Fri Sep 11, 2026 | 06:53 PM IST

कैसे हुई एनेस्थीसिया की खोज? मरीजों को दर्दनाक प्रक्र‍िया से राहत देने के ल‍िए हुए कई प्रयोग

पुराने जमाने में जम एनेस्‍थीस‍िया नहीं हुआ करता था, तब मरीजों को दर्दनाक प्रक्र‍िया से गुजरना पड़ता है। इससे उनके शरीर और मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। जैसे-जैसे खोज बढ़ी, एनेस्‍थीस‍िया नाम की पेन फ्री प्रक्र‍िया ने सब कुछ आसान बना द‍िया। जानें इसके इत‍िहास के बारे में।

इस पेज पर:-


क्‍या आप कल्‍पना कर सकते हैं क‍ि क‍िसी मरीज का ऑपरेशन हो और उसे एनेस्‍थीस‍िया न द‍िया जाए, तो दर्द क‍ितना डरावना हो सकता है? शायद इस बात की कल्‍पना करना भी मुश्‍क‍िल है, लेक‍िन एक दौर था जब एनेस्‍थीस‍िया के बगैर ही ऑपरेशन क‍िए जाते थे और मरीज दर्द से तड़पते थे। पुराने समय में दर्द को कम करने के ल‍िए शराब, अफीम, भांग और कुछ जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता था, लेक‍िन इनका असर सीमित और अनिश्चित था। बड़ी सर्जरी में ये उपाय असरदार नहीं थे। यूरोप में साल 1200 से 1500 के बीच नशीले पदार्थों में भिगोए स्पंज से मरीज को बेहोशी जैसी अवस्था में लाने की कोशिश की जाती थी। हालांक‍ि, इस तकनीक का असर सीमि‍त समय तक रहता था और बड़ी एवं जट‍िल सर्जरी में मरीज को दर्द महसूस होता था, फ‍िर पहली बार साल 1774 में लाफ‍िंग गैस के नाम से मशहूर नाइट्रिक ऑक्साइड का इस्‍तेमाल एनेस्‍थीस‍िया के ल‍िए क‍िया गया।

पहली सदी में शुरू हुई दर्द से राहत द‍िलाने की खोज 

Anesthesia-how-it-found

शब्दकोश में एनेस्थीसिया का मतलब होता है कोई भी सेंस न रहना या होश न रहना। यानी क‍िसी भी मेड‍िकल प्रक्र‍िया या सर्जि‍कल ऑपरेशन के दौरान मरीज को दर्द न महसूस हो, इसके ल‍िए ही एनेस्‍थीस‍िया का इस्‍तेमाल क‍िया जाता है। एनेस्‍थीस‍िया का इति‍हास बहुत पुराना है। पहली सदी में ज‍िक्र म‍िलता है मेडा गोरा प्‍लांट के बारे में जो अपने स्‍लीप‍िंग इफेक्‍ट्स के कारण चर्च‍ित हुआ। इसके बाद वैज्ञान‍िक ओलिवर वेंडेल होम्स ने एनेस्‍थीस‍िया शब्‍द का पहली बार प्रयोग क‍िया।

दांत दर्द को कम करने के ल‍िए हुआ लाफ‍िंग गैस का इस्‍तेमाल

anaesthesia-invention

लाफ‍िंग गैस या नाइट्रिक ऑक्साइड, साल 1774 में प्रचल‍ित हुई। इसके असर से व्‍यक्‍त‍ि काफी देर तक हंसता रहता है। दांत के दर्द को कम करने के ल‍िए लाफ‍िंग गैस पर शोध क‍िया गया। साल 1845 में इनेमल एक्‍सट्रैक्‍शन के ल‍िए नाइट्रिक ऑक्साइड का इस्‍तेमाल क‍िया गया जो क‍ि असफल रहा।

16 अक्‍टूबर को क्‍यों मनाया जाता है वर्ल्ड एनेस्‍थीस‍िया डे?

एक सब्‍सटेंस ज‍िसे दर्द कम करने के ल‍िए इस्‍तेमाल क‍िया गया उसका नाम ईथर (Ether) था। इसे साल 1540 में खोजा गया था। 16 अक्‍टूबर 1846 में को एनेस्‍थीस‍िया के ल‍िए ईथर का प्रैक्‍ट‍िकल इस्‍तेमाल प्रूफ क‍िया गया। इसल‍िए 16 अक्‍टूबर को विश्व भर में वर्ल्ड एनेस्‍थीस‍िया डे (World Anaesthesia Day) मनाया जाता है।

क्लोरोफॉर्म को एनेस्थीसिया के लिए लोकप्रिय किया

क्लोरोफॉर्म का इस्तेमाल 19वीं सदी में ऑपरेशन के दौरान दर्द कम करने के लिए तेजी से बढ़ा। जेम्स यंग सिम्पसन ने साल 1847 में प्रसव के दौरान क्लोरोफॉर्म के इस्तेमाल को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई।

क्‍वीन विक्टोरिया ने क्लोरोफॉर्म से डिलीवरी कराई

साल 1853 में ब्रिटेन की क्‍वीन विक्टोरिया ने अपने आठवें बच्चे, प्रिंस लियोपोल्ड के जन्म के दौरान क्लोरोफॉर्म का इस्तेमाल कराया। इसके बाद प्रसव के दौरान दर्द कम करने के लिए क्लोरोफॉर्म को लेकर लोगों का भरोसा बढ़ा।

इनहेल करके एनेस्थीसिया देने का दौर

anaesthesia-history

एनेस्थीसिया के शुरुआती दौर में ईथर, क्लोरोफॉर्म और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी दवाएं मुख्य रूप से सांस के जरिए दी जाती थीं। मरीज इन दवाओं की गैस को सांस के साथ अंदर लेते थे। बाद में नस के जरिए दवा देने की तकनीक विकसित हुई, जिससे एनेस्थीसिया देना और उसकी मात्रा को कंट्रोल करना ज्‍यादा आसान बन गया।

साल 1934 में नस के जरिए एनेस्थीसिया की खोज हुई

साल 1934 के आसपास थियोपेंटोन (Thiopentone) के विकास ने बड़ा बदलाव किया। इसे नस के जरिए देने पर मरीज तेजी से बेहोशी की अवस्था में जा सकता था। इससे एनेस्थीसिया देने के लिए केवल गैस पर निर्भरता कम हुई।

आंख की सर्जरी में कोकेन का इस्तेमाल और लोकल एनेस्थीसिया

साल 1884 में कार्ल कोलर ने आंख की सर्जरी में कोकेन का इस्तेमाल करके लोकल एनेस्थीसिया को लोकप्रिय बनाया। हर ऑपरेशन में मरीज को पूरी तरह बेहोश करना जरूरी नहीं होता। छोटे या शरीर के किसी खास हिस्से में किए जाने वाले ऑपरेशन के लिए लोकल का इस्तेमाल प्रच‍ल‍ित हुआ। बाद में कोकेन की जगह अधिक सुरक्षित एनेस्‍थीस‍िया के ड्रग ने ले ली। साल 1898 में स्पाइनल एनेस्थीसिया और एपिड्यूरल एनेस्थीसिया का दौर शुरू हुआ ज‍िसमें रीढ़ की हड्डी और एपिड्यूरल स्‍पेस में इंजेक्‍शन देकर लोअर बॉडी को नंब क‍िया जाने लगा।

मसल को र‍िलैक्‍स करने वाले ड्रग का इजात हुआ

सर्जरी के दौरान केवल दर्द कम करना काफी नहीं होता। सर्जरी में मसल्‍स को र‍िलैक्‍स करना जरूरी होता है। इसके ल‍िए साल 1942 में मसल र‍िलैक्‍सेंट का इस्‍तेमाल हुआ।

विंडपाइप के जरिए एनेस्थीसिया

विंडपाइप में ट्यूब डालकर एनेस्थीसिया देने की तकनीक का विकास 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में हुआ। 1878 में ब्रिटिश सर्जन ने बच्चों में डिप्थीरिया के दौरान सांस की नली को खुला रखने के लिए ट्यूब का इस्तेमाल किया। इसके बाद इस तकनीक को सर्जरी और एनेस्थीसिया में विकसित किया गया।

साल 1917 में बॉइल एनेस्‍थीस‍िया मशीन का इस्‍तेमाल हुआ

साल 1917 में हेनरी बॉयल ने बॉइल एनेस्‍थीस‍िया मशीन व‍िकस‍ित की। इस मशीन से एनेस्‍थीस‍िया के ल‍िए इस्‍तेमाल होने वाली गैस और ऑक्सीजन को कंट्रोल तरीके से मरीज तक पहुंचाना संभव हुआ।

साल 2000 में अल्ट्रासाउंड से नसों को सुन्न करने की तकनीक

साल 2000 से 2005 के बीच अल्ट्रासाउंड तकनीक के बेहतर होने से डॉक्टर शरीर की नसों को स्क्रीन पर देखकर उनके आसपास सुन्न करने वाली दवा देने लगे। इस तकनीक में लोकल एनेस्थीसिया की दवा को नस के आसपास सावधानी से पहुंचाया जाता है। इससे शरीर के सिर्फ उस हिस्से को सुन्न करना संभव हुआ, जहां सर्जरी की जानी होती है।

AI आने के बाद जल्‍दी र‍िकवरी पर जोर

मौजूदा समय में नए एनेस्थेटिक ड्रग्स का असर जल्दी शुरू और खत्म किया जा सकता है, जिससे मरीज को ऑपरेशन के बाद जल्दी होश आने और रिकवरी में मदद मिलती है। वैज्ञान‍िक अब AI और स्मार्ट मॉनिटरिंग स‍िस्‍टम को व‍िकस‍ित कर रहे हैं। इससे मरीज की जल्‍दी र‍िकवरी पर जोर द‍िया जाएगा। आज के समय में एनेस्थीसिया टीम का लक्ष्य सिर्फ ऑपरेशन के दौरान मरीज को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि कम दर्द और फास्‍ट रिकवरी कराना भी है।

न‍िष्‍कर्ष:

एनेस्थीसिया का इतिहास इंसान को सर्जरी के दर्द से राहत दिलाने के लक्ष्‍य से शुरू होकर आज AI तकनीकों तक पहुंच चुका है। कभी शराब, अफीम और जड़ी-बूटियों से दर्द कम करने की कोशिश की जाती थी, लेकिन ईथर, क्लोरोफॉर्म और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी दवाओं ने सर्जरी का तरीका बदल दिया। इसके बाद नस के जरिए एनेस्थीसिया, लोकल, स्पाइनल और एपिड्यूरल एनेस्थीसिया, मसल रिलैक्सेंट, आधुनिक एनेस्थीसिया मशीन और अल्ट्रासाउंड जैसी तकनीकों ने इसे और सुरक्षित बनाया। आज एनेस्थीसिया का लक्ष्‍य केवल मरीज को बेहोश करना नहीं, बल्कि ऑपरेशन के दौरान दर्द और जल्‍दी र‍िकवरी देना भी है।

image credits: rnztools, pcdn.co

Read Next

मानसून में स्कूल जाते बच्चों की सेहत न हो खराब, डॉक्‍टर से जानें क‍िन जरूरी बातों का रखें ध्यान?

Disclaimer

इस जानकारी की सटीकता, समयबद्धता और वास्तविकता सुनिश्चित करने का हर सम्भव प्रयास किया गया है हालांकि इसकी नैतिक जि़म्मेदारी ओन्लीमायहेल्थ डॉट कॉम की नहीं है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्सक से अवश्य संपर्क करें। हमारा उद्देश्य आपको जानकारी मुहैया कराना मात्र है।

Yashaswi Mathur

Yashaswi Mathur

Senior Sub Editor

यशस्वी माथुर पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं, जिनमें से करीब 8 साल उन्होंने हेल्थ जर्नलिज्म को दिए हैं। फिलहाल वह OnlyMyHealth में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं। यहां वह स्वास्थ्य, महिला स्वास्थ्य, पोषण और लाइफस्टाइल से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। यशस्वी की खासियत है जटिल मेडिकल विषयों और रिसर्च को आसान भाषा में समझाना, ताकि आम पाठक भी उन्हें आसानी से समझ सके। लेख तैयार करते समय वह विशेषज्ञ डॉक्टरों की राय, मेडिकल रिसर्च और भरोसेमंद स्रोतों का ध्यान रखती हैं। जिन विषयों में मेडिकल वैरिफिकेशन जरूरी होता है, उन्हें प्रकाशित होने से पहले डॉक्टरों द्वारा रिव्यू किया जाता है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत हिंदुस्तान अखबार से की थी। उस दौरान स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी एक खोजी रिपोर्ट के बाद लखनऊ के KGMU स्थित क्वीन मेरी अस्पताल के गायनेकोलॉजी विभाग में व्यवस्थाओं को लेकर स्वास्थ्य विभाग को सुधारात्मक कदम उठाने पड़े। Editorial Policy: यशस्वी द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

Read More..

How we keep this article up to date:

We work with experts and keep a close eye on the latest in health and wellness. Whenever there is a new research or helpful information, we update our articles with accurate and useful advice.

  • Current Version

    Aug 13, 2026 20:15 IST

    Modified By : Yashaswi Mathur
  • Aug 13, 2026 20:15 IST

    Modified By : Yashaswi Mathur
  • Aug 13, 2026 20:15 IST

    Published By : Yashaswi Mathur

Medically reviewed content
200+ medical reviewers in network
17 Years of Trusted Health Content
Medically reviewed content
200+ medical reviewers in network
17 Years of Trusted Health Content
Medically reviewed content
200+ medical reviewers in network
17 Years of Trusted Health Content