बच्चों का रोना इसलिए है जरूरी

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
May 17, 2017
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Quick Bites

  • चोट, असहजता आदि के कारण रोते हैं शिशु।
  • सोते समय भी रोते हैं कई शिशु।
  • शिशु रोकर होते हैं तनाव मुक्त।
  • शिशु के रोने का मतलब है कि वे स्वस्थ हैं।

शिशु का रोना बहुत कुछ कहता है। स्वास्थ्य के बेहतरीन से लेकर बदतरी का एहसास शिशु के रोने से ही होता है। वास्तव में शिशु का रोना बहुत जरूरी है। इसी से मां और घर के अन्य सदस्य शिशु के स्वास्थ्य का ठीक ठीक आंकलन लगा सकते हैं। यही नहीं शिशु के रोने से ही उसके मानसिक और शारीरिक रूप से फिट होने का अंदाजा लगाया जा सकता है। आपको यह भी बताते चलें प्रत्येक माह शिशु के रोने के मायने बदलते हैं। उनके मानसिक और शारीरिक विकास में रोने का महत्वपूर्ण भूमिका है। यहां हम शिशु के रोने की कुछ वजहों पर चर्चा करेंगे।

 

रोने की सामान्य वजहें

शिशु के रोने की असंख्य वजह है। लेकिन मोटा मोटी शिशु भूख लगने पर, डाइपर गीला होने पर, असहज कपड़े पहनाने पर, तकलीफ आदि परेशानियों में रोते हैं। यही नहीं यदि शिशु के बाल उसकी अंगुली में उलझ गए, हाथ कहीं फंस गया, शरीर में कुछ चुभ रहा है आदि वजहों से भी शिशु रोते हैं। असल में शिशु रोकर ही अपनी समस्याओं के बारे में दूसरों को बताते हैं। अतः शिशु के रोने की सही वजह जानना जरूरी है। जरूरी नहीं है कि हर समय शिशु भूख कारण ही रोए। असल में नई मांओं के लिए शिशु का रोना अबूझ होता है। लेकिन उन्हें यह पता होना चाहिए कि उनके शिशु का रोना किस समय क्या कहना चाहता है। कहीं किसी मशीन की जोर आवाज से तो वह नहीं रो रहा है या फिर कोई अचंभित चीज उसके सामने तो नहीं आ गयी। इसके अलावा आपका शिशु अंजान लोगों को देखकर भी रो सकता है।

 

बीमारी का संकेत

कई बार शिशु का रोने छोटी मोटी वजहों से नहीं वरन बड़ी वजह से भी हो सकता है। यदि शिशु की तबियत सही नहीं है तो भी वह रो रोकर पूरे घर को सिर पर उठा सकता है। ऐसे में मां को लग सकता है कि उसे किसी चीज से परेशानी हो रही है। यदि आप उसके रोने की वजह न जान पाएं तो तुरंत डाक्टर के पास ले जाएं। शिशु का रोना अच्छी बात है। लेकिन अत्यधिक रोना अच्छी बात नहीं है।

 

सोते समय

हालांकि सामान्य लोगों के लिए सोना आराम का विषय होता है। लेकिन शिशु के लिए ऐसा नहीं है। सोने से पहले वे बेहद असहज होते हैं, उनकी आंखों में जलन होती है। शिशु के लिए यह सब सहना आसान नहीं होता। यही कारण है कि जब भी उन्हें नींद आती है वे रोना शुरु कर देते हैं। वे तब तक रोते हैं जब तक उन्हें पूरी तरह नींद नहीं आ जाती है। यदि ऐसे में शिशु को गहरी नींद में सोने नहीं दिया तो वे ज्यादा परेशान कर सकते हैं। सोने के लिए रो रहे शिशु के लिए चाहिए कि मां उसे अपनी गोद में रखे, झुलाए और संभव हो तो थोड़ा टहले ताकि शिशु को सोने में कम तकलीफ हो। यदि आपका शिशु सो गया है तो उसे जरा भी परेशान न होने दें।

 

चोट लगते समय

चोट लगने के बाद शिशु का रोना बहुत जरूरी है। यदि खाट से गिरना या टेबल पर लगने से शिशु नहीं रोता तो यह अच्छे संकेत नहीं है। वास्तव में रोने से इस बात का पता चलता है कि शिशु को दर्द का एहसास है। उसे किसी प्रकार की गुम चोट नहीं लगी। लेकिन यदि शिशु न रोए या फिर वह अपने होश खो बैठे तो बिना देरी किये तुरंत डाक्टर के पास पहुंचे। यदि आपका शिशु रो रहा है तो उसे कुछ देर रोने दें। तुरंत उसे कम्फर्टेबल ज़ोन में लाएं। थोड़ी देर रोने से ही आपको पता चल जाएगा कि उसे चोट कहां लगी और कितनी लगी है। यदि उसका रोना काफी देर तक बंद न हो तो समझें कि उसे कोई गहरी चोट लगी है जिसे चिकित्सक के पास ले जाना जरूरी है।

 

बेहतर स्वास्थ्य

शिशु का रोना सिर्फ संकेत भर नहीं है। शिशु के रोने से उनके बेहतर स्वास्थ्य का भी पता चलता है। यही नहीं शिशु जितना रोते हैं, उससे उनकी आवाज खुलती है। यदि शिशु न रोए तो इससे डर का एहसास बंध जाता है। दरअसल शिशु के न रोने का मतलब है कि भूख, प्यास, दर्द, दूरी आदि कुछ भी वह महसूस नहीं सकता। जबकि चोट लगने से लेकर भूख लगने तक में रोने का मतलब है कि उसे महसूस होता है कि उसे क्या तकलीफ है। इसके अलावा उसके हृदय के लिए रोना सही है। वह अचानक किसी आवाज से चौकेगा नहीं है। यदि वह किसी चीज से असहज हो रहा है तो रोकर वह संकेत देगा कि उसे वह चीज विशेष पसंद नहीं आ रही है। ये सब संकेत उसके बेहतर स्वास्थ्य की निशानी है।

 

तनाव मुक्त करना

शिशु के लिए रोना सिर्फ कुछ संकेत भर नहीं है। शिशु अपना तनाव भी रोने से ही फारिग करते हैं। हालांकि आप सोच सकते हैं कि शिशु को किस बात का तनाव होता है या फिर क्या वे तनाव को महसूस सकते हैं? जी, हां! वे न सिर्फ तनाव को समझते हैं बल्कि रोकर उससे फारिग भी होते हैं। मां का पास न होना या फिर देर तक दूध न मिलना या फिर असहज माहौल में काफी देर तक रहने के कारण शिशु को तनाव हो सकात है। इन सबसे निपटने के लिए वे शब्दों का इस्तेमाल नहीं कर सकते और न ही दूसरों से झगड़ सकते हैं। वे इससे निपटने के लिए रो सकते हैं। अतः वे रोते हैं और तनाव को दूर करते हैं।

 

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