खुदकुशी की बढ़ती घटनाओं का कारण है डिप्रेशन

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jun 13, 2013

अवसादग्रस्‍त आदमी

वैसे आज के तनाव एवं भागदौड़ भरे जीवन में खुदकुशी की घटनायें तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन चमकती-दमकती दुनिया की हस्तियों की खुदकुशी हैरान करती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हमारे समाज में आत्महत्या की जितनी घटनायें होती हैं उनमें आधी घटनायें अवसाद के कारण होती हैं और फिल्मी एवं ग्लैमर की दुनिया की हस्तियों की खुदकुशी के लिये भी डिप्रेशन मुख्य तौर पर जिम्मेदार है।

 

परबीन बॉबी, नफीसा जोसफ, दिव्या भारती, विवेका बाबाजी के बाद अब निःशब्द एवं गजनी जैसी फिल्मों में काम करने वाली नवोदित अभिनेत्री जिया खान की खुदकुशी ने जगमगाते जीवन के अंधेरे को एक बार फिर उजागर कर दिया है।

 

विश्व स्वास्थय संगठन डब्ल्यूएचओ का आकलन है कि भारत में हर साल एक लाख 80 हजार लोग खुदकुशी करते हैं। मनोचिकित्सक एवं दिल्ली साइकेट्रिक सेंटर के निदेशक डॉ. सुनील मित्तल कहते हैं कि यह बताना मुश्किल है कि कुछ लोग प्रतिकूल स्थितियों में क्यों आत्महत्या कर लेते हैं, जबकि अन्य लोग इस तरह का कदम नहीं उठाते हैं, लेकिन इसके बावजूद आत्महत्या की ज्यादातर घटनायें रोकी जा सकती है, क्योंकि इनमें ज्यादातर लोग अवसाद के शिकार होते हैं।

 

आज के आधुनिक जीवन की जटिलताओं एवं समस्याओं के कारण आत्महत्या की घटनाओं में भयानक तेजी आयी है। दिल्ली साइकेट्रिक सेंटर तथा कास्मोस इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड बिहेयिरल साइंसेस (सीआईएमबीएस) के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. समीर कलानी कहते हैं कि वक्त का तकाजा यह है कि देश में व्यक्तिगत और व्यापकरूप से सामाजिक स्तर पर किसी समस्या को देखने के तौर-तरीके एवं दृष्टिकोण में बदलाव लाया जाये।

 

उन्होंने कहा कि आत्महत्या करने वाले ज्यादातर लोग चाहे वे आम लोग हों या बड़ी सख्सियत हों, वे सभी किसी न किसी स्तर पर मानसिक बीमारियों से ग्रस्त होते हैं और उन्हें समुचित सहायता एवं सहारा दिये जाने की जरूरत होती है। किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति से निपटने के लिये अनेक चीजें की जा सकती है। जिन लोगों का दवाइयों एवं काउंसलिंग के जरिये आसानी से इलाज हो सकता है, उनका तब तक इलाज नहीं होता, जब तक उनकी बीमारी अधिक गंभीर नहीं बन जाती है।

 

डॉ. सुनील मित्तल कहते हैं कि करीब 80 प्रतिशत आत्महत्यायें पूर्व संकेत के बाद होती हैं। कुछ आत्महत्यायें क्षणिक आवेग में भी होती हैं किंतु अधिकतर आत्महत्यायें एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम होती हैं। व्यक्ति आमतौर पर जीवन में मोड़ दर मोड़ आने वाली विभिन्न समस्याओं, बाधाओं और परेशानियों से जूझने की कोशिश करता है, लेकिन जब वह इन पर काबू पाने में असफल हो जाता है तब उसके मन में निराशा और हताशा की भावना आती है।

 

उन्होंने कहा कि ऐसा भी होता है कि व्यक्ति इन समस्याओं से निजात पाने के लिए और अन्य लोगों का ध्यान अपनी कमजोर स्थिति की ओर खींचने के लिए आत्महत्या का असफल प्रयास किया हो। उनकी यह सोचकर अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि उन्होंने आवेग में आकर या भूलवश ऐसा किया होगा, बल्कि उनकी समस्याओं को समझने और उनके समाधन करने की कोशिश की जानी चाहिए।

 

डॉ. मित्तल कहते हैं कि आत्महत्या करने वालों में ज्यादातर अवसाद खास तौर पर सायकोटिक अवसाद के शिकार होते हैं। सायकोटिक अवसाद के रोगियों को यह मालूम नहीं होता कि वे किसी अवसाद के शिकार हैं। ऐसे लोगों के मन में हर समय निराश और अवसाद की भावना होती है।



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