बच्चों के दूध के दांतों में हो रही किसी भी समस्या को सिर्फ इसलिए इग्नोर कर दिया जाता है, क्योंकि पेरेंट्स को लगता है कि कुछ सालों बाद ये दांत खुद ही टूट जाएंगे और स्थायी दांत तो आने ही हैं। यह सोच बच्चों के स्थायी दांतों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। दूध के दांत अस्थायी नहीं होते, बल्कि यह बच्चों के पूरे दांतों की नींव रखते हैं। इसलिए दांतों की सड़न उम्रभर की परेशानी बन सकती है। इस बारे में जानने के लिए हमने Dr. Keshav Naithani, Principal Director & HOD, Department of Dental & Maxillofacial Surgery, Max Multi-Speciality Hospital, Noida (UP) से बात की। उन्होंने बताया कि दूध के दांतों की कैविटी का समय पर इलाज कराना उतना ही जरूरी है, जितना स्थायी दांतों का। इसे नजरअंदाज करने से कई ऐसी समस्याएं हो सकती हैं, जो आगे चलकर गंभीर हो सकती है।
बच्चों के दूध के दांतों में कैविटी क्यों होती है?
Johns Hopkins Medicine के अनुसार, बच्चों के दांतों की सड़न की समस्या तब शुरू होती है, जब दांतों के इनेमल को नुकसान पहुंचने लगता है। बच्चों में सड़न की मुख्य वजह मुंह के बैक्टीरिया, भोजन के कण और एसिड का आपस में मिलना है। जब बच्चा मीठा या कार्बोहाइड्रेट से भरपूर खाना खाता है, जैसे दूध, सोडा, टॉफी, केक, फ्रूट जूस, ब्रेड या सिरियल्स, तो इसके कण दांतों से चिपके रह जाता हैं। इसके अलावा, मुंह में शुगर और खाने के कण रहने से एसिड बनने लगता है। इसके अलावा, एसिड, बैक्टीरिया और लार मिलकर एक चिपचिपी परत बना लेते हैं, जिसे प्लेक कहते हैं। इससे दांतों का इनेमल गलने लगता है और दांतों में छेद या कैविटी होने लगती है।
इससे Dr. Keshav Naithani भी इत्तेफाक रखते हैं। उन्होंने कहा, “बच्चे बहुत ज्यादा मीठी चीजें, कोल्ड ड्रिंक या रात में दूध पीकर बिना ब्रश किए सो जाते हैं। छोटे बच्चों दांतों की सफाई भी ठीक से नहीं कर पाते, इसलिए शुरुआत में उनके दांतों में छोटे काले या भूरे धब्बे दिखाई देते हैं, लेकिन समय के साथ यह सड़न गहरी होती जाती है और दांत के अंदर तक पहुंच सकती है। समय पर इलाज न कराने से इसका असर स्थायी दांतों पर भी पड़ सकता है।”

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बच्चों की दांतों की सड़न का इलाज न कराने के नुकसान
Mayo Clinic के मुताबिक, अक्सर पेरेंट्स का यह सोचना कि दूध के दांतों में अगर कैविटी हो भी जाए, तो क्या फर्क पड़ता है, इसके कई नुकसान हो सकते हैं। कई बार बच्चों के दांतों में सड़न इतनी ज्यादा बढ़ जाती हैं कि कई तरह की जटिलताएं हो सकती हैं। इसमें दांत में लगातार या रुक-रुककर तेज दर्द होना, बैक्टीरिया के कारण दांतों की जड़ में मवाद बनना, सड़न की वजह से दांतों का टूटना, दांतों के आसपास मसूड़ों में सूजन आना, बच्चों को खाना चबाने में दिक्कत होना और सड़न के कारण दांत टूटने के बाद आसपास के दांत खाली जगह पर खिसकने लगते हैं।
Dr. Keshav Naithani कहते हैं, “कैविटी बढ़ने पर बच्चे के दांतों में दर्द होता है, जिस वजह से वह ठीक से खाना नहीं खा पाते और इससे उनकी भूख कम हो जाती है। इससे शरीर को जरूरी न्यूट्रिशन नहीं मिल पाते और दर्द की वजह से बच्चों की नींद पर भी असर पड़ता है, जिससे उनका स्वभाव चिड़चिड़ा हो सकता है और पढ़ाई या खेलकूद में भी उसका मन नहीं लगता। दूध के दांतों की सड़न बच्चों के फिजिकल और मेंटल हेल्थ पर असर डाल सकती है।”
स्थायी दांतों के लिए जगह बनाए रखते हैं दूध के दांत
Dr. Keshav Naithani ने बताया कि दूध के दांतों का सबसे जरूरी काम यह है कि वे स्थायी दांतों के लिए सही जगह सुरक्षित रखते हैं। इन्हें प्राकृतिक स्पेस मेंटेनर कहा जाता है। अगर किसी दूध के दांत को गंभीर सड़न के कारण समय से पहले निकालना पड़ जाए, तो उसके आसपास के दूसरे दांत धीरे-धीरे उस खाली जगह की ओर खिसकने लगते हैं। इससे स्थायी दांतों के निकलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं बचती और वे टेढ़े-मेढ़े या क्राउड दांत निकल सकते हैं।
गंभीर इंफेक्शन से स्थायी या पक्के दांतों को नुकसान
Dr. Keshav Naithani ने कहा, “दूध के दांतों की जड़ के ठीक नीचे ही स्थायी या पक्के दांतों की ग्रोथ होती है। अगर कैविटी या सड़न इतनी गहरी हो कि वह जड़ तक पहुंच जाए, तो नीचे मौजूद स्थायी दांतों तक फैल सकती है। इसका असर स्थायी दांत के आकार, रंग और मजबूती पर पड़ सकता है। कुछ बच्चों में स्थायी दांत सही तरीके से विकसित नहीं हो पाते। इसलिए कैविटी का इलाज टालना भविष्य में दांतों की कई गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकता है।”
बच्चे की बोलने की क्षमता पर असर
Dr. Keshav Naithani कहते हैं, “दूध के दांतों का काम बच्चे के बोलने और उच्चारण में भी मदद करते हैं। अगर ये दांत समय से पहले निकल जाते हैं, तो बच्चों को कुछ शब्द बोलने में दिक्कत हो सकीत है। कई बार बच्चों में तुतलाहट जैसी समस्या भी देखने को मिल सकती है।”
मेंटल हेल्थ पर असर
Dr. Keshav Naithani के अनुसार, “जब बच्चे के दांतों में सड़न या कैविटी हो जाती है, तो बहुत ही छोटी उम्र से बच्चे मुस्कुराने या अपने दोस्तों के साथ खेलने कूदने से बचने लगते हैं। इससे कई बार बच्चों के व्यक्तित्व के विकास पर भी असर पड़ सकता है।”
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बच्चों के दांतों के किन लक्षणों को इग्नोर नहीं करना चाहिए?
Johns Hopkins Medicine के अनुसार, अगर बच्चों के दांतों में ये लक्षण दिखाई दें, तो दांतों के डॉक्टर को जरूर दिखाना चाहिए।
- अगर दांतों के ऊपर हल्के सफेद रंग के धब्बे बनने लगे, तो इसका मतलब है कि दांतों की बाहरी परत इनेमल गलना शुरू हो चुकी है।
- दांत पर एक छोटा गड्ढा दिखने लगता है, जिसका रंग हल्का भूरा हो।
- जैसे-जैसे सड़न इनेमल के अंदरूनी हिस्से में जाने लगती है, तो भूरा रंग काला होने लगता है।
- दांतों और मसूड़ों में दर्द होना।
- बहुत ज्यादा मीठा, ठंडा या गर्म पीने पर दांतों में झनझनाहट महसूस होना।
- दूध के दांतों की सड़न को रोकने का इलाज
Dr. Keshav Naithani कहते हैं कि अगर शुरुआती स्टेज पर ही कैविटी का पता चल जाए, तो फिलिंग या पल्पोटोमी से दांतों को बचाया जा सकता है। इससे इंफेक्शन को रोकने में मदद मिलती है और स्थायी दांतों को सुरक्षा मिलती है। इसके अलावा, बच्चों को दिन में दो बार फ्लोराइड वाले टुथपेस्ट से ब्रश करना चाहिए और बच्चों को मीठी चीजें कम से कम देनी चाहिए और हर छह महीने में एक बार डेंटल चेकअप जरूर कराना चाहिए।
निष्कर्ष
Dr. Keshav Naithani पेरेंट्स को सलाह देते हैं कि दूध के दांत चाहे कुछ सालों के लिए होते हैं, लेकिन वे स्थायी या पक्के दांतों को आधार देते हैं। शुरुआत में बच्चों के दूध के दांत स्पष्ट बोलने, चेहरे के विकास और जबड़ों को मजबूती देते हैं। इसलिए अगर बच्चों के दांतों में कैविटी या सड़न होती है, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
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FAQ
बच्चों के दूध के दांत निकलना कब शुरू होते हैं और पूरे कब होते हैं?
आमतौर पर बच्चे का पहला दूध का दांत छह से दस महीने की उम्र के बीच निकलता है। करीब तीन साल की उम्र तक बच्चों के मुंह में सभी 20 दूध के दांत पूरी तरह निकल आते हैं।दूध के दांत टूटना किस उम्र से शुरू होते हैं?
दूध के दांत गिरने की शुरुआत लगभग छह से सात साल की उम्र से होती है। सबसे पहले वही सामने के दांत गिरते हैं जो सबसे पहले निकले थे। यह सिलसिला 11 से 12 साल की उम्र तक चलता है, जब तक कि सभी दाढ़ बदलकर पक्के दांतों में न बदल जाएं।
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Jul 21, 2026 16:38 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Keshav Naithani