LDL, HDL और ट्राईग्लिसराइड्स ये तीनों कारक हार्ट की बीमारियों से जुड़े हैं। LDL (Low-Density Lipoprotein) को आम भाषा में खराब कोलेस्ट्रॉल (बैड कोलेस्ट्रॉल), HDL (High-Density Lipoprotein) को अच्छा कोलेस्ट्रॉल (गुड कोलेस्ट्रॉल) और ट्राइग्लिसराइड्स को नसों में जमा फैट कहते हैं। इन तीनों के ऊपर-नीचे होने से दिल की सेहत पर बड़ा असर पड़ता है। इनके आपस के संबंध और दिल की बीमारी से इनके कनेक्शन के बारे में जानने के लिए हमने Dr Deebanshu Gupta, Consultant Interventional Cardiologist, Sarvodaya Hospital, Jalandhar से बात की।
HDL क्या है?
Mayo Clinic के अनुसार, HDL का मतलब है हाई-डेंसिटी लिपोप्रोटीन और लिपोप्रोटीन लिपिड्स यानी फैट और प्रोटीन से मिलकर बना है। इसे अच्छा कोलेस्ट्रॉल भी कहा जाता है क्योंकि ये ब्लड फ्लो से कोलेस्ट्रॉल और अन्य खराब पदार्थों को इकट्ठा करके लिवर तक लेकर जाता है। लिवर इस कोलेस्ट्रॉल को ब्रेक करके शरीर से बाहर निकालने का काम करता है। कोलेस्ट्रॉल मोम जैसा पदार्थ होता है, जो हर टिश्यू में मौजूद होता है। सेहतमंद कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है, जो शरीर के सेल्स को सही ढंग से काम करने में मदद करता है और हार्मोन व विटामिन D का निर्माण करता है। यह अच्छा कोलेस्ट्रॉल हार्ट की बीमारियों और स्ट्रोक के रिस्क को कम करता है। साथ ही आर्टीरज के वॉल पर कोलेस्ट्रॉल जमने से रोकता है ताकि ब्लड फ्लो सही बना रहे।
LDL क्या है?
Cleveland Clinic के अनुसार, LDL का मतलब है लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन, जिसे आम भाषा में खराब कोलेस्ट्रॉल भी कहा जाता है। LDL कणों में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बहुत ज्यादा होती है और प्रोटीन की मात्रा कम होती है। LDL शरीर में कोलेस्ट्रोल को कोशिकाओं तक पहुंचाता है, लेकिन जब शरीर में जरूरत से ज्यादा LDL हो जाता है, यानी हाई LDL हो जाता है, तो यह आर्टरी पर चिपकने लगता है और इस फैट को प्लाक कहते हैं। लगातार आर्टरी पर जमने के कारण आर्टरीज सख्त होने लगती हैं और संकरी हो जाती हैं। इस वजह से ब्लड फ्लो में रुकावट आने लगती हैं और हार्ट व दिमाग तक ऑक्सीजन से युक्त ब्लड पहुंच नहीं पाता। अगर प्लाक फट जाता है, तो ब्लड क्लॉट की वजह से हार्ट अटैक या स्ट्रोक हो सकता है। इसलिए LDL का हाई होना हार्ट की बीमारियों को बढ़ा सकता है।

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ट्राइग्लिसराइड्स क्या होते हैं?
National Heart, Lung, and Blood Institute के अनुसार, ट्राइग्लिसराइड्स शरीर में पाया जाने वाला फैट होता है और अच्छी सेहत के लिए शरीर में कुछ मात्रा में होना जरूरी है। ट्राइग्लिसराइड्स ब्लड में मौजूद एक तरह का लिपिड (फैट) है, जो ब्लड में सर्कुलेट करता है। जब लोग ऐसी कैलोरी खाते हैं, जिसकी शरीर को जरूरत नहीं होती, तो शरीर उसे ट्राइग्लिसराइड्स में बदल देता है। यह इस्तेमाल न होने वाली कैलोरी फैट सेल्स में जमा हो जाते हैं और जब शरीर को कैलोरी की जरूरत होती है, तो ये ट्राइग्लिसराइड्स ब्लड में रिलीज होते हैं। अगर शरीर में ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ने लगते हैं, तो लिपिड डिसऑर्डर हो सकता है। अगर शरीर में ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ जाए और साथ में HDL कम हो जाए, तो शरीर के लिए काफी खतरनाक हो सकता है। बहुत ज्यादा ट्राइग्लिसराइड्स होने पर हार्ट की बीमारियों और स्ट्रोक का रिस्क काफी हद तक बढ़ सकता है।
LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स की नॉर्मल रेंज क्या है?
Cleveland Clinic में LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स की रेंज बताई गई है।
कोलेस्ट्रॉल |
नॉर्मल रेंज |
रिस्क |
200 mg/dL से कम |
200 या उससे ज्यादा |
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HDL - पुरुष |
40 - 80 mg/dL |
40 से नीचे |
HDL - महिला |
50 - 80 mg/dL |
50 से नीचे |
LDL |
100 mg/dL से नीचे |
100 या उससे अधिक |
ट्राइग्लिसराइड्स (सामान्य) |
150 mg/dL से कम |
150 mg/dL |
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क्या हाई LDL होना खतरनाक है?
British Journal of Clinical Pharmacology में प्रकाशित 2021 की स्टडी में मेंडेलियन रैंडमाइजेशन (Mendelian Randomization) तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसमें दस लाख से ज्यादा लोगों के आनुवांशिक डेटा का विश्लेषण किया गया है। इसमें LDL-C के लेवल कम होने पर लोगों की उम्र बढ़ने पर स्टडी की गई है। स्टडी में यह भी देखा गया है कि नेचुरल तरीके से कम कोलेस्ट्रॉल वाले जीन उम्र पर क्या असर डालते हैं। इस स्टडी में पाया गया है कि लोगों में आनुवंशिक रूप से बढ़े हुए LDL-c के हर 1 स्टैंडर्ड डेविएशन बढ़ने पर 1.2 साल जीवन अवधि कम पाई गई है। सरल शब्दों में कहा जाए, तो जिन लोगों में खराब कोलेस्ट्रॉल नेचुरल रूप से ज्यादा था, उनकी उम्र कम होने की संभावना ज्यादा पाई गई है। हाई LDL-c वाले लोगों में 90 साल की उम्र तक जीवित रहने की संभावना 28% कम पाई गई थी। इस अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि हाई LDL-c का लेवल जीवन की उम्र कम करता है। इस बारे में डॉ. दिबांशु कहते हैं, "जब LDL ज्यादा होता है, तो आर्टरी में जमा प्लाक ब्लड फ्लो को रोकता है और इससे कोरोनरी आर्टरी डिजीज, हाथों और पैरों की धमनियों पर असर पड़ सकता है। पैरों में दर्द या जख्म भरने में देरी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। जब LDL बढ़ने लगता है, तो आर्टरी की दीवार कमजोर हो सकती है और गुब्बारे की तरह फूल सकता है, जो फटने पर जानलेवा हो सकता है।"
क्या हाई HDL होना हमेशा हार्ट के लिए अच्छा होता है?
Biomedicines 2021 में प्रकाशित स्टडी के अनुसार, आमतौर पर HDL को अच्छा कोलेस्ट्रॉल माना जाता है, लेकिन रिसर्च के अनुसार, बहुत ज्यादा HDL होना सुरक्षित नहीं है क्योंकि रिसर्चर्स ने पाया है कि HDL-c का लेवल ज्यादा होना हमेशा हार्ट की बीमारियों से बचाव नहीं करता, बल्कि यह नुकसान दे सकता है। क्लिनिकल ट्रायल्स में दवाओं के जरिए HDL का स्तर भारी मात्रा में बढ़ाने के बावजूद भी मरीजों के हार्ट के रिस्क में कोई कमी नहीं आई। यूरोपीय सोसाइटी ऑफ कार्डियोलॉजी (ESC) की गाइडलाइंस में इस बात पर जोर दिया गया है कि अगर ब्लड में HDL का स्तर 90 mg/dL (2.3 mmol/L) से अधिक हो जाता है, तो एथेरोस्क्लेरोटिक हार्ट रोग का खतरा बढ़ सकता है।
क्या ट्राइग्लिसराइड्स कम होना सही होता है?
डॉ. दिबांशु कहते हैं, "अगर ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर ज्यादा होता है, तो आर्टरी को सख्त या उसकी दीवार को मोटा कर सकता है, जिससे स्ट्रोक, हार्ट अटैक या अन्य हार्ट की बीमारियां होने का खतरा बढ़ सकता है। जिन लोगों का ट्राइग्लिसराइड्स बहुत ज्यादा होता है, उनके पैंक्रियाज में गंभीर सूजन होने का रिस्क बहुत ज्यादा बढ़ सकता है। इसके अलावा, हाई ट्राइग्लिसराइड्स होना टाइप 2 डायबिटीज या प्रीडायबिटिक का संकेत हो सकता है और शरीर में थायराइड हार्मोन का लेवल कम हो सकता है। इसलिए ट्राइग्लिसराइड्स के लेवल को कम रखना जरूरी है। इसके लिए फैट की मात्रा को कम रखना चाहिए।"

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हाई LDL, लो HDL और हाई ट्राइग्लिसराइड्स किन वजहों से होता है?
डॉ. दिबांशु ने बताया है कि हाई LDL, लो HDL और हाई ट्राइग्लिसराइड्स होने के अलग-अलग कारण हैं।
कारण |
लो HDL के कारण |
हाई ट्राइग्लिसराइड्स के कारण |
हाई LDL के कारण |
वजन |
BMI 25 से ज्यादा |
BMI 25 से ज्यादा |
मोटापा या वजन का ज्यादा होना |
लाइफस्टाइल |
स्मोकिंग/तंबाकू का सेवन (ई-सिगरेट सहित) |
शराब का बहुत ज्यादा सेवन, फिजिकल एक्टिव न होना, स्मोकिंग |
तंबाकू का सेवन |
मेडिकल कंडीशन |
मेटाबॉलिक सिंड्रोम, इंसुलिन रेजिस्टेंस |
डायबिटीज बढ़ना, लिवर या किडनी की बीमारी, थायराइड रोग, रूमेटोइड अर्थराइटिस |
डायबिटीज, क्रोनिक किडनी रोग, HIV |
दवाएं |
बीटा-ब्लॉकर्स, कुछ हार्मोन और डियूरिटिक्स |
डियूरिटिक्स, हार्मोन, कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स, बीटा-ब्लॉकर्स, HIV दवाएं |
ब्लड प्रेशर और HIV की कुछ दवाएं |
जेनेटिक कारण |
फैमिलियल कंबाइंड हाइपरलिपिडेमिया, ApoA1 की कमी, टैंगियर रोग |
शरीर में मौजूद फैट को एनर्जी में बदलने की क्षमता कम होना |
परिवार में हाई कोलेस्ट्रॉल की हिस्ट्री |
अन्य कारण |
— |
— |
बढ़ती उम्र, मेनोपॉज के बाद महिलाओं में रिस्क बढ़ना |
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लिपिड प्रोफाइल में LDL, HDL, Triglycerides को कैसे चेक किया जाता है?
डॉ. दिबांशु कहते हैं, "आमतौर पर शरीर में कोलेस्ट्रॉल और फैट की जांच लिपिड प्रोफाइल टेस्ट के जरिए की जा सकती है। लिपिड प्रोफाइल टेस्ट में टोटल कोलेस्ट्रॉल, LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स चेक किया जाता है। हार्ट की बीमारी या स्ट्रोक के रिस्क को चेक करने के लिए इस टेस्ट की सलाह दी जाती है। लिपिड प्रोफाइल कराने से पहले मरीज को कम से कम 9 से 12 घंटे की फास्टिंग करनी चाहिए। इस दौरान पानी पिया जा सकता है। दरअसल, खाने से ट्राइग्लिसराइड्स का लेवल बढ़ सकता है। टेस्ट कराने से 24 घंटे पहले शराब बिल्कुल नहीं पीनी चाहिए। इस टेस्ट के लिए बांह से ब्लड का सैंपल लिया जाता है और चेकिंग के लिए लैब में भेजा जाता है।"
LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स को मैनेज करने के तरीके
डॉ. दिबांशु कहते हैं कि HDL , LDL और ट्राइग्लिसराइड्स को बैलेंस रखने के लिए मोटापा कम करना बहुत जरूरी है। इसके अलावा, हाई बीपी और हाई शुगर को कंट्रोल करना जरूरी है। जो लोग स्मोकिंग करते हैं, उन्हें तुरंत स्मोकिंग छोड़नी चाहिए।
LDL और ट्राइग्लिसराइड्स कम करने के उपाय |
HDL बढ़ाने के उपाय |
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डाइट |
ओट्स (दलिया), फलियां, मौसमी फल और सब्जियां खाएं। |
सैचुरेटेड फैट की जगह ऑलिव ऑयल, नट्स और एवोकैडो जैसे अनसैचुरेटेड फैट लें। |
फैट से परहेज |
बिस्कुट, केक, कुकीज और तले हुए फास्ट फूड पूरी तरह बंद करें। |
फैटी मीट और फुल-फैट डेयरी प्रोडक्ट्स का सेवन कम करें। |
शुगर और कार्ब्स |
मीठे ड्रिंक्स और रिफाइंड कार्ब्स ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ाते हैं। |
ब्लड शुगर कंट्रोल में रखने से मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा कम होता है। |
एक्सरसाइज |
रोजाना कम से कम 30 मिनट तेज चलना, तैरना या साइकिल चलाना बेहतर रहता है। |
हफ्ते में कम से कम 60 मिनट का मध्यम व्यायाम भी HDL बढ़ा सकता है। |
वजन |
शरीर का वजन कम करने से LDL और ट्राइग्लिसराइड्स में काफी सुधार होता है। |
सेहतमंद वजन बनाए रखना अच्छे कोलेस्ट्रॉल के लिए जरूरी है। |
स्मोकिंग और तंबाकू |
स्मोकिंग और वेपिंग HDL को कम और LDL को बढ़ाते हैं। |
शराब का सेवन बिल्कुल सीमित करें और हो सके तो शराब छोड़ दें। |
मेंटल हेल्थ |
लंबे समय का स्ट्रेस LDL बढ़ा सकता है और HDL घटा सकता है। |
शरीर के मेटाबॉलिज्म को सही रखने के लिए 7-9 घंटे की गहरी नींद लें। |
डॉक्टर से कब मिलें?
अगर ब्लड शुगर कंट्रोल में न रहे, हाई बीपी की समस्या लगातार बनी रही, बहुत ज्यादा पसीना आना, हार्ट से जुड़ी समस्याओं के लक्षण जैसे आराम की पोजीशन में सांस फूलना, बहुत ज्यादा थकान, सीने में दर्द हो, तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं।
निष्कर्ष
LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स का संतुलन होना बहुत जरूरी है। किसी एक पैरामीटर को चेक करना काफी नहीं है। हार्ट की बीमारियों के रिस्क को कम करने के लिए LDL का कम होना, HDL का एक संतुलित स्तर और ट्राइग्लिसराइड्स का कम होना बहुत जरूरी है। इसके लिए लोगों को अपने लाइफस्टाइल में बदलाव करना बहुत जरूरी है। डाइट और रेगुलर एक्सरसाइज करने से HDL, LDL और ट्राइग्लिसराइड्स को बैलेंस किया जा सकता है। इसके अलावा, जिन लोगों को हाई शुगर और हाई बीपी की समस्या है, उन्हें डॉक्टर से रेगुलर चेकअप कराते रहना चाहिए।
FAQ
क्या केवल पतले लोगों का लिपिड प्रोफाइल हमेशा नॉर्मल रहता है?
नहीं, हर मामले में ऐसा नहीं होता। हालांकि मोटापा एक बड़ा रिस्क फैक्टर है, लेकिन जेनेटिक कारणों या खराब खान-पान की वजह से पतले लोगों में भी हाई LDL और हाई ट्राइग्लिसराइड्स की समस्या हो सकती है।ट्राइग्लिसराइड्स और कोलेस्ट्रॉल में क्या अंतर है?
ट्राइग्लिसराइड्स एक प्रकार का फैट है जो शरीर को एनर्जी देता है, जबकि कोलेस्ट्रॉल एक मोम जैसा पदार्थ है जिसका इस्तेमाल शरीर के सेल्स, हार्मोन और विटामिन D बनाने के लिए करता है।लिपिड प्रोफाइल टेस्ट के लिए 12 घंटे की फास्टिंग क्यों जरूरी है?
खाना खाने के तुरंत बाद ब्लड में ट्राइग्लिसराइड्स का लेवल बढ़ जाता है। सटीक रीडिंग के लिए 9-12 घंटे की फास्टिंग जरूरी है।क्या दवा के बिना केवल डाइट से LDL को कम किया जा सकता है?
लाइफस्टाइल और डाइट में बदलाव करके LDL को काफी हद तक सुधारा जा सकता है। हालांकि, अगर LDL जेनेटिक कारणों से बढ़ा हुआ है, तो सिर्फ डाइट पर्याप्त नहीं होती। इसके लिए डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए।
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Apr 25, 2026 17:55 IST
Modified By : Aneesh Rawat Apr 25, 2026 17:55 IST
Modified By : Aneesh RawatApr 25, 2026 17:55 IST
Published By : Aneesh Rawat
Reviewed By : Dr Deebanshu Gupta