Fri Sep 11, 2026 | 06:51 PM IST

Medically Reviewed by Dr M V Jyothsna , Consultant Obstetrician & Gynaecologist

मेनोपॉज के बाद एंडोमेट्रियोसिस: कारण, जोखिम, लक्षण और समस्याएं

मेनोपॉज के बाद एंडोमेट्रियोसिस एक दुर्लभ लेकिन गंभीर स्थिति है, जिसमें गर्भाशय जैसी कोशिकाएं शरीर के अन्य हिस्सों में एक्टिव बनी रहती हैं। एस्ट्रोजन के कम होने के बावजूद, हार्मोनल असंतुलन और लोकल एस्ट्रोजन प्रोडक्शन के कारण यह समस्या जारी रह सकती है।

एंडोमेट्रियोसिस को आमतौर पर फर्टिलिटी एज की महिलाओं की बीमारी माना जाता है, लेकिन यह केवल उसी तक सीमित नहीं है। कई मामलों में यह समस्या मेनोपॉज के बाद भी बनी रह सकती है या पहली बार सामने आ सकती है। यशोदा हॉस्पिटल्स, हैदराबाद की कंसल्टेंट ऑब्स्टेट्रिशियन और गायनेकोलॉजिस्ट, डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के अनुसार, भले ही मेनोपॉज के बाद शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का लेवल कम हो जाता है, फिर भी कुछ महिलाओं में एंडोमेट्रियोसिस एक्टिव रह सकता है। यह स्थिति दुर्लभ जरूर है, लेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि इसके लक्षण कई बार अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते होते हैं और देर से पहचान में आते हैं।

डॉ. एम. वी. ज्योत्सना बताती हैं कि एंडोमेट्रियोसिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें यूट्रस की अंदरूनी परत (एंडोमेट्रियम) जैसी कोशिकाएं शरीर के अन्य हिस्सों, जैसे ओवरी, फैलोपियन ट्यूब, आंत, ब्लैडर या पेल्विक एरिया में विकसित होने लगती हैं। सामान्य रूप से यह बीमारी पीरियड्स के दौरान ज्यादा एक्टिव होती है, क्योंकि यह हार्मोनल बदलावों, खासकर एस्ट्रोजन पर निर्भर करती है लेकिन मेनोपॉज के बाद भी, जब पीरियड्स बंद हो जाते हैं, कुछ महिलाओं में यह टिश्यू पूरी तरह समाप्त नहीं होते। डॉ. एम. वी. ज्योत्सना बताती हैं कि कई बार यह टिश्यू शरीर में निष्क्रिय अवस्था में मौजूद रहते हैं और किसी कारण से दोबारा एक्टिव हो जाते हैं। इसके अलावा, कुछ महिलाओं में यह समस्या पहली बार भी मेनोपॉज के बाद दिखाई दे सकती है।

मेनोपॉज के बाद एंडोमेट्रियोसिस क्यों होता है?

मेनोपॉज के बाद एंडोमेट्रियोसिस के कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन कई संभावित कारण बताए गए हैं। सबसे प्रमुख कारण है शरीर में मौजूद एंडोमेट्रियल टिश्यू का बचा रहना। ये टिश्यू पहले से शरीर में मौजूद होते हैं और हार्मोन के प्रभाव से एक्टिव हो सकते हैं।

  • सबसे पहला कारण है शरीर में पहले से मौजूद एंडोमेट्रियल टिश्यू का बने रहना। ये टिश्यू वर्षों तक शरीर में मौजूद रह सकते हैं और थोड़े से हार्मोनल बदलाव के कारण फिर से एक्टिव हो सकते हैं।
  • कई महिलाएं मेनोपॉज के लक्षणों को कम करने के लिए हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) लेती हैं। यह थेरेपी शरीर में एस्ट्रोजन का लेवल बढ़ा सकती है, जिससे एंडोमेट्रियोसिस के टिश्यू फिर से एक्टिव हो सकते हैं।
  • एंडोमेट्रियोसिस के टिश्यू खुद ही एस्ट्रोजन बना सकते हैं, जिससे यह बीमारी मेनोपॉज के बाद भी जारी रह सकती है।

डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के अनुसार, इम्यून सिस्टम की भूमिका भी इस बीमारी में अहम होती है। सामान्य परिस्थितियों में शरीर का इम्यून सिस्टम असामान्य टिश्यू को पहचानकर खत्म कर देता है, लेकिन जब यह सिस्टम कमजोर हो जाता है, तो ये टिश्यू शरीर में बने रहते हैं और धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं। इसके अलावा, जेनेटिक फैक्टर्स भी एंडोमेट्रियोसिस के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। जिन महिलाओं के परिवार में यह समस्या पहले से रही है, उनमें इसके होने की संभावना ज्यादा होती है।

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endometriosis after menopause

किन महिलाओं को ज्यादा खतरा होता है?

मेनोपॉज के बाद एंडोमेट्रियोसिस का खतरा हर महिला में समान नहीं होता है। डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के अनुसार, कुछ महिलाओं में मेनोपॉज के बाद एंडोमेट्रियोसिस का खतरा ज्यादा होता है।

  • जिन महिलाओं को पहले एंडोमेट्रियोसिस रहा है
  • जिनमें लंबे समय तक एस्ट्रोजन का एक्सपोजर रहा हो
  • जल्दी पीरियड्स शुरू होना या देर से मेनोपॉज होना
  • HRT का उपयोग, खासकर केवल एस्ट्रोजन थेरेपी
  • परिवार में इस बीमारी का इतिहास

World Health Organization के अनुसार, जेनेटिक फैक्टर्स यानी फैमली हिस्ट्री महिलाओं में इस तरह की बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकती है।

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मेनोपॉज के बाद एंडोमेट्रियोसिस के लक्षण

मेनोपॉज के बाद होने वाला एंडोमेट्रियोसिस अपने लक्षणों के कारण अक्सर पहचान में नहीं आ पाता, क्योंकि इसके संकेत कई अन्य सामान्य बीमारियों से मिलते-जुलते होते हैं। इस स्थिति में सबसे आम समस्या पेल्विक एरिया में लगातार या बार-बार होने वाला दर्द होता है, जिसे कई महिलाएं सामान्य पेट दर्द या उम्र से जुड़ी परेशानी समझकर नजरअंदाज कर देती हैं। यह दर्द हल्का भी हो सकता है और कई बार इतना ज्यादा हो सकता है कि रोजमर्रा की एक्टिविटी पर असर डालने लगे।

  • इसके अलावा, कुछ महिलाओं को मल त्याग (बॉवेल मूवमेंट) के दौरान दर्द महसूस हो सकता है या पेशाब करते समय जलन और असहजता हो सकती है। 
  • कई बार यह समस्या गैस, एसिडिटी या यूरिन इंफेक्शन जैसी लगती है, जिससे सही बीमारी का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। 
  • पेट से जुड़े लक्षण जैसे बार-बार पेट फूलना, गैस बनना, कब्ज रहना या पेट में भारीपन भी एंडोमेट्रियोसिस का संकेत हो सकते हैं।
  • इस स्थिति में शरीर के अंदर सूजन भी हो सकती है, जिससे पेट में लगातार असहजता बनी रहती है। 

यही कारण है कि महिलाएं अक्सर इन लक्षणों को सामान्य पाचन समस्या या उम्र बढ़ने के असर के रूप में ले लेती हैं लेकिन क्योंकि ये लक्षण स्पष्ट नहीं होते और कई अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते होते हैं, इसलिए एंडोमेट्रियोसिस का सही समय पर पता नहीं चल पाता है। 

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क्या यह कैंसर का कारण बन सकता है?

डॉ. एम. वी. ज्योत्सना बताती हैं कि यह दुर्लभ है, लेकिन कुछ मामलों में एंडोमेट्रियोसिस से कैंसर का खतरा भी जुड़ा हो सकता है। लंबे समय तक बने रहने वाले एंडोमेट्रियोसिस में मैलिग्नेंट ट्रांसफॉर्मेशन यानी कैंसर बनने का खतरा बहुत कम लेकिन मौजूद रहता है। मेनोपॉज के बाद यह जोखिम इसलिए और बढ़ सकता है क्योंकि इस समय हार्मोनल बदलाव होते हैं और कई महिलाएं हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) लेती हैं, जिससे शरीर में एस्ट्रोजन का लेवल बढ़ सकता है। यह एस्ट्रोजन एंडोमेट्रियोसिस के टिश्यू को एक्टिव कर सकता है और कुछ मामलों में असामान्य कोशिकाओं के विकास को बढ़ावा दे सकता है।

साल 2024  में JAMA Network पर प्रकाशित रिसर्च में पाया गया कि एंडोमेट्रियोसिस वाली महिलाओं में ओवेरियन कैंसर का जोखिम सामान्य महिलाओं की तुलना में 4 गुना तक अधिक हो सकता है, खासकर गंभीर प्रकार (deep infiltrating endometriosis) में यह जोखिम और ज्यादा बढ़ जाता है।

साल 2024 में  Radiological Society of North America के Radio Graphicsमें प्रकाशित रिव्यू के अनुसार, एंडोमेट्रियोसिस एक जटिल और लंबे समय तक रहने वाली बीमारी है, जो मेनोपॉज के बाद भी कुछ महिलाओं में देखी जा सकती है। इस अवस्था में इसका कारण पहले से मौजूद बीमारी का दोबारा एक्टिव होना या नई तरह से विकसित होना हो सकता है। मेनोपॉज के बाद यह बीमारी आमतौर पर कम एक्टिव होती है, लेकिन इसमें कैंसर में बदलने का खतरा बढ़ जाता है, खासकर उन महिलाओं में जो हार्मोन थेरेपी लेती हैं। इसके लक्षण जैसे लगातार पेट या पेल्विक दर्द मरीज को परेशान कर सकते हैं, या कभी-कभी यह जांच के दौरान पता चलता है। सही समय पर पहचान और इलाज बहुत जरूरी है। अल्ट्रासाउंड और एमआरआई जैसी जांचें इसकी पहचान में मदद करती हैं। इलाज में सर्जरी या हार्मोन को कंट्रोल करने वाली दवाएं दी जाती हैं, जिससे मरीज की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।

समय पर इलाज न कराने के खतरे

डॉ. एम. वी. ज्योत्सना बताती हैं, ''अगर एंडोमेट्रियोसिस का समय पर इलाज नहीं किया जाए, तो यह कई गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है। सबसे आम समस्या है Adhesions यानी शरीर के अंदर चिपकने वाले टिश्यू का बनना। इससे आंत, ब्लैडर और अन्य अंग प्रभावित हो सकते हैं। कुछ मामलों में यह समस्या इतनी गंभीर हो सकती है कि आंत या यूरिनरी ट्रैक्ट में रुकावट हो जाए, जिससे सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है।'' इसके अलावा, लगातार दर्द और असहजता से महिला की मानसिक स्थिति और जीवन की क्वालिटी पर भी नेगेटिव प्रभाव पड़ता है।

जांच और इलाज कैसे होता है?

मेनोपॉज के बाद एंडोमेट्रियोसिस की सही पहचान करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसके लक्षण कई अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते होते हैं। डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के अनुसार, इसकी जांच आमतौर पर मरीज के लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री को समझने से शुरू होती है। डॉक्टर सबसे पहले यह जानने की कोशिश करते हैं कि दर्द कब से है, कितना है और किन परिस्थितियों में बढ़ता है।

इसके बाद इमेजिंग टेस्ट जैसे अल्ट्रासाउंड या MRI कराए जा सकते हैं, जिससे पेल्विक एरिया में किसी असामान्य टिश्यू या सिस्ट का पता लगाया जा सके। हालांकि, एंडोमेट्रियोसिस की पुष्टि के लिए सबसे सटीक जांच लैप्रोस्कोपी मानी जाती है। यह एक मिनिमली इनवेसिव सर्जिकल प्रक्रिया होती है, जिसमें एक छोटे कैमरे की मदद से शरीर के अंदर की स्थिति को सीधे देखा जाता है और जरूरत पड़ने पर टिश्यू का सैंपल (बायोप्सी) भी लिया जा सकता है।

इलाज की बात करें तो यह पूरी तरह मरीज की स्थिति, लक्षणों की गंभीरता और उम्र पर निर्भर करता है। हल्के मामलों में दर्द को कम करने के लिए पेन मैनेजमेंट और दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ मामलों में हार्मोनल थेरेपी दी जाती है, जिससे एंडोमेट्रियोसिस टिश्यू की एक्टिविटी को कम किया जा सके। अगर समस्या ज्यादा गंभीर हो या अन्य अंगों पर असर डाल रही हो, तो सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। इस दौरान डॉक्टर एंडोमेट्रियोसिस टिश्यू को हटाते हैं, जिससे दर्द और अन्य समस्याओं को कम किया जा सके।

डॉक्टर से कब मिलें?

मेनोपॉज के बाद एंडोमेट्रियोसिस के लक्षण अक्सर सामान्य बीमारियों जैसे गैस, एसिडिटी या यूरिन इंफेक्शन से मिलते-जुलते होते हैं, इसलिए महिलाएं इन्हें नजरअंदाज कर देती हैं लेकिन डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के अनुसार, कुछ संकेत ऐसे होते हैं जिन्हें बिल्कुल भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। अगर आपको लंबे समय तक पेल्विक एरिया में दर्द बना रहता है या बार-बार होता है, तो यह एंडोमेट्रियोसिस का संकेत हो सकता है। खासकर अगर यह दर्द धीरे-धीरे बढ़ रहा हो या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है। इसके अलावा, मल त्याग के दौरान दर्द, पेशाब करते समय जलन या असहजता और लगातार पेट फूलना या कब्ज रहना भी इस समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं।

endometriosis after menopause

अगर मेनोपॉज के बाद अचानक ये लक्षण शुरू हों या पहले से मौजूद समस्या ज्यादा बढ़ जाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही, अगर किसी महिला को पहले एंडोमेट्रियोसिस रहा है या वह हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) ले रही है, तो उसे नियमित जांच कराते रहना चाहिए।

निष्कर्ष

मेनोपॉज के बाद एंडोमेट्रियोसिस एक दुर्लभ समस्या है, जिसे नजरअंदाज करना सही नहीं है। डॉ. एम. वी. ज्योत्सना के अनुसार, यह समस्या केवल फर्टिलिटी एज तक सीमित नहीं है, बल्कि हार्मोनल बदलाव, इम्यून सिस्टम और अन्य कारणों से मेनोपॉज के बाद भी बनी रह सकती है या पहली बार सामने आ सकती है। इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके लक्षण स्पष्ट नहीं होते और कई अन्य समस्याओं से मिलते-जुलते होते हैं, जिससे इसका सही समय पर पता लगाना मुश्किल हो जाता है। हालांकि, अच्छी बात यह है कि सही समय पर जांच, उचित इलाज और डॉक्टर की निगरानी से इस बीमारी को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। 

FAQ

  • क्या मेनोपॉज के बाद एंडोमेट्रियोसिस अपने आप ठीक हो जाता है?

    हर मामले में ऐसा नहीं होता। कुछ महिलाओं में लक्षण कम हो सकते हैं, लेकिन कई मामलों में बीमारी एक्टिव बनी रह सकती है या दोबारा शुरू हो सकती है।
  • क्या एंडोमेट्रियोसिस बिना दर्द के भी हो सकता है?

    कुछ महिलाओं में यह बिना किसी स्पष्ट दर्द के भी मौजूद हो सकता है, जिससे इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है।
  • क्या वजन बढ़ने का एंडोमेट्रियोसिस से कोई कनेक्शन है?

    सीधे तौर पर नहीं, लेकिन मोटापा हार्मोनल असंतुलन को बढ़ा सकता है, जिससे लक्षण बिगड़ सकते हैं।
  • क्या डाइट से एंडोमेट्रियोसिस कंट्रोल किया जा सकता है?

    हेल्दी डाइट, एंटी-इंफ्लेमेटरी फूड और कम प्रोसेस्ड फूड लेने से सूजन कम करने में मदद मिल सकती है, जिससे लक्षणों में राहत मिलती है।
  • क्या एक्सरसाइज से एंडोमेट्रियोसिस में फायदा होता है?

    नियमित हल्की एक्सरसाइज और योग शरीर में सूजन और दर्द को कम करने में मदद कर सकते हैं।

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Akanksha Tiwari

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आकांक्षा तिवारी हेल्थ और लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 6 साल का अनुभव रखती हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत डिजिटल मीडिया से की और फिलहाल जागरण न्यू मीडिया (Onlymyhealth) में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं। आकांक्षा को स्वास्थ्य, पोषण और फिटनेस जैसे विषयों पर लिखने का अच्छा अनुभव है। वे पत्रकारिता और जनसंचार में पोस्ट ग्रैजुएट हैं। रिसर्च, SEO और फैक्ट-चेकिंग में उनकी खास पकड़ है और वे हमेशा प्रमाणिक और भरोसेमंद जानकारी देने की कोशिश करती हैं। Editorial Policy: आकांक्षा द्वारा लिखे गए सभी लेखों की हमारी संपादकीय टीम द्वारा तथ्य-जांच की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विषय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा की जाती है।

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    Apr 23, 2026 21:21 IST

    Modified By : Akanksha Tiwari
  • Apr 23, 2026 21:21 IST

    Published By : Akanksha Tiwari
    Reviewed By : Dr M V Jyothsna

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