कुछ टेस्ट करने को कहा जा सकता है, जैसे ब्लड टेस्ट, सीटी (CT) स्कैन या एमआरआई।
बच्चों में माइग्रेन का इलाज
बच्चों में माइग्रेन का दर्द होने पर इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। तुरंत अन्य लक्षणों को देखते हुए डॉक्टर के पास जाना बेहतर होता है। आपको जानकारी के लिए बता दें कि माइग्रेन का दर्द अपने आप मुश्किल से ही जाता है। दर्द को कम करने के लिए तुरंत दवा लेनी पड़ती है। डॉक्टर ट्रीटमेंट के लिए ऐसी दवाएं भी दे सकते हैं, जो न सिर्फ माइग्रेन का दर्द के दौरों को कम कर सकते हैं, बल्कि इसकी गंभीरता में भी लाने की कोशिश की जाती है। यहां बताए गए टिप्स को भी आप अपना सकते हैं-
- तुरंत राहत के लिए दवा दें: बच्चे को माइग्रेन का दर्द हो तो तुरंत राहत के लिए डॉक्टर की सलाह पर पेनकिलर्स दे सकते हैं। डॉ. अभिनव गुप्ता बताते हैं, दर्द से राहत के लिए अक्सर Ibuprofen या पैरासिटामोल की सलाह दी जाती है। अगर दर्द गंभीर है, तो जरूरत अनुसार दवा बदली जा सकती है।
- जीवनशैली में बदलाव: बच्चे में माइग्रेन का पेन अक्सर होता है, रोजमर्रा के कामकाज प्रभावित होते हैं और बच्चा पढ़ भी नहीं पाटा है, तो दीर्घकालिक बचाव के लिए दवाएं दी जाती हैं। डॉ. अभिनव गुप्ता बताते हैं, इनमें बीटा-ब्लॉकर्स (जैसे प्रोप्रानोलोल), एंटी-डिप्रेसेंट्स (जैसे एमिट्रिप्टिलाइन) या एंटी-एपिलेप्टिक दवाएं (जैसे टोपिरामेट) शामिल हो सकती हैं, जो दिमाग की अति-संवेदनशीलता को कम करती हैं। इसके साथ-साथ बच्चों की जीवनशैली में भी बदलाव करने होते हैं, जैसे रोजाना कम से कम 8-10 घंटे की गहरी और नियमित नींद जरूरी होती है। नींद की कमी माइग्रेन को ट्रिगर कर सकती है।
- ट्रिगर्स की पहचान: कुछ बच्चों को चॉकलेट, पनीर, एमएसजी (MSG) या तीव्र गंध से माइग्रेन ट्रिगर होता है। पेरेंट्स के लिए जरूरी है कि वे पहचानें की बच्चे को किस चीज से माइग्रेन ट्रिगर होता है। इससे बच्चे को पहले से ही माइग्रेन पेन से बचने में मदद मिलती है।
बच्चों में माइग्रेन को मैनेज करने के टिप्स

बच्चों के लिए अपने माइग्रेन को मैनेज करना मुश्किल होता है। इसलिए, पैरेंट्स के लिए जरूरी है कि वे माइग्रेन को मैनेज करने के लिए यहां बताए गए टिप्स को फॉलो करें-
- बच्चों में माइग्रेन का दर्द किन चीजों की वजह से ट्रिगर होता है, इसका ध्यान रखना बहुत जरूरी है। ट्रिगर प्वाइंट कई ऐसे हो सकते हैं, जैसे नींद पूरी न लेना, तनाव बढ़ना आदि। इन्हें मैनेज करके माइग्रेन का दर्द होने से रोका जा सकता है।
- बच्चों की जीवनशैली डिसीप्लीन में होनी चाहिए। Frontiers In Neurology में भी माइग्रेन के हेल्दी जीवनशैली को महत्व दिया गया है। इसका मतलब है कि उन्हें रोजाना हेल्दी डाइट, सोने-उठने का समय निश्चित हो, नियमित रूप से मील लें और पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। पैरेंट्स ध्यान रखें कि बच्चे कभी भी डिहाइड्रेटेड न हों। इससे न सिर्फ सिरदर्द बढ़ सकता है, बल्कि इसका बुरा असर बीपी पर भी पड़ता है।
- बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करना भी बहुत जरूरी होता है। लगातार स्क्रीन पर देखने की वजह से आंखों पर दबाव पड़ता है, जिससे सिरदर्द हो सकता है। कुछ मामलों में सामान्य दर्द हो सकता है, जो माइग्रेन के दर्द को ट्रिगर कर सकता है। Annals Of Indian Academy Of Neurology में प्रकाशित जर्नल से पता चलता है कि रौशनी सिरदर्द को ट्रिगर करने में अहम रोल प्ले करती है।
- पैरेंट्स के लिए बहुत जरूरी है कि वे बच्चों के स्ट्रेस के स्तर को कम करने की हर संभव कोशिश करें। इसके लिए, आप बच्चों को नियमित रूप से एक्सरसाइज करने की सलाह दें, कुछ मन का करें, रिलैक्सेशन तकनीक अपनाने को कहें। इससे बच्चे का मूड भी बेहतर होता है।
- माइग्रेन पेन को मैनेज करने के लिए जरूरी है कि बच्चे पर्याप्त आराम करें। American Academy Of Pediatrics में भी आराम करने को प्राथमिकता दी है। जब भी बच्चे को माइग्रेन का पेन हो, बच्चों को फिजिकल एक्टिविटी से दूर रखें। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि माइग्रेन का दर्द होने पर बच्चों के कमरे में अंधेरा कर दें, क्योंकि रोशनी बच्चों के सिरदर्द को बढ़ा सकती है।
माइग्रेन होने पर बच्चों को डॉक्टर के पास कब ले जाएं?
जब भी पैरेंट्स को पता चले कि उनके बच्चे को माइग्रेन की दिक्कत है, तो उन्हें इस स्थिति को इग्नोर नहीं करना चाहिए। माइग्रेन होने पर पैरेंट्स को बच्चों में नजर आ रहे लक्षणों पर गौर करना चाहिए, जैसे-
- माइग्रेन पेन एक हफ्ते में दो बार होना।
- न्यूरोलॉजिकल बदलाव जैसे नजर कमजोर होना, हाथ-पांव सुन्न होना, कमजोरी छाना या कंफ्यूजन होना।
- माइग्रेन पेन के साथ-साथ अन्य लक्षण नजर आना, जैसे चक्कर आना और बच्चे को नींद आने में परेशानी महसूस होना।
- अगर माइग्रेन पेन के साथ-साथ बच्चे के गर्दन में स्टिफनेस और बुखार हो, तो भी उन्हें डॉक्टर के पास ले जाने में देरी नहीं करनी चाहिए।
- अगर बच्चे को सिर में चोट लगी है, इसकी वजह से माइग्रेन पेन ट्रिगर हुआ है, तो यह स्थिति भी चिंता का विषय है और आपको तुरंत प्रोफेशनल की मदद लेनी चाहिए।
निष्कर्ष
माइग्रेन बच्चों में भी एक आम न्यूरोलॉजिकल समस्या है। इसलिए पैरेंट्स को लापरवाही नहीं करनी चाहिए। ध्यान रखें कि माइग्रेन पेन बहुत तीव्र होता है और कुछ बच्चों के लिए इसे सहना काफी मुश्किल होता है। इस तरह की स्थिति में बच्चे को पेट दर्द, उल्टी, थकान, कमजोरी, एनर्जी की कमी और भी कई समस्याएं हो सकती हैं। पैरेंट्स के लिए बहुत जरूरी है कि ऐसा होने पर बच्चे को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं और उनका प्रॉपर ट्रीटमेंट करवाएं। विशेषकर, जब बच्चे को एक सप्ताह में दो-दो बार माइग्रेन पेन हो, तो यह और भी गंभीर स्थिति हो जाती है।
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FAQ
कैसे पता चलेगा कि माइग्रेन है?
माइग्रेन का पता लगाना मुश्किल नहीं है। इसके लक्षणों पर गौर करना जरूरी होता है, जैसे माइग्रेन में आमतौर पर सिर के एक तरफ दर्द होना, जो कि घंटों या दिनों तक रह सकता है। इसके साथ-साथ मतली, उल्टी, और तेज रोशनी, गंध या शोर के प्रति संवेदनशीलता का बढ़ना।माइग्रेन से बचाव का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
माइग्रेन से बचाव के लिए जरूरी है कि आप पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं और पोषक तत्वों से भरपूर चीजों को अपनी डाइट का हिस्सा बनाएं। इसके अलावा, जिन चीजों से माइग्रेन पेन ट्रिगर होता है, उससे दूरी बनाकर भी माइग्रेन से बचाव किया जा सकता है।माइग्रेन कितने दिनों में ठीक हो जाता है?
आमतौर पर बिना इलाज के 4 से 72 घंटे (1 से 3 दिन) तक यह दर्द रह सकता है। हालांकि, कुछ मामलों में यह इससे भी ज्यादा दिनों तक बना रह सकता है। वैसे भी यह एक क्रोनिक स्थिति है। इसलिए, हर मरीज के लिए इसके अनुभव अलग-अलग हो सकते हैं।माइग्रेन किसकी कमी से होता है?
माइग्रेन होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इसका जिक्र हमने लेख में भी किया है। हालांकि माइग्रेन विटामिन डी, मैग्नीशियम और विटामिन बी12 या राइबोफ्लेविन (बी2) जैसे पोषक तत्वों की कमी की वजह से भी हो सकता है।माइग्रेन में क्या पीना चाहिए?
माइग्रेन होने पर मरीज को पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए। शरीर में पानी की कमी की वजह से बॉडी डिहाइड्रेट हो जाती है, जिससे चक्कर आना, सिरदर्द होना जैसी समस्याएं होने लगती हैं, जो कि माइग्रेन को भी ट्रिगर कर सकता है।
इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।
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Current Version
Apr 19, 2026 12:12 IST
Modified By : Meera Tagore Apr 19, 2026 12:12 IST
Published By : Meera Tagore
Reviewed By : Dr Abhinav Gupta