बिना रिलेशनशिप के भी ऐसे रह सकते हैं खुश

कुछ तो गडबड है, सिंगल क्यों है आखिर? कहीं हार्ट ब्रेक का मारा तो नहीं बेचारा ? अब तक मिस राइट नहीं मिली क्या.? कोई गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम तो नहीं.?अकेली जिंदगी जीने वाला व्यक्ति ऐसी मनोरंजक किताब की तरह है, जिसे कलीग्स, पडोसियों से लेकर कुक तक पढना

 अन्‍य
सभीWritten by: अन्‍य Published at: Nov 28, 2012Updated at: Nov 18, 2015
बिना रिलेशनशिप के भी ऐसे रह सकते हैं खुश

कुछ तो गडबड है, सिंगल क्यों है आखिर? कहीं हार्ट ब्रेक का मारा तो नहीं बेचारा..? अब तक मिस राइट नहीं मिली क्या..? कहीं गे तो नहीं..? कोई गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम तो नहीं..? सिंगल और वह भी 30-40 पार का, अडोसी-पडोसी सहित पूरा समाज चिंतित होने लगता है। अकेली जिंदगी जीने वाला व्यक्ति ऐसी मनोरंजक किताब की तरह है, जिसे कलीग्स, पडोसियों से लेकर ड्राइवर-मेड-धोबी और कुक तक पढना चाहते हैं और अपनी-अपनी समझ से कहानी के अर्थ निकालते-सुनाते हैं। यह ऐसी किताब होती है जिस पर लेखक के अलावा पूरी दुनिया का कॉपीराइट होता है। तुर्रा यह कि लेखक को रॉयल्टी देना तो दूर, क्रेडिट तक नहीं दिया जाता। दरियादिली-विनम्रता से पेश आएं तो करेक्टर पर सवाल, गुस्सा या खीझ दिखा दें तो फ्रस्टेटेड..।

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यह अलग बात है कि दोस्तों, मेहमानों, रिश्तेदारों के लिए इनका घर सराय की तरह सर्वदा सुलभ हो सकता है।

यार, तेरे घर एक पार्टी रख लें आज?

गांव वाले मामा जी के ससुर जी के भाई की बहू के पैर में फ्रैक्चर हो गया है, तुम्हारे यहां रहकर इलाज करा लें?

तुम्हारे तो मजे हैं। कोई जिम्मेदारी नहीं..। जितने मुंह उतनी बातें। लेकिन फायदे भी कम नहीं हैं सिंगलहुड के। सबसे बडा तो यही है कि मार्केट वैल्यू नहींघटती। चालीस क्या-पचास भी पार कर लें, कोई न कोई इंतजार में बैठी ही होती है या कम से कम लोग ऐसा जताते रहते हैं। जरूरत बस यह है कि करियर ठीक हो, बैंक बैलेंस हो, एक अदद घर हो..।

शादीशुदा ज्यादा कमाते हैं?

करियर की बात करें तो करियर बनता भले ही शादी से पहले हो, बढता-संवरता शादी के बाद ही है। शादी से परिवार नामक संस्था में भरोसा जगता है, फिर एक अदद घर बसता है। घर बसते ही उसे संवारने के सामान जुडते हैं। फिर आ जाते हैं नए सदस्य परिवार में। गृहस्थी की इस गाडी में हर स्टेशन पर जिम्मेदारियों के कुछ और डिब्बे जुड जाते हैं।

यह हम ही नहीं मानते, जर्मनी की एक यूनिवर्सिटी का शोध भी यही कहता है। इसके अनुसार शादीशुदा लोग सिंगल्स की तुलना में ज्यादा कमाते हैं। शादी तय होते ही वे आने वाली जिम्मेदारियों के बारे में सोचने लगते हैं और ज्यादा मेहनत करने लगते हैं। शादी के बाद उनकी निजी जिंदगी सुकून भरी हो जाती है और वे बेफिक्र होकर काम पर ध्यान दे पाते हैं। उनकी कार्यक्षमता बढ जाती है। जाहिर है वे अपने काम में बेहतर नतीजों तक पहुंचते हैं। अविवाहितों की तुलना में शादीशुदा लोग अपने वेतन से कम संतुष्ट रहते हैं, इसलिए वे अधिक कमाने की जुगत में रहते हैं। यही असंतुष्टि उन्हें आगे बढने को प्रेरित करती है। शादी उन्हें बेहतर लाइफस्टाइल की ओर खींचती चली जाती है।

शादी के बिना जीना भी जीना है

दार्शनिक-चिंतक प्लेटो का मानना था कि परिवार वह संस्था है जहां औरतों की प्रतिभा चूल्हे-चक्की में व्यर्थ होती है और पुरुष की क्षमताएं पारिवारिक जिम्मेदारियां उठाने में जाया होती हैं। यह बात स्थान-काल-परिस्थिति के संदर्भ में कही गई थी। लेकिन आज की स्थितियां भिन्न हैं। आर्टिमिस हॉस्पिटल (गुडगांव) की लाइफस्टाइल एक्सपर्ट डॉ. रचना सिंह कहती हैं, आजकल लोग स्वतंत्र ढंग से सोचने वाले हैं। शादी बडा मसला है। शादी के बगैर भी कंपेनियनशिप में रहा जा सकता है। जरूरी नहींकि सिंगल लोग गैर-जिम्मेदार हों या शादी से भागते हों। यह भी जरूरी नहीं कि महज इसलिए शादी कर लें कि शादी करनी है। शादी प्यार के लिए की जाती है और यदि प्यार न मिले तो शादी का कोई मतलब नहीं। घर-परिवार-समाज के लिए तो शादी की नहीं जा सकती। अकेले लोग भी खुश रह सकते हैं। दोस्त बनाएं, सामाजिक जीवन में व्यस्त रहें, अपने शौक पूरे करें।

विदेशों में लोग अपने ढंग से अकेलेपन का आनंद लेते हैं। वे दुनिया भर में घूमते हैं, रचनात्मक कार्य करते हैं, रेस्टरां में अकेले खा सकते हैं। भारत में एक साथी पता नहीं क्यों जरूरी माना गया है। शादी हो तो अच्छा है, लेकिन न हो तो इसमें बुरा कुछ नहीं। सिंगल रहने के बहुत से फायदे भी हैं, उन्हें देखें।

शादी बिना क्या जीना

समाज में एकला चलो रे में यकीन रखने वालों की संख्या बढ रही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अकेले रहने की भी इच्छा बढ रही है। यू.एस. के जनसंख्या आंकडों के अनुसार वहां 30 से 34 की उम्र के अविवाहित, योग्य सिंगल्स की संख्या बढ रही है। इस आयु-वर्ग के 33 फीसदी लोग ऐसे भी हैं, जो शादी नहीं करना चाहते। लेकिन ज्यादा संख्या लेट मैरिज करने वालों की है। हालांकि 98 फीसदी मानते हैं कि वे लंबे समय तक चलने वाले रिश्ते चाहते हैं।

आंकडों के मुताबिक ये सभी लोग ऐसे हैं, जो व्यक्तित्व, स्मार्टनेस, सफलता के मापदंडों के मुताबिक मिस्टर राइट हैं। ये गंभीर रिश्ते और करियर के बीच तालमेल बिठा सकते हैं। एक वेबसाइट के सर्वे में कुछ बातें निकलती हैं-

  1. 98 प्रतिशत सिंगल्स स्थायी रिश्ते की तलाश में हैं।
  2. 94 फीसदी करियर व रिश्तों में तालमेल करने की स्थिति में हैं।
  3. अकेले रहने वालों में 79 प्रतिशत चैरिटी कार्र्यो में यकीन रखते हैं।
  4. 75 प्रतिशत का मानना है कि उनकी आदर्श काल्पनिक स्त्री ही वास्तव में उनकी बेस्ट फ्रेंड हो सकती है।
  5. 58 प्रतिशत ऐसे लोग भी हैं जिन्हें कभी न कभी धोखा मिला।

और भी दुख हैं जमाने में

पिछले महीने मुंबई से दिल्ली पुस्तक मेले में आए ब्लॉगर, कार्टूनिस्ट, लेखक प्रमोद सिंह 46 वर्ष के हैं और अकेले हैं। अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं..इस गीत से प्रभावित प्रमोद जी के दोस्तों की संख्या बहुत है। कहते हैं, कन्फ्यूज रहा मैं। शादी करना नहीं चाहता था या कहूं कि हुई नहीं। मसरूफ रहा और अपनी शर्तो पर जीना चाहा। लिहाजा कभी मैं नहीं समझ सका दूसरे को तो कभी सामने वाला नहीं समझ सका। अकेले रहने की सुविधा यह है कि किसी के प्रति जवाबदेही नहीं होती। लेकिन यही आजादी असुविधा भी बनती है, क्योंकि अपनी इच्छा से जीने की भी एक सीमा होती है। कवि शमशेर ने लिखा था कि समाज से कटे रहना एक खास ऐंठ वाली तकलीफ देता है। इससे भी परे मोह का तत्व अहम है। आम इंसान स्नेह या प्यार से अलग नहीं जा सकता। लेकिन जिंदगी में और भी बहुत-कुछ है शादी के सिवा..।

दिल्ली के फैशन डिजाइनर रवि बजाज पिछले 10-11 वर्र्षो से अकेले हैं। रवि के घर पर पिछले दो-तीन सालों से कुक तक नहीं है। पूरे घर की व्यवस्था खुद संभालने वाले रवि का कहना है कि उनका घर किसी भी सामान्य घर की तुलना में व्यवस्थित है। प्राइवेसी पसंद करने वाले रवि का घर दोस्तों के लिए हरदम खुला रहता है।

बहरहाल, अकेले रहने वाले चंद लोगों से हमारी टीम ने जानना चाहा उनकी लाइफस्टाइल के बारे में। अलग-अलग मिजाज और प्रोफेशन से जुडे लोगों ने क्या कहा, आप भी पढें।

भीष्म पितामह जैसी प्रतिज्ञा नहीं की मैं कुंवारा हूं या अविवाहित, इस सवाल से पहले इतना जरूर कहूंगा कि हां, मैंने अब तक शादी नहीं की है। क्यों नहीं की, इसका कोई जवाब नहीं। फिर भी मैं मानता हूं कि शादी-ब्याह संयोग की बात है। देखिए, भीष्म पितामह की भूमिका मैंने जरूर निभाई है, लेकिन ऐसी कोई भीष्म प्रतिज्ञा नहीं की है कि जिंदगी भर कुंवारा रहूंगा।

कुछ हद तक कहूं तो करियर में सफलता भी देरी से मिली है। हो सकता है देर-सबेर शादी हो भी, कुछ कहा नहीं जा सकता। टीवी धारावाहिक महाभारत के भीष्म पितामह का प्रभाव आम लोगों पर इतना ज्यादा है कि मुझे खुद से भी बडी स्त्रियों को सौभाग्यवती भव या आयुष्मान भव का आशीर्वाद देना पडता है। अब बताइए कैसे होगी मेरी शादी?

मैं नहीं मानता कि शादी करने-न करने से आपका महत्व घटता-बढता है। ग्लैमर व‌र्ल्ड में लडकियों को जरूर शादी से नुकसान हो सकता है, लेकिन अब तो यह धारणा भी शादीशुदा अभिनेत्रियों ने तोडी है।

मैं नहीं मानता कि जो लोग शादी नहीं करते, वे करियर पर ज्यादा ध्यान दे पाते हैं। जो लोग अपने काम और निजी जिंदगी को अलग-अलग रख सकते हैं, वे कामयाब होते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनीति में सक्रिय लोग अपवाद हैं। लेकिन अमिताभ बच्चन, आमिर खान, शाहरुख जैसे तमाम बडे कलाकारों की शादी से उनके करियर पर कोई प्रभाव नहीं पडा।

मैं विवाह संस्था में यकीन रखता हूं। लेकिन यह भी मानता हूं कि शादी के साथ न्याय कर सकें, तभी करें। अभी मैं खुद अपना बॉस हूं, सिंगल रहने का यही फायदा है। मेरे स्टाफ में कोई लडकी नहीं है। यहां तक कि कोई रिसेप्शनिस्ट तक नहीं है। मैं स्त्रियों का सम्मान करता हूं। मेरी अच्छी दोस्त भी हैं वे, लेकिन दोस्ती सीमाओं में ही रही है। सच कहूं तो मेरा लगाव बच्चों से है। शक्तिमान के बाद से तो यह लगाव ज्यादा हो गया है। मैं क्लब या पार्टी में नहीं जाता। रात को हर हाल में 11 बजे तक सो जाता हूं।

मुझे ऐसी स्त्रियां पसंद हैं, जो मानती हों कि वे औरत हैं। पुरुषों की बराबरी करने वाली या उनका अनुसरण करने वाली स्त्रियां मुझे पसंद नहीं हैं। मैं पुराने खयालात का नहीं हूं, लेकिन तथाकथित आधुनिक औरतों की तेजी मुझे नहीं भाती। निजी तौर पर मैं कंपेनियनशिप में भरोसा नहीं रखता। हालांकि जो लोग मुहूर्त निकलवाकर शादी करते हैं, उनका भी तलाक होता है और लिव-इन में रहने वाले लोग भी निभा ले जाते हैं। यह आपसी समझदारी पर निर्भर करता है। शादी संस्था में मेरा भरोसा है। हो सकता है भविष्य में शादी कर लूं, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।

अकेला हूं लेकिन तनहा नहीं

मैं सिंगल हूं, सभी जानते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तनहा हूं। अकेले होना और तनहा होना अलग-अलग बातें हैं। कुछ साल पहले डैड यश जौहर जी का निधन हो गया। तब से मॉम हीरू जौहर ही मेरे सबसे करीब हैं। वह मेरे लिए सब कुछ हैं, मेरे लिए दुनिया में सबसे पहले वही हैं।

शादी नहीं की और कह नहीं सकता कि भविष्य में करूंगा या नहीं। कोई खास कारण भी नहीं है मेरे पास। बस नहीं हुई शादी और मैं इसके लिए पछताता भी नहीं, न किसी लडकी को अपनी जिंदगी में मिस करता हूं। मेरी सबसे अच्छी दोस्त गौरी है, जिससे मिलने के लिए शाहरुख की इजाजत नहीं लेनी पडती मुझे। गौरी से मैं अपनी निजी से प्रोफेशनल जीवन तक की सभी बातें शेयर कर सकता हूं। अपनी अजीबोगरीब बातें भी मैं उससे बांटता हूं। वह मेरे लिए दोस्त, बहन, मां, गाइड हर रूप में मौजूद है। इसके अलावा काजोल से मेरी गहरी छनती है। काजोल उन लडकियों में है, जो ज्यादा खुलती नहीं, लेकिन वह मेरी राजदार है। इन महिला ब्रिगेड के कारण कभी महसूस नहीं हुआ कि मैं अकेला हूं या मेरी जिंदगी में कोई स्पेशल लडकी नहीं है। मॉम, गौरी, काजोल, रानी सभी ने मेरे जीवन को खुशियों से भरा है। ये सब मेरे परिवार का हिस्सा हैं। गौरी, काजोल दिल की बहुत साफ हैं, खुशमिजाज हैं। उनमें कोई लागलपेट नहीं है। अगर वे अपनी जिंदगी में थोडा अलग-थलग रहती हैं तो यह उनका गुण है या दोष, मैं नहीं कह सकता। मैं तो सिर्फ उनकी दोस्ती पर नाज कर सकता हूं।

हां, मेरी एक दोस्त मलाइका अरोडा खान भी है। यह दोस्ती पिछले आठ-नौ वर्षो से है। मेरी निगाह में वह परदे पर जितनी सेक्सी दिखती हैं, परदे के पीछे वह उतनी ही सुशील बहू, प्यारी पत्नी व मां हैं। सबसे बडी बात कि एक संवेदनशील इंसान के सभी गुण हैं उनमें। मलाइका से मिलने के बाद मैं हमेशा सकारात्मक ऊर्जा महसूस करता हूं।

मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि शादी न करने के कारण मुझे कभी किसी ने हलके ढंग से लिया है। न मेरे करियर पर इसका सकारात्मक-नकारात्मक प्रभाव पडा है। मैं क्या कर रहा हूं या नहीं कर पा रहा हूं, इसका शादी से कोई लेना-देना नहीं है।

अकेले रहना न तो सजा है और न इसमें कोई मजा है। मैंने अब तक की जिंदगी अपनी शर्तो पर जी है। शायद मैं शादी जैसे पहलू पर सोचता ही नहीं।

सिंगल रहने पर कोई अफसोस नहीं

इंसान बचपन में जैसे माहौल में रहता है, भविष्य में वैसा ही बनता है। मेरा बचपन मुंबई में एक मध्यवर्गीय परिवार में बीता। हम चाल में रहते थे। वहां का माहौल लाउड होता है। चेतन-अवचेतन मन में वहां का माहौल, जिंदगी, उनका रहन-सहन व बोलचाल सब मैं महसूस करता था। पांच-सात वर्ष की उम्र से पहले का तो कुछ याद नहीं है, लेकिन बहन बेला और मां लीलाबेन मुझे बताती थीं कि मैं किसी शांत समुंदर जैसा बच्चा था। शैतानी भरी हरकतें मैं नहींकरता था। बच्चों को पालने में मेरी मां का असाधारण योगदान हैं। मैं अपनी बहन और मां से गहराई से जुडा हूं। जिंदगी के हालात ने मुझे तनहा और खुद में खोया हुआ बच्चा बना दिया। पढने का बेहद शौक था। जब भी मौका मिलता, पढता रहता। जेहन में सोच-विचार कर नहीं, लेकिन एक बात तब भी थी कि कुछ अलग करना है, कुछ ऐसा कि मेरी मां और बेला को मुझ पर गर्व हो। इतने विचारों के बीच कभी शादी का खयाल मन में आया ही नहीं। सोचा-समझा फैसला यह नहीं था, बस ऐसा ही होता गया।

निजी तौर पर मेरा अनुभव है कि बेला की शादी होने के बाद मैं मानसिक तौर पर फ्री था। अपने करियर और पढाई-रिसर्च जैसी तमाम बातों ने मुझे अपने घेरे में ले लिया। मैं घंटों तक पढता रहता हूं। जाहिर है, अगर शादी होती तो अपने काम के प्रति समर्पण थोडा कम होता। शादी व पारिवारिक जिम्मेदारियों में हर आदमी उलझा है, ऐसा मेरा सोचना हैं। शादी के बाद भी जिन हस्तियों ने अपने करियर के लिए सौ फीसदी दिया, मैं उन्हें सलाम करता हूं। यहां तक कि कई अभिनेत्रियों पर भी यह बात लागू होती है। माधुरी, श्रीदेवी, जूही जैसी अभिनेत्रियां करियर के साथ पारिवारिक जीवन भी चला रही हैं। हालांकि यह इतना आसान नहीं है।

अपने सिंगल होने को लेकर कोई अफसोस मुझे नहीं है, न मुझे कभी यह महसूस हुआ कि किसी ने मेरे प्रति भरोसा न जताया हो। व्यक्ति नहीं, उसका काम बोलता है। मेरी छवि भी एक गंभीर शख्स की रही है। यह नहीं कहूंगा कि लडकियों से मेरी दोस्ती नहीं होती, लेकिन मेरा उसूल यह है कि जब वे फिल्म सेट पर होती हैं, उस वक्त मैं सिर्फ उनके किरदार को उभारने की कोशिश करता हूं। नायिकाओं के किरदार के साथ ही उनके परिधान तक चुनने का काम मेरा होता है। रानी, ऐश्वर्या, माधुरी जैसी तमाम नायिकाओं से मेरे मधुर संबंध हैं, लेकिन दोस्ती जैसा भाव नहीं है, क्योंकि स्वभाव से ही मैं कुछ संकोची हूं। किसी लडकी से प्रेम हुआ या नहीं, इसका जवाब देना थोडा मुश्किल है मेरे लिए, लेकिन शादी न होने को लेकर कोई शिकायत मुझे नहीं है। मैं अपने काम से बेहद प्यार करने वाला आदमी हूं। फिलहाल सिंगल रहकर खुश हूं। लेकिन जिंदगी भर शादी नहीं करूंगा, यह भी नहीं कह सकता।

साथी की तलाश अब भी है

कामकाज की आपाधापी में जिंदगी के पचास-पचपन साल यूं बीते कि कुछ पता न चला। रोलर-कोस्टर की तरह जिंदगी में भी ढेरों पडाव आए। पिछले 20 वर्र्षो से अकेला हूं मैं। शादी हुई, लेकिन पत्‍‌नी से तालमेल नहीं बैठा और वह चली गईं। तब से न तो कोई आया और न मैंने ऐसी कोशिश की। फिर से घर बसाने जैसी बात दिल में आई ही नहीं।

अकेला हूं और इसे अपने ढंग से जीता हूं। न तो कोई बंधन है, न किसी के प्रति जवाबदेही। अकेले रहने का मतलब यह नहीं है कि किसी से जुडाव नहीं हुआ। कुछ रिश्ते भी बने।

बीते 15-20 सालों से जिंदगी आजाद पंछी की तरह बिताई है। मैं यकीनी तौर पर मानता हूं कि शादी से पुरुष की आजादी छिन जाती है, रचनात्मक कार्र्यो के लिए वक्त नहीं बच पाता। शादी होने पर रिश्तेदार-बच्चे, उनका भविष्य, रिश्तेदारों के साथ निभाना...ऐसे हजारों कारण होते हैं, जो काम में रुकावट डालते हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि शादीशुदा लोग बेचारे और दुखियारे हैं। इत्तेफाक ही है कि मैं शादी में खुद को फिट नहीं महसूस कर पाता।

डेढ वर्ष का था, मां चल बसीं। बडे भाई ने परवरिश की। छोटा सा था, किसी गलती पर भाई ने डांटा और मैंने घर छोड दिया, सीधे हरिद्वार पहुंचा। ऋषिकेश, रुद्रप्रयाग और केदारनाथ घूमता गया। केदारनाथ में प्रकृति के सौंदर्य को अचंभित देख रहा था कि एक बुजुर्ग स्त्री ने मेरे सिर पर हाथ रखा। मां के जाने के बाद उस स्त्री का ममता-भरा स्पर्श हुआ।

अपने अवचेतन में कई बार मैं मां के गर्भ में चला जाता हूं, उनसे दिल की बातें करता हूं। ऐसी भावनाएं उनसे बांटता हूं, जो किसी दूसरे से नहीं कह पाता। सच तो यह है कि आज भी मां को मिस करता हूं।

यह सौभाग्य नहींरहा कि मां की तरह कोई दूसरी स्त्री करीब आती। न जाने किसे ढूंढ रहा हूं। कई बार तो हम खुद को ही नहीं समझ पाते हैं। ताज्जुब होता है हुसैन साहब पर। फिल्मी नायिकाएं तक उनकी फैन हैं। अपनी तकदीर में ऐसा कुछ नहीं। मुझे यह कहते हुए संकोच नहीं होता कि स्त्री का साथ पाने के लिए वाकई तरसता हूं। पिकासो से लेकर लियोनार्दो द विंशी तक हर महान पेंटर को एक स्त्री ने लुभाया है तो मैं कैसे अछूता रह सकता हूं। मुझे भी एक कंपेनियन की तलाश है। यूं तो मेरा ज्यादातर वक्त पेंटिंग बनाने में जाता है। फिर भी कई बार सोचता हूं कि कोई साथी होता तो अच्छा ही रहता। लेकिन सोचने से क्या होता है, वही होता है जो..।

अकेले जीने की आदत है मुझे

एशिया के जाने-माने बर्ड्स वॉचर और ब‌र्ड्स फ्रॉम माय विंडो जैसी दिलचस्प पुस्तक के लेखक रंजित जी के लिए शादी ऐसा मसला नहीं है, जिस पर ज्यादा बात की जा सके। वे किताबों और चिडियों के बारे में ही बात करना चाहते हैं, लेकिन कुरेदने पर बताते हैं, बचपन में ही पता चला कि मेरे दिल में छेद है। अमेरिका में हुए एक ऑपरेशन के बाद ऐसी समस्या हुई कि चलना-फिरना तक मुश्किल हो गया। लगभग दो साल पूरी तरह बिस्तर पर रहा। अब तक आठ-नौ पेसमेकर लग चुके हैं और पिछले 30 वर्र्षो से ऐसे ही हूं। इंजीनियर बनने का सपना था, लेकिन ऑपरेशन के बाद कमरे के भीतर सिमट कर रह गया। इसी एकांत ने कमरे के बाहर चहचहाती चिडियों की ओर ध्यान आकृष्ट कराया। बाद में यह शौक इतना बढा कि इसी पर काम शुरू कर दिया। शादी न हो पाने का एक कारण सेहत भी रही। सर्वाइव करने की ही समस्या थी। ऐसे में शादी केबारे में कैसे सोचता।

अभी पिता के साथ दिल्ली में हूं। वह अल्जाइमर के मरीज हैं। कभी-कभी व्हील चेयर पर उन्हें बाहर ले जाता हूं। मां की दो-तीन वर्ष पहले कैंसर से मौत हो गई। दो बहने हैं। एक पुणे में और दूसरी यू.एस. में। यहां अकेला हूं। हां-मैनेज करना थोडा मुश्किल होता है। मां के जाने के बाद ज्यादा मुश्किल हो गया है। एक औरत के न रहने पर घर अस्त-व्यस्त हो जाता है। लेकिन अब आदत पड चुकी है सर्वेट्स के हाथ का खाना खाने की। जितना जरूरी होता है उतना ही काम करता हूं। कभी-कभी बहनें आती हैं तो नाराज भी होती हैं अव्यवस्थित घर को देखकर, लेकिन..। रचनात्मक कार्र्यो के लिए अकेलापन बेहतर ही होता है। किसी से बंधा नहीं हूं, अपने हिसाब से काम करता हूं। दस-बारह घंटे वाला जॉब तो है नहीं। सुबह उठकर लिखता-पढता हूं। दिन में गिटार सीखता हूं, जो पुराना शौक था और अब फिर से उसे जिंदा कर रहा हूं। जिम्मेदारियों से भागने जैसा कुछ नहीं है। कई वर्र्षो से पिता की देखभाल कर रहा हूं। वह उठ-बैठ तक नहीं सकते। कोई ऐसा कठोर नियम भी नहीं बना लिया है कि आगे कोई जिंदगी में नहीं आएगा। अभी तो बाइनॉक्युलर से चिडियों को देखना ही इतना भाता है कि कुछ और नहीं दिखता मुझे।

कुछ अच्छे दोस्त हैं, जिनसे मिलना-जुलना, फोन पर बात करना होता है। एक दिन तो सबने अकेले जाना है, साथ जिंदगी का ही होता है।

हालांकि कभी-कभी अकेलापन खलता है। बीमार होता हूं तो जल्दी ठीक होने के बारे में सोचता हूं, क्योंकि करने वाला कोई नहींहै। असल लडाई तो खुद के भीतर होती है। सबको अच्छा लगता है किआसपास लोग रहें। मैं भी बहुत डिमांडिंग था, क्योंकि केयर करने वाले लोग थे आसपास। आज कोई नहींहै तो खुद अपनी केयर कर रहा हूं। किताबें पढना, फिल्में देखना, बच्चों के लिए लिखना, म्यूजिक सीखना-सुनना, यही मेरी दिनचर्या है। अभी एक नई किताब प्रकाशित हुई है। व्यस्त रहता हूं।

 


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